॥ एकत्रिंशदक्षर वक्रतुण्ड मन्त्र ॥
विनियोग:ॐ अस्य श्री वक्रतुण्ड गणेश मंत्रस्य, भार्गव ऋषिः, अनुष्टुप् छंदः, विघ्नेशो देवता, यं बीजम्, यं शक्ति । ममाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः ॥मंत्र:रायस्पोषस्य ददिता निधिदो रत्नधातुमान्,
रक्षोहणो बलगहनो वक्रतुण्डाय हुं ।
विनियोग:ॐ अस्य श्री वक्रतुण्ड गणेश मंत्रस्य, भार्गव ऋषिः, अनुष्टुप् छंदः, विघ्नेशो देवता, यं बीजम्, यं शक्ति । ममाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः ॥मंत्र:रायस्पोषस्य ददिता निधिदो रत्नधातुमान्,
रक्षोहणो बलगहनो वक्रतुण्डाय हुं ।
॥ अर्थ ॥
हे वक्रतुण्ड! आप धन और पोषण प्रदान करने वाले, निधियों (खजानों) के दाता और रत्नों के स्वामी हैं। आप राक्षसों का संहार करने वाले और शत्रुओं के बल का नाश करने वाले हैं। मैं आपको 'हुं' बीज मंत्र के साथ नमन करता हूँ।
हे वक्रतुण्ड! आप धन और पोषण प्रदान करने वाले, निधियों (खजानों) के दाता और रत्नों के स्वामी हैं। आप राक्षसों का संहार करने वाले और शत्रुओं के बल का नाश करने वाले हैं। मैं आपको 'हुं' बीज मंत्र के साथ नमन करता हूँ।
उत्पत्ति एवं शास्त्रीय संदर्भ
एकत्रिंशदक्षर वक्रतुण्ड मन्त्र भगवान गणेश के सबसे गोपनीय और शक्तिशाली मंत्रों में से एक है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह ३१ अक्षरों से मिलकर बना है। इसका उल्लेख तांत्रिक और पौराणिक ग्रंथ संग्रहों में मिलता है। इस मंत्र को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यह भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक सुरक्षा दोनों प्रदान करता है।
इस मंत्र का विनियोग इसकी साधना का विधान स्पष्ट करता है:
- ऋषि: भार्गव
- छंद: अनुष्टुप्
- देवता: विघ्नेश (भगवान गणेश)
- बीज: यं
- शक्ति: यं
- प्रयोजन: सभी अभीष्टों की सिद्धि (ममाभीष्टसिद्धये)
यह विनियोग मंत्र की साधना को एक शास्त्रीय और प्रामाणिक आधार प्रदान करता है, जिससे साधक सही विधि से इसका जाप कर पूर्ण फल प्राप्त कर सके।
सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व
सांस्कृतिक रूप से, यह मंत्र गणपति संप्रदाय के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व रखता है। इसे केवल एक विघ्नहर्ता मंत्र नहीं, बल्कि एक 'सिद्धि' मंत्र माना जाता है, जो साधक को अष्टसिद्धियों के निकट ले जा सकता है। यह मंत्र धन-धान्य की वृद्धि (रायस्पोषस्य) और नकारात्मक शक्तियों के नाश (रक्षोहणो) का एक अनूठा संगम है। प्राचीन काल में, व्यापारी और राजा अपने कोष की वृद्धि और अपने राज्य को शत्रुओं एवं बुरी शक्तियों से बचाने के लिए इस मंत्र की गुप्त रूप से साधना करते थे।
शब्दार्थ एवं व्याख्या
रायस्पोषस्य: धन (राय) और पोषण (पोष) के।
ददिता: देने वाले, प्रदाता।
निधिदो: निधियों या खजानों को प्रदान करने वाले।
रत्नधातुमान्: जो रत्नों और धातुओं से युक्त हैं।
रक्षोहणो: राक्षसों का हनन करने वाले।
बलगहनो: शत्रुओं के बल का नाश करने वाले।
वक्रतुण्डाय: टेढ़ी सूंड वाले भगवान गणेश को (नमन है)।
हुं: एक शक्तिशाली बीज मंत्र, जो नकारात्मकता को नष्ट करने, सुरक्षा कवच बनाने और ऊर्जा को प्रकट करने के लिए प्रयोग होता है। इसे 'वर्चस बीज' भी कहते हैं।
लाभ
अपार धन और समृद्धि
यह मंत्र धन, पोषण, खजाने और रत्नों को आकर्षित करने की क्षमता रखता है, जिससे साधक के जीवन में भौतिक सम्पन्नता आती है।
नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा
'रक्षोहणो' और 'बलगहनो' शब्द स्पष्ट करते हैं कि यह मंत्र राक्षसों, बुरी आत्माओं और शत्रुओं के बल से एक अभेद्य कवच प्रदान करता है।
सर्व कार्य सिद्धि
भगवान वक्रतुण्ड सभी विघ्नों को दूर करते हैं, जिससे साधक के सभी रुके हुए कार्य पूरे होते हैं और नए कार्यों में सफलता मिलती है।
आत्मविश्वास और निर्भयता
मंत्र के अंत में 'हुं' बीज मंत्र का जाप साधक के भीतर ऊर्जा, आत्मविश्वास और निर्भयता का संचार करता है, जिससे वह चुनौतियों का सामना कर पाता है।
जप विधि
- शुद्धि: प्रातःकाल स्नानादि करके स्वच्छ, विशेषकर लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
- आसन: पूजा स्थान पर कुश या ऊन के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- स्थापना: अपने सामने भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। उन्हें लाल पुष्प, दूर्वा, और मोदक अर्पित करें।
- संकल्प: हाथ में जल लेकर अपना नाम, गोत्र और मंत्र जाप का उद्देश्य बोलकर संकल्प लें और जल भूमि पर छोड़ दें।
- विनियोग एवं ध्यान: ऊपर दिए गए विनियोग का पाठ करें और भगवान वक्रतुण्ड के उस स्वरूप का ध्यान करें जो धन-धान्य और रत्नों से सुशोभित हैं और दुष्टों का नाश कर रहे हैं।
- जाप: रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से मंत्र की कम से कम एक माला (108 बार) का जाप करें। उच्चारण स्पष्ट और लयबद्ध होना चाहिए।
- समापन: जाप के बाद गणेश आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
सावधानियाँ एवं निषेध
- करें: इस मंत्र का जाप पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करें।
- न करें: मंत्र का प्रयोग किसी को हानि पहुँचाने या अनैतिक कार्यों के लिए कदापि न करें।
- करें: साधना काल में सात्विक भोजन ग्रहण करें और ब्रह्मचर्य का पालन करने का प्रयास करें।
- न करें: जाप करते समय मन में क्रोध, ईर्ष्या या द्वेष जैसे नकारात्मक भाव न लाएं।
- करें: मंत्र के अक्षरों का उच्चारण शुद्धता से करें। यदि संभव हो तो किसी गुरु से दीक्षा लेकर ही साधना आरंभ करें।
सामान्य प्रश्न
प्रश्न: इस मंत्र को 'एकत्रिंशदक्षर' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि यह मंत्र संस्कृत वर्णमाला के ३१ अक्षरों से मिलकर बना है, इसलिए इसे 'एकत्रिंशदक्षर' (इकतीस अक्षरों वाला) मंत्र कहते हैं।
प्रश्न: क्या कोई भी इस मंत्र का जाप कर सकता है?
उत्तर: हाँ, कोई भी भक्त शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ इस मंत्र का जाप कर सकता है। हालांकि, सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से साधना के लिए गुरु से मार्गदर्शन लेना उत्तम होता है।
प्रश्न: मंत्र के अंत में 'हुं' का क्या विशेष महत्व है?
उत्तर: 'हुं' एक शक्तिशाली बीज मंत्र है जिसे 'वर्चस बीज' या 'क्रोध बीज' भी कहते हैं। यह नकारात्मकता को बलपूर्वक नष्ट करता है, एक सुरक्षा कवच बनाता है और साधक की इच्छा शक्ति को प्रबल करता है।
प्रश्न: इस मंत्र के ऋषि भार्गव कौन हैं?
उत्तर: भार्गव ऋषि, जिन्हें शुक्राचार्य के नाम से भी जाना जाता है, भृगु ऋषि के वंशज थे। वे महान ज्ञानी और मंत्रों के ज्ञाता थे। इस मंत्र का ऋषि भार्गव का होना इसकी शक्ति और प्रामाणिकता को दर्शाता है।
अन्य सम्बंधित मंत्र
एकत्रिंशदक्षर मंत्र के साथ ही, भगवान वक्रतुण्ड का एक और प्रसिद्ध मंत्र है जिसे 'षडक्षर वक्रतुण्ड मन्त्र' (छः अक्षरों वाला) कहा जाता है। यह मंत्र साधना में सरलता और प्रभावशीलता के लिए जाना जाता है:
ॐ वक्रतुण्डाय हुं।यह मंत्र भी विघ्नों को दूर करने और सुरक्षा प्रदान करने में अत्यंत प्रभावी है।
निष्कर्ष
एकत्रिंशदक्षर वक्रतुण्ड मन्त्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक पूर्ण आध्यात्मिक साधना है। यह साधक को भौतिक जगत में समृद्धि और सम्पन्नता प्रदान करने के साथ-साथ उसे सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं से भी बचाता है। भार्गव ऋषि द्वारा दृष्ट यह मंत्र भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने का एक अचूक और प्रामाणिक माध्यम है।
