॥ विष्णु मन्त्र ॥
विनियोग:अस्य मंत्रस्य साध्य नारायण ऋषिः, देवी गायत्री छन्दः, विष्णु देवता, सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।
ध्यान:उद्यत्कोटि दिवाकराभमनिशं शंखं गदां पंकजम् ।
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरा वसुमती संशोभि पार्श्वद्वयम् ॥
कोटीरांगद हार कुंडलधरं पीतांबरं कौस्तुभो ।
दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्स चिह्नं भजे ॥
मंत्र:ॐ नमो नारायणाय ।
विनियोग:अस्य मंत्रस्य साध्य नारायण ऋषिः, देवी गायत्री छन्दः, विष्णु देवता, सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।
ध्यान:उद्यत्कोटि दिवाकराभमनिशं शंखं गदां पंकजम् ।
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरा वसुमती संशोभि पार्श्वद्वयम् ॥
कोटीरांगद हार कुंडलधरं पीतांबरं कौस्तुभो ।
दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्स चिह्नं भजे ॥
मंत्र:ॐ नमो नारायणाय ।
॥ अर्थ ॥
यह मंत्र सरल होने के कारण प्रत्येक गृहस्थ के लिए उपयोगी है। प्रत्येक गृहस्थ को दिनभर कार्य करते हुए भी इस मंत्र का मन ही मन जप करते रहना चाहिए।
यह मंत्र सरल होने के कारण प्रत्येक गृहस्थ के लिए उपयोगी है। प्रत्येक गृहस्थ को दिनभर कार्य करते हुए भी इस मंत्र का मन ही मन जप करते रहना चाहिए।
परिचय एवं महत्व
यह विष्णु मन्त्र उन साधकों के लिए अत्यन्त अनुकूल है जिनके इष्ट देव भगवान कृष्ण या भगवान विष्णु हैं। यह मंत्र अत्यंत सरल होने के कारण प्रत्येक गृहस्थ के लिए बहुत उपयोगी है। शास्त्रों के अनुसार, प्रत्येक गृहस्थ को दिनभर अपना कार्य करते हुए भी मन ही मन इस पवित्र मन्त्र का जाप करते रहना चाहिए।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: साध्य नारायण
- छंद: देवी गायत्री
- देवता: विष्णु
- प्रयोजन: सर्वेष्ट सिद्धये (सभी अभीष्ट और इच्छाओं की सिद्धि के लिए)
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
उद्यत्कोटि दिवाकराभमनिशं शंखं गदां पंकजम् ।
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरा वसुमती संशोभि पार्श्वद्वयम् ॥
कोटीरांगद हार कुंडलधरं पीतांबरं कौस्तुभो ।
दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्स चिह्नं भजे ॥
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरा वसुमती संशोभि पार्श्वद्वयम् ॥
कोटीरांगद हार कुंडलधरं पीतांबरं कौस्तुभो ।
दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्स चिह्नं भजे ॥
अर्थ: मैं उन भगवान विष्णु का भजन करता हूँ, जिनकी कांति करोड़ों उगते हुए सूर्य के समान है। जो अहर्निश (निरंतर) शंख, गदा, कमल और चक्र धारण करते हैं। जिनके दोनों पार्श्व (बगल) में इन्दिरा (लक्ष्मी) और वसुमती (पृथ्वी) सुशोभित हैं। जो मुकुट (कोटीर), अंगद (बाजूबंद), हार और कुंडल धारण किए हुए हैं। जो पीतांबर धारी हैं, कौस्तुभ मणि से दीप्त हैं, विश्व को धारण करने वाले (विश्वधर) हैं, और जिनके वक्ष स्थल पर श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित है।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
ॐ (Om): परमात्मा का मूल स्वर।
नमो (Namo): नमस्कार (समर्पण)।
नारायणाय (Narayanaya): भगवान नारायण (विष्णु) को।
संपूर्ण अर्थ: सर्वव्यापी भगवान नारायण को मेरा नमस्कार है। यह 'अष्टाक्षर मंत्र' (आठ अक्षरों वाला) मोक्षप्रदाता माना गया है।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
गृहस्थों के लिए सर्वोत्तम
यह मंत्र अत्यंत सरल और सात्विक है, इसलिए यह प्रत्येक गृहस्थ के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
निरंतर जाप संभव
इसे दिनभर कार्य करते हुए भी मन ही मन जपा जा सकता है, जिससे मानसिक शांति बनी रहती है।
इष्ट कृपा
जिनके इष्ट भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण हैं, उनके लिए यह मंत्र कल्पवृक्ष के समान फलदायी है।
सिद्धि प्राप्ति
पाँच लाख बार जप पूर्ण करने पर यह मंत्र सिद्ध हो जाता है और साधक को अभीष्ट फल प्रदान करता है।
मंत्र सिद्धि की विधि
इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए गए हैं:
- जप संख्या: पांच लाख (5,00,000) मंत्र जप करने से यह मंत्र सिद्ध होता है।
- सरलता: यह मंत्र बहुत ही सरल और सौम्य है, इसमें कठिन नियमों की बाध्यता कम है, परन्तु श्रद्धा अनिवार्य है।
- नित्य जप: इसे चलते-फिरते, काम करते हुए भी मानसिक रूप से जपा जा सकता है।
