॥ त्रैलोक्यमोहन कर गणेश मन्त्र ॥
विनियोग:अस्य श्री त्रैलोक्यमोहन कर गणेश मन्त्रस्य गणक ऋषि, गायत्री छन्दः, त्रैलोक्य मोहन करो गणेशो देवता, ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान:गदाबीजपुरे धनुः शूलचक्रे, सरोजोत्पले पाशधान्याग्रदन्तान्।
करैः संदधानं स्वशुण्डाग्रराजन्मणी कुम्भमंगाधिरूढं स्वपत्न्या॥
सरोजन्मना भूषणानां भरेणोज्ज्वलद्दस्ततन्वा समालिंगितांगम्।
करीन्द्राननं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं जगन्मोहनं रक्तकांतिं भजेतम्॥
मंत्र:वक्र तुंडैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
विनियोग:अस्य श्री त्रैलोक्यमोहन कर गणेश मन्त्रस्य गणक ऋषि, गायत्री छन्दः, त्रैलोक्य मोहन करो गणेशो देवता, ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान:गदाबीजपुरे धनुः शूलचक्रे, सरोजोत्पले पाशधान्याग्रदन्तान्।
करैः संदधानं स्वशुण्डाग्रराजन्मणी कुम्भमंगाधिरूढं स्वपत्न्या॥
सरोजन्मना भूषणानां भरेणोज्ज्वलद्दस्ततन्वा समालिंगितांगम्।
करीन्द्राननं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं जगन्मोहनं रक्तकांतिं भजेतम्॥
मंत्र:वक्र तुंडैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
॥ अर्थ ॥
हे मुड़ी सूंड और एक दांत वाले, मैं आपकी आकर्षण (क्लीं), माया (ह्रीं), समृद्धि (श्रीं) और विघ्ननाशक (गं) शक्तियों का आवाहन करता हूँ। हे श्रेष्ठ वरदान देने वाले गणपति, आप सभी लोगों को मेरे अनुकूल करें। मैं यह प्रार्थना आपको समर्पित करता हूँ।
हे मुड़ी सूंड और एक दांत वाले, मैं आपकी आकर्षण (क्लीं), माया (ह्रीं), समृद्धि (श्रीं) और विघ्ननाशक (गं) शक्तियों का आवाहन करता हूँ। हे श्रेष्ठ वरदान देने वाले गणपति, आप सभी लोगों को मेरे अनुकूल करें। मैं यह प्रार्थना आपको समर्पित करता हूँ।
उत्पत्ति एवं शास्त्रीय संदर्भ
त्रैलोक्यमोहन कर गणेश मंत्र, भगवान गणेश के एक अत्यंत आकर्षक और सम्मोहक स्वरूप को समर्पित है। 'त्रैलोक्य मोहन' का अर्थ है तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) को मोहित करने वाला। यह मंत्र विशेष रूप से सम्मोहन, आकर्षण और वशीकरण कार्यों में उपयोगी माना जाता है। यह एक सात्विक वशीकरण मंत्र है जिसका उद्देश्य किसी को हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व में ओजस्विता और आकर्षण उत्पन्न करना है ताकि लोग आपसे प्रभावित हों और आपके अनुकूल रहें।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: गणक
- छंद: गायत्री
- देवता: त्रैलोक्य मोहन करो गणेशो
- प्रयोजन: अभीष्ट सिद्धि के लिए (ममाभीष्ट सिद्धार्थे)
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
गदाबीजपुरे धनुः शूलचक्रे, सरोजोत्पले पाशधान्याग्रदन्तान्।
करैः संदधानं स्वशुण्डाग्रराजन्मणी कुम्भमंगाधिरूढं स्वपत्न्या॥
सरोजन्मना भूषणानां भरेणोज्ज्वलद्दस्ततन्वा समालिंगितांगम्।
करीन्द्राननं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं जगन्मोहनं रक्तकांतिं भजेतम्॥
करैः संदधानं स्वशुण्डाग्रराजन्मणी कुम्भमंगाधिरूढं स्वपत्न्या॥
सरोजन्मना भूषणानां भरेणोज्ज्वलद्दस्ततन्वा समालिंगितांगम्।
करीन्द्राननं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं जगन्मोहनं रक्तकांतिं भजेतम्॥
अर्थ: मैं उन जगन्मोहन, रक्त-वर्णी श्री गणेश का भजन करता हूँ, जो अपने हाथों में गदा, बीजपूर (अनार), धनुष, शूल, चक्र, कमल, पाश, धान की बाली और अपना टूटा दांत धारण करते हैं; जिनकी सूंड के अग्रभाग में एक मणि-जड़ित कुम्भ सुशोभित है; जो अपनी पत्नी (सिद्धि/बुद्धि) के साथ विराजमान हैं, जो कमल के समान हैं और उज्ज्वल आभूषणों से सुसज्जित अपनी भुजाओं से गणेशजी का आलिंगन कर रही हैं; जिनका मुख गज के समान है, जो मस्तक पर चंद्र धारण करते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
वक्र तुंडैकदंष्ट्राय: मुड़ी हुई सूंड और एक दांत वाले को।
क्लीं (Kleem): यह काम या कृष्ण बीज है, जो तीव्र आकर्षण और इच्छा पूर्ति की शक्ति रखता है।
ह्रीं (Hreem): यह माया या शक्ति बीज है, जो ब्रह्मांडीय आकर्षण और प्रभाव का प्रतीक है।
श्रीं (Shreem): यह लक्ष्मी बीज है, जो समृद्धि, सौभाग्य और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
गं (Gam): यह गणेश बीज है, जो सभी बाधाओं को दूर करता है।
गणपतये: गणों के स्वामी, गणेश जी को।
वरवरद: वरदानों में श्रेष्ठ वरदान देने वाले।
सर्वजनं मे वशमानय: सभी लोगों को मेरे वश में या अनुकूल करें।
स्वाहा: मैं यह ऊर्जा समर्पित करता हूँ।
संपूर्ण अर्थ: हे मुड़ी सूंड और एक दांत वाले, मैं आपकी आकर्षण (क्लीं), माया (ह्रीं), समृद्धि (श्रीं) और विघ्ननाशक (गं) शक्तियों का आवाहन करता हूँ। हे श्रेष्ठ वरदान देने वाले गणपति, आप सभी लोगों को मेरे अनुकूल करें। मैं यह प्रार्थना आपको समर्पित करता हूँ।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
ओजस्विता और आकर्षण
इस मंत्र की सिद्धि से साधक के चेहरे पर एक नैसर्गिक तेज और आकर्षण (ओजस्विता) आ जाता है, जिससे लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं।
सम्मोहन शक्ति
साधक की वाणी और व्यक्तित्व में ऐसा प्रभाव उत्पन्न होता है कि उससे बात करने वाला व्यक्ति स्वयं ही सम्मोहित या प्रभावित हो जाता है।
सामाजिक और व्यावसायिक सफलता
यह मंत्र लोगों को आपके अनुकूल बनाता है, जो व्यापार, नेतृत्व और सामाजिक जीवन में सफलता के लिए अत्यंत सहायक है।
सर्व-बाधा निवारण
शक्तिशाली बीज मंत्रों के संयोजन से यह जीवन के हर क्षेत्र में आने वाली बाधाओं को दूर कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।
मंत्र सिद्धि की विशेष विधि
इस मंत्र की सिद्धि के लिए विशेष अनुशासन और एक विशिष्ट प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है:
- जप संख्या: इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए पांच लाख (5,00,000) बार जाप करना होता है।
- त्राटक साधना: जाप के समय गणपति की मूर्ति या चित्र को अपने सामने रखें और उस पर अपनी दृष्टि को स्थिर करके (त्राटक करते हुए) मंत्र का जाप करें। इससे एकाग्रता और मंत्र की शक्ति बढ़ती है।
- आहार नियम: साधना काल में दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए।
- ब्रह्मचर्य: अनुष्ठान की पूरी अवधि के दौरान ब्रह्मचर्य व्रत का दृढ़ता से पालन करना अनिवार्य है।
सामान्य प्रश्न
'त्रैलोक्यमोहन' का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: इसका अर्थ तीनों लोकों को मोहित करना है। आध्यात्मिक संदर्भ में, इसका अर्थ है अपने व्यक्तित्व को इतना शुद्ध और ऊर्जावान बनाना कि देव, मनुष्य और अन्य सभी जीव आपके प्रति सकारात्मक और मैत्रीपूर्ण भाव रखें।
त्राटक क्या है और इस साधना में क्यों आवश्यक है?
उत्तर: त्राटक किसी एक बिंदु पर बिना पलक झपकाए लगातार देखने की एक यौगिक क्रिया है। इस साधना में, यह मन को एकाग्र करता है और साधक की मानसिक ऊर्जा को मंत्र के माध्यम से देवता की मूर्ति में प्रवाहित करने में मदद करता है, जिससे मंत्र शीघ्र सिद्ध होता है।
क्या इस मंत्र का प्रयोग किसी पर अनुचित प्रभाव डालने के लिए किया जा सकता है?
उत्तर: नहीं। यह एक सात्विक मंत्र है। इसका उद्देश्य स्वयं के भीतर सकारात्मक आकर्षण और ओज का विकास करना है। यदि कोई इसका दुरुपयोग करने का प्रयास करता है, तो उसे इसके विपरीत परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं क्योंकि भगवान गणेश न्याय के देवता भी हैं।
