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षडक्षर वक्रतुण्ड मंत्र अर्थ, सिद्धि विधि और लाभ

॥ Shadakshar Vakratunda Mantra ॥

षडक्षर वक्रतुण्ड मंत्र : अर्थ, सिद्धि विधि और लाभ
॥ षडक्षर वक्रतुण्ड मंत्र ॥

ध्यान:उद्यद्दिनेश्वररुचिं निजहस्तपद्मैः, पाशांकुशाभयवरान्दधतं गजास्यम्।
रक्तांबरं सकलदुःखहरं गणेशं, ध्यायेत्प्रसन्नमखिलाभरणामिरामम्॥मंत्र:वक्रतुण्डाय हुं
॥ अर्थ ॥

हे वक्रतुण्ड (मुड़ी हुई सूंड वाले भगवान गणेश), आपके लिए मेरा नमन और आह्वान है। (हुं विघ्नों का नाश करने वाला शक्ति बीज है)।

उत्पत्ति एवं शास्त्रीय संदर्भ

षडक्षर वक्रतुण्ड मंत्र भगवान गणेश के सबसे सरल, प्रसिद्ध और शक्तिशाली मंत्रों में से एक है। 'षडक्षर' का अर्थ है 'छः अक्षरों वाला'। यह मंत्र अपनी संक्षिप्तता के कारण अत्यंत लोकप्रिय है और इसे भगवान गणेश का प्रिय मंत्र माना जाता है। इसका जाप ऋद्धि-सिद्धि (भौतिक और आध्यात्मिक सफलता) तथा विशेष रूप से आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सफलता देने वाला माना गया है।
किसी भी मंत्र साधना को आरम्भ करने से पूर्व उसका विनियोग और ध्यान करना आवश्यक है, जो इस प्रकार है:
  • ऋषि: भार्गव
  • छंद: अनुष्टुप्
  • देवता: विघ्नेश (भगवान गणेश)
  • बीज: वं
  • शक्ति: यं
  • प्रयोजन: सभी अभीष्टों की सिद्धि (ममाभीष्ट सिद्धये)

ध्यान श्लोक एवं अर्थ

उद्यद्दिनेश्वररुचिं निजहस्तपद्मैः,
पाशांकुशाभयवरान्दधतं गजास्यम्।
रक्तांबरं सकलदुःखहरं गणेशं,
ध्यायेत्प्रसन्नमखिलाभरणामिरामम्॥
अर्थ: जो उदय होते हुए सूर्य के समान कांति वाले हैं, जो अपने कर-कमलों में पाश, अंकुश, अभय और वर धारण करते हैं, जो गज के समान मुख वाले हैं, जो लाल वस्त्र पहनते हैं, जो समस्त दुःखों को हरने वाले हैं, उन प्रसन्न और समस्त आभूषणों से सुशोभित श्री गणेश का मैं ध्यान करता हूँ।

शब्दार्थ एवं व्याख्या

वक्रतुण्डाय: 'वक्र' अर्थात मुड़ी हुई और 'तुण्ड' अर्थात सूंड। इसका अर्थ है 'मुड़ी हुई सूंड वाले को (नमन)'। यह अहंकार को मोड़ने और बाधाओं को नष्ट करने का प्रतीक है।
हुं: यह एक अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र है। इसे 'वर्चस बीज' या 'क्रोध बीज' भी कहा जाता है। यह नकारात्मकता, भय और शत्रुओं को नष्ट करने, एक सुरक्षा कवच बनाने और संकल्प शक्ति को प्रकट करने की ऊर्जा रखता है।

मंत्र जाप के लाभ

ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति

यह मंत्र भौतिक समृद्धि (ऋद्धि) और आध्यात्मिक व सांसारिक कार्यों में निपुणता (सिद्धि) प्रदान करता है।

आर्थिक सफलता

ग्रंथों के अनुसार, यह मंत्र विशेष रूप से व्यापार, नौकरी और धन-संबंधी मामलों में पूर्ण सफलता दिलाने में सहायक है।

विघ्नों का नाश

भगवान गणेश के किसी भी मंत्र की तरह, यह मंत्र भी जीवन के सभी क्षेत्रों से बाधाओं को दूर करता है।

भय और शत्रुओं से रक्षा

'हुं' बीज मंत्र की उपस्थिति के कारण, यह एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच बनाता है और आंतरिक व बाहरी शत्रुओं से रक्षा करता है।

मंत्र सिद्धि की विशेष विधि

शास्त्रों में इस मंत्र को सिद्ध करने की एक विशेष विधि बताई गई है, जिसे 'अनुष्ठान' कहा जाता है।
  1. संकल्प: सबसे पहले सवा लाख (1,25,000) मंत्र जाप का संकल्प लें।
  2. ब्रह्मचर्य: अनुष्ठान की पूरी अवधि के दौरान पूर्णतः ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना अनिवार्य है।
  3. जाप पूर्णता: सवा लाख मंत्र जाप पूरे होने के बाद, अनुष्ठान समाप्त नहीं होता।
  4. दशांश जप: इसके बाद किए गए कुल जप का दसवां हिस्सा (दशांश) यानी 12,500 मंत्रों का और जाप करें।
  5. आहुति (हवन): दशांश जप के बाद उसका भी दसवां हिस्सा, यानी 1,250 मंत्रों से हवन में आहुति दें। प्रत्येक मंत्र के अंत में 'स्वाहा' लगाकर आहुति दी जाती है।
इस प्रकार विधि-विधान से करने पर यह मंत्र सिद्ध हो जाता है और साधक को इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। सामान्य लाभ के लिए प्रतिदिन एक माला (108 बार) का जाप भी पर्याप्त है।

सामान्य प्रश्न

'षडक्षर' का क्या अर्थ है?

उत्तर: षडक्षर का अर्थ है 'छः अक्षर'। यह मंत्र छः अक्षरों से मिलकर बना है: व-क्र-तु-ण्डा-य-हुं।

क्या सिद्धि के लिए सवा लाख जप अनिवार्य है?

उत्तर: मंत्र को पूर्ण रूप से सिद्ध करने और उसके विशेष प्रभाव को प्राप्त करने के लिए अनुष्ठान विधि अनिवार्य मानी गई है। हालांकि, दैनिक पूजा में श्रद्धापूर्वक 108 बार जाप करने से भी भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और बाधाएं दूर होती हैं।

दशांश जप और आहुति का क्या महत्व है?

उत्तर: यह तांत्रिक और पौराणिक अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण अंग है। माना जाता है कि कुल जप का दशांश जप करने से जप की ऊर्जा स्थिर होती है और आहुति (हवन) के माध्यम से उस ऊर्जा को ब्रह्मांड और देवताओं तक पहुंचाया जाता है, जिससे अनुष्ठान पूर्ण और सफल होता है।