॥ द्वादशाक्षर विष्णु मन्त्र ॥
विनियोग:अस्य मंत्रस्य प्रजापति ऋषिः, गायत्री छन्दः, वासुदेव परमात्मा देवता, सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः ।
ध्यान:विष्णुं शारद चन्द्र कोटि सदृशं शंखं रथांगं गदा -
मम्भोजं दधतं सिताब्ज निलयं कांत्या जगन्मोहनम् ।
आबद्धांगद हार कुण्डल महा मौलि स्फुरत्कंकणम् ।
श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं वंदे मुनीन्द्रैः स्तुतम् ॥
मंत्र:ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
विनियोग:अस्य मंत्रस्य प्रजापति ऋषिः, गायत्री छन्दः, वासुदेव परमात्मा देवता, सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः ।
ध्यान:विष्णुं शारद चन्द्र कोटि सदृशं शंखं रथांगं गदा -
मम्भोजं दधतं सिताब्ज निलयं कांत्या जगन्मोहनम् ।
आबद्धांगद हार कुण्डल महा मौलि स्फुरत्कंकणम् ।
श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं वंदे मुनीन्द्रैः स्तुतम् ॥
मंत्र:ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
॥ अर्थ ॥
यह मंत्र गृहस्थ व्यक्तियों के लिए उपयोगी है और सभी प्रकार की समृद्धि देने में यह सहायक है । विशेष रूप से स्त्रियों के लिए यह मंत्र विशेष उपयोगी माना गया है ।
यह मंत्र गृहस्थ व्यक्तियों के लिए उपयोगी है और सभी प्रकार की समृद्धि देने में यह सहायक है । विशेष रूप से स्त्रियों के लिए यह मंत्र विशेष उपयोगी माना गया है ।
परिचय एवं महत्व
यह द्वादशाक्षर विष्णु मन्त्र गृहस्थ व्यक्तियों के लिए अत्यंत उपयोगी और कल्याणकारी है। यह मंत्र सभी प्रकार की समृद्धि प्रदान करने में सहायक है। विशेष रूप से स्त्रियों के लिए यह मंत्र बहुत ही शुभ और विशेष उपयोगी माना गया है, जो घर में सुख-शांति और संपन्नता लाता है।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: प्रजापति
- छन्द: गायत्री
- देवता: वासुदेव परमात्मा
- प्रयोजन: सर्वेष्ट सिद्धये (समस्त अभीष्ट सिद्धियों के लिए)
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
विष्णुं शारद चन्द्र कोटि सदृशं शंखं रथांगं गदा -
मम्भोजं दधतं सिताब्ज निलयं कांत्या जगन्मोहनम् ।
आबद्धांगद हार कुण्डल महा मौलि स्फुरत्कंकणम् ।
श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं वंदे मुनीन्द्रैः स्तुतम् ॥
मम्भोजं दधतं सिताब्ज निलयं कांत्या जगन्मोहनम् ।
आबद्धांगद हार कुण्डल महा मौलि स्फुरत्कंकणम् ।
श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं वंदे मुनीन्द्रैः स्तुतम् ॥
अर्थ: मैं उन भगवान विष्णु की वन्दना करता हूँ जो शरद ऋतु के करोड़ों चंद्रमाओं के समान शीतल और कांतिमान हैं। जो अपने चार हाथों में शंख, चक्र (रथांग), गदा और पद्म (कमल) धारण किए हुए हैं। जो श्वेत कमल (सिताब्ज) पर विराजमान हैं और अपनी दिव्य कांति से संपूर्ण जगत को मोहित करते हैं। जो सुंदर बाजूबंद (अंगद), हार, कुण्डल, विशाल मुकुट और चमकते हुए कंकण (कंगन) धारण किए हुए हैं। जिनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न और गले में उदार (श्रेष्ठ) कौस्तुभ मणि सुशोभित है, और जो मुनीन्द्रों (ऋषि-मुनियों) द्वारा स्तुत हैं।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
ॐ (Om): परब्रह्म का प्रतीक।
नमो (Namo): नमस्कार है।
भगवते (Bhagavate): भगवान (ऐश्वर्य संपन्न) को।
वासुदेवाय (Vasudevaya): वासुदेव (सर्वव्यापी विष्णु) को।
संपूर्ण अर्थ: उन ऐश्वर्यशाली भगवान वासुदेव (विष्णु) को मेरा साष्टांग नमस्कार है। यह 12 अक्षरों वाला (द्वादशाक्षर) महामंत्र माना जाता है।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
सुखमय गृहस्थ जीवन
इस मंत्र के प्रभाव से गृहस्थ जीवन पूरी तरह से सुखमय और क्लेशरहित व्यतीत होता है।
समृद्धि दायक
यह मंत्र साधक को सभी प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करने में सहायक है।
विष्णुलोक की प्राप्ति
मृत्यु के पश्चात साधक निश्चय ही भगवान विष्णु के परम धाम (विष्णुलोक) को प्राप्त होता है।
स्त्रियों के लिए विशेष
यह मंत्र विशेष रूप से महिलाओं के लिए कल्याणकारी और सौभाग्यवर्धक माना गया है।
मंत्र सिद्धि की विधि
इस मंत्र की सिद्धि के लिए शास्त्रों में निम्नलिखित विधान वर्णित है:
- जप संख्या: यह मंत्र बारह लाख (12,00,000) बार जपने से सिद्ध होता है।
- नियमितता: प्रतिदिन एक निश्चित संख्या में मंत्र का जाप करना चाहिए।
- सात्विकता: जाप के दौरान पवित्रता और सात्विक आहार-विहार का पालन करना आवश्यक है।
