॥ हरिद्रा गणेश मन्त्र ॥
विनियोग:अस्य हरिद्रा गणनायक मन्त्रस्य मदन ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, हरिद्रागणनायको देवता, ममाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान:पाशांकुशौ मोदकमेकदंतं करैर्दधानं कनकासनस्थम्।
हारिद्रखण्डप्रतिभं त्रिनेत्रं पीतांशुकं रात्रि गणेशमीडे॥
मंत्र:ॐ हुं गं ग्लौं हरिद्रा गणपतये वरवरद सर्वजन हृदयं स्तंभय स्तंभय स्वाहा।
विनियोग:अस्य हरिद्रा गणनायक मन्त्रस्य मदन ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, हरिद्रागणनायको देवता, ममाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान:पाशांकुशौ मोदकमेकदंतं करैर्दधानं कनकासनस्थम्।
हारिद्रखण्डप्रतिभं त्रिनेत्रं पीतांशुकं रात्रि गणेशमीडे॥
मंत्र:ॐ हुं गं ग्लौं हरिद्रा गणपतये वरवरद सर्वजन हृदयं स्तंभय स्तंभय स्वाहा।
॥ अर्थ ॥
ॐ हुं गं ग्लौं (बीज मंत्र), हरिद्रा गणपति को नमन, जो वरदान देने वाले हैं। कृपया सभी जनों के हृदय को मेरी ओर आकर्षित और स्तंभित करें। स्वाहा।
ॐ हुं गं ग्लौं (बीज मंत्र), हरिद्रा गणपति को नमन, जो वरदान देने वाले हैं। कृपया सभी जनों के हृदय को मेरी ओर आकर्षित और स्तंभित करें। स्वाहा।
उत्पत्ति एवं शास्त्रीय संदर्भ
हरिद्रा गणेश मंत्र भगवान गणेश के 'हरिद्रा' स्वरूप को समर्पित है। 'हरिद्रा' का अर्थ है हल्दी, जो हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र, शुभ और औषधीय मानी जाती है। यह स्वरूप पीले वस्त्र धारण किये हुए और हल्दी के समान सुनहरी कांति वाला है। यह मंत्र विशेष रूप से गृहस्थ जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसका प्रभाव पौरुष, वीरता, वीर्य-स्तंभन (Semen retention) और पूर्ण सम्भोग सुख प्रदान करने तथा नपुंसकता को समाप्त करने के लिए जाना जाता है।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: मदन
- छंद: अनुष्टुप्
- देवता: हरिद्रागणनायक
- प्रयोजन: अभीष्ट सिद्धि के लिए (ममाभीष्टसिद्ध्यर्थे)
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
पाशांकुशौ मोदकमेकदंतं करैर्दधानं कनकासनस्थम्।
हारिद्रखण्डप्रतिभं त्रिनेत्रं पीतांशुकं रात्रि गणेशमीडे॥
हारिद्रखण्डप्रतिभं त्रिनेत्रं पीतांशुकं रात्रि गणेशमीडे॥
अर्थ: मैं उन रात्रि-पूजित गणेश का स्तवन करता हूँ, जो अपने हाथों में पाश, अंकुश, मोदक और एकदंत धारण करते हैं, जो स्वर्ण के आसन पर विराजमान हैं, जिनकी आभा हल्दी के टुकड़े के समान है, जिनके तीन नेत्र हैं और जो पीले वस्त्र धारण किये हुए हैं।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
ॐ हुं गं ग्लौं: ये शक्तिशाली बीज मंत्र हैं जो क्रमशः ब्रह्मांडीय ऊर्जा, बाधाओं का नाश, और पृथ्वी तत्व (स्थिरता) का आवाहन करते हैं।
हरिद्रा गणपतये: हल्दी के समान कांति वाले गणपति को।
वरवरद: वरदानों में भी श्रेष्ठ वरदान देने वाले।
सर्वजन हृदयं: सभी लोगों के हृदय को।
स्तंभय स्तंभय: स्तंभित करो, रोको या नियंत्रण में करो। इसका दोहरा अर्थ है - वीर्य को स्तंभित करना (रोकना) और दूसरों के हृदय को अपनी ओर आकर्षित करके स्तंभित करना।
स्वाहा: मैं यह ऊर्जा समर्पित करता हूँ।
संपूर्ण अर्थ: मैं ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आवाहन करता हूँ। हे हरिद्रा गणपति, हे श्रेष्ठ वरदान देने वाले, आप सभी लोगों के हृदय को मेरी ओर आकर्षित करके स्तंभित करें और मेरे भीतर की ऊर्जा (वीर्य) को भी स्तंभित करें। मैं यह प्रार्थना आपको समर्पित करता हूँ।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
सुखी गृहस्थ जीवन
यह मंत्र पति-पत्नी के बीच संबंधों को मधुर बनाता है और गृहस्थ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।
पौरुष और वीर्य वृद्धि
मंत्र में 'स्तंभय' शब्द विशेष रूप से वीर्य-स्तंभन की शक्ति प्रदान करता है, जिससे शारीरिक बल, पौरुष और यौन क्षमता में वृद्धि होती है।
नपुंसकता का निवारण
यह मंत्र यौन दुर्बलता और नपुंसकता जैसी समस्याओं को समाप्त करने के लिए एक अचूक उपाय माना गया है।
आकर्षण और सम्मोहन
'सर्वजन हृदयं स्तंभय' अंश साधक को एक आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करता है, जिससे सभी लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं।
साधना की विशेष विधि एवं नियम
यह साधना सरल होते हुए भी विशेष सावधानी और नियमों का पालन चाहती है:
- वस्त्र: साधना करते समय साधक को केवल पीले रंग के वस्त्र ही धारण करने चाहिए।
- माला: इस मंत्र के जाप के लिए हल्दी के टुकड़ों से बनी विशेष माला का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।
- आसन और शय्या: जाप के लिए आसन और रात्रि में सोने का बिछौना भी पीले रंग का होना चाहिए।
- आहार: दिन में केवल एक बार भोजन करें और उस भोजन में बेसन (चने का आटा) से बनी कोई एक वस्तु अवश्य होनी चाहिए।
- ब्रह्मचर्य: साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
सामान्य प्रश्न
"हरिद्रा गणेश" नाम क्यों है?
उत्तर: 'हरिद्रा' का अर्थ हल्दी है। भगवान गणेश का यह स्वरूप हल्दी के समान पीले वर्ण का है और उनकी पूजा में हल्दी तथा पीली वस्तुओं का विशेष महत्व है। हल्दी शुभता, स्वास्थ्य और सौभाग्य का प्रतीक है, जो इस मंत्र के प्रभावों को दर्शाती है।
'स्तंभय' शब्द का क्या महत्व है?
उत्तर: 'स्तंभन' एक तांत्रिक क्रिया है जिसका अर्थ है 'रोकना' या 'स्थिर कर देना'। इस मंत्र में इसका दोहरा प्रयोग है: पहला, शरीर के भीतर वीर्य को स्तंभित करके शारीरिक और यौन शक्ति को बढ़ाना, और दूसरा, बाहर के लोगों के मन और हृदय को अपनी ओर आकर्षित करके स्थिर कर देना।
क्या इस साधना के लिए गुरु की आवश्यकता है?
उत्तर: हाँ, यद्यपि यह साधना सरल बताई गई है, इसमें बीज मंत्रों और स्तंभन क्रिया का प्रयोग है। इसलिए किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में इसे करना सर्वोत्तम और सबसे सुरक्षित है ताकि कोई त्रुटि न हो।
