॥ उच्छिष्ट गणपति नवार्ण मन्त्र ॥
विनियोग:ॐ अस्य श्री उच्छिष्ट गणेश नवार्णमंत्रस्य, कंकोल ऋषिः, विराट् छंद, उच्छिष्टगणपतिर्देवता, अखिलाप्तये जपे विनियोगः।ध्यान:चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं पाशांकुशौ मोदकपात्रदंतौ। करैर्दधानं सरसीरुहस्थ मुन्मत्तमुच्छिष्टगणेशमीडे॥मंत्र:हस्तिपिशाचिलिखे स्वाहा॥
विनियोग:ॐ अस्य श्री उच्छिष्ट गणेश नवार्णमंत्रस्य, कंकोल ऋषिः, विराट् छंद, उच्छिष्टगणपतिर्देवता, अखिलाप्तये जपे विनियोगः।ध्यान:चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं पाशांकुशौ मोदकपात्रदंतौ। करैर्दधानं सरसीरुहस्थ मुन्मत्तमुच्छिष्टगणेशमीडे॥मंत्र:हस्तिपिशाचिलिखे स्वाहा॥
॥ अर्थ ॥
हे गणेश (हस्ति)! आप अपनी तीव्र शक्ति (पिशाचि) के साथ आएं और मेरे भाग्य में समृद्धि और सफलता अंकित कर दें (लिखे)। मैं आपको पूर्ण समर्पित हूँ (स्वाहा)।
हे गणेश (हस्ति)! आप अपनी तीव्र शक्ति (पिशाचि) के साथ आएं और मेरे भाग्य में समृद्धि और सफलता अंकित कर दें (लिखे)। मैं आपको पूर्ण समर्पित हूँ (स्वाहा)।
उत्पत्ति एवं शास्त्रीय संदर्भ
उच्छिष्ट गणपति नवार्ण मंत्र, भगवान गणेश के अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय तांत्रिक स्वरूप को समर्पित है। 'उच्छिष्ट' का शाब्दिक अर्थ है 'जूठा' या 'बचा हुआ भोजन', जो सामान्य पूजा-पद्धति के विपरीत है। यह नाम साधना की वामाचार (तांत्रिक) प्रकृति को इंगित करता है, जहाँ पारंपरिक नियमों को तोड़कर शीघ्र फल प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। यह मंत्र विशेष रूप से तांत्रिक गणपति साधना के लिए ही सफल माना गया है और इसकी समस्त पूजा-विधि तांत्रिक तरीके से ही होती है।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: कंकोल
- छंद: विराट्
- देवता: उच्छिष्ट गणपति
- प्रयोजन: सभी इच्छाओं की पूर्ति (अखिलाप्तये)
मंत्र का शब्दशः अर्थ
हस्ति (Hasti) - इसका अर्थ है हाथी (ईश्वर का गजमुख स्वरूप यानी भगवान गणेश)।
पिशाचि (Pishachi) - यह किसी भूत-प्रेत के लिए नहीं, बल्कि अत्यंत तीव्र और शक्तिशाली ऊर्जा (शक्ति) के लिए है जो असंभव को संभव कर सकती है।
लिखे (Likhe) - इसका तांत्रिक अर्थ है "लिखना" या "अंकित करना" (भाग्य को दोबारा लिखना)।
स्वाहा (Swaha) - पूर्ण समर्पण और आहुति।
संपूर्ण भावार्थ: हे गणेश (हस्ति)! आप अपनी तीव्र शक्ति (पिशाचि) के साथ आएं और मेरे भाग्य में समृद्धि और सफलता अंकित कर दें (लिखे)। मैं आपको पूर्ण समर्पित हूँ (स्वाहा)।
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं
पाशांकुशौ मोदकपात्रदंतौ।
करैर्दधानं सरसीरुहस्थ
मुन्मत्तमुच्छिष्टगणेशमीडे॥
पाशांकुशौ मोदकपात्रदंतौ।
करैर्दधानं सरसीरुहस्थ
मुन्मत्तमुच्छिष्टगणेशमीडे॥
अर्थ: मैं उन उन्मत्त (दिव्य आनंद में मग्न) उच्छिष्ट गणेश का स्तवन करता हूँ, जो चार भुजाओं वाले हैं, जिनका शरीर रक्त वर्ण का है, जिनके तीन नेत्र हैं, जो अपने हाथों में पाश, अंकुश, मोदक से भरा पात्र और अपना टूटा हुआ दांत धारण करते हैं और जो कमल के आसन पर विराजमान हैं।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
शास्त्रों के अनुसार, यह मंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसका प्रभाव बहुत तीव्र होता है।
शीघ्र आर्थिक अनुकूलता
इस मंत्र के प्रभाव से धन संबंधी बाधाएं तुरंत दूर होती हैं और आर्थिक स्थिति अनुकूल होने लगती है।
भौतिक समृद्धि की प्राप्ति
यह मंत्र साधक को भौतिक सुख-सुविधाएं और सांसारिक वस्तुओं की समृद्धि प्रदान करता है।
तांत्रिक साधना में सफलता
जो लोग तांत्रिक साधनाओं में रुचि रखते हैं, उनके लिए यह मंत्र सिद्धि प्राप्त करने का एक प्रमुख साधन है।
इच्छाओं की पूर्ति
मंत्र के विनियोग में 'अखिलाप्तये' शब्द का अर्थ है 'सभी कुछ प्राप्त करने के लिए', जो दर्शाता है कि यह सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूरी कर सकता है।
तांत्रिक जप विधि एवं सावधानियाँ
यह एक तांत्रिक मंत्र है, अतः इसकी साधना सामान्य मंत्रों से भिन्न होती है और इसमें विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है।
- उच्छिष्ट अवस्था: इस मंत्र का जाप 'उच्छिष्ट' मुख से किया जाता है, अर्थात मुंह में कुछ (जैसे पान, इलायची, गुड़) रखकर या भोजन के बाद बिना कुल्ला किए। यह तांत्रिक साधना का विधान है।
- दिशा: साधना के लिए उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना श्रेष्ठ माना जाता है।
- आसन: लाल रंग का आसन प्रयोग करें।
- माला: मूंगा या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग किया जा सकता है।
- गुरु का मार्गदर्शन: यह एक अत्यंत तीव्र मंत्र है। इसकी साधना बिना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन के कदापि नहीं करनी चाहिए। गलत विधि से किया गया जाप हानिकारक हो सकता है।
सामान्य प्रश्न
'उच्छिष्ट गणपति' का क्या अर्थ है?
उत्तर: यह भगवान गणेश का एक तांत्रिक स्वरूप है। 'उच्छिष्ट' का अर्थ है जूठा प्रसाद, जो यह दर्शाता है कि इस स्वरूप की पूजा में पारंपरिक शुद्धि के नियमों का बंधन नहीं होता। यह स्वरूप शीघ्र और उग्र फल देने वाला माना जाता है।
मंत्र में 'हस्तिपिशाचिलिखे' का क्या तात्पर्य है?
उत्तर: यह एक गूढ़ तांत्रिक शब्द है। इसमें 'हस्ति' (हाथी/गणेश) और 'पिशाचि' (एक शक्तिशाली ऊर्जा) का संयोजन है। 'लिखे' का अर्थ है वशीकरण या आज्ञा देना। अतः इसका भावार्थ है 'गणेश की पिशाचि शक्ति को मेरे लिए कार्य करने की आज्ञा'। यह बहुत शक्तिशाली शक्तियों का आवाहन है।
क्या कोई भी इस मंत्र का जाप कर सकता है?
उत्तर: नहीं। यह मंत्र केवल उन साधकों के लिए है जो तांत्रिक साधना में दीक्षित हैं या जिन्हें एक योग्य गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त है। आम भक्तों को इस मंत्र का जाप बिना समझे और बिना मार्गदर्शन के नहीं करना चाहिए।
