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श्रीनृसिंहार्तिः

Shri Nrisimhartih | Dugdhabdhimadhyasthala

श्रीनृसिंहार्तिः
जयदेव जयदेव जयकरुणामृतसिन्धो।
नृहरे पालय सततं जगदानतबन्धो॥

दुग्धाम्बुधिमध्यस्थलदृढयोगासीनम्
सुरवरमुकुटैर्रत्नैः रञ्जित पदनलिनम्।
वामाङ्कस्थितलक्ष्मीमुखमीलितनयनं
विद्युत्कुण्डलमण्डित विलसच्छुभवदनम्॥१॥

मायागुणपरिवेष्टनविस्मृतनिजरूपम्।
शरणं त्वामुपगतमिति करुणागतरूपम्॥
प्रह्लादनिजपुत्रं भगवत्स्मृतिनिरतम्।
हिरण्यकशिपुं धृत्वा बाधततं सततम्॥
आविर्भूय स्तम्भे हतवान् निशि यस्तम्।
निजभक्तं रक्षितवाननुभावितचित्तम्॥२॥

इत्यद्भुतनिजरूपैः कृतभूभारहरणम्।
दुर्धरनिजजनसंसृतिजनिधिसन्तरणम्॥
भद्रं त्वामनुसेवे तापत्रयहरणम्।
काशीदीक्षितसन्नतशरणप्रदचरणम्॥३॥
॥ इति काशीनाथोपाध्यायकृता श्रीनृसिंहार्तिः सम्पूर्णा ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीनृसिंहार्तिः" (काशीनाथ उपाध्याय कृत) भगवान नृसिंह की एक करुणापूर्ण स्तुति है। इसमें भगवान को 'करुणामृतसिन्धु' (करुणा का सागर) और 'जगदानतबन्धु' (संसार के रक्षक) कहकर संबोधित किया गया है।

आरती के मुख्य भाव

  • दिव्य स्वरूप (Divine Form): "दुग्धाम्बुधिमध्यस्थल" - भगवान क्षीरसागर के मध्य योगमुद्रा में विराजमान हैं। "विद्युत्कुण्डलमण्डित" - उनके कानों में बिजली के समान चमकने वाले कुंडल हैं।
  • भक्त वत्सलता (Love for Devotee): "प्रह्लादनिजपुत्रं" - उन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद को पुत्र के समान स्नेह दिया और हिरण्यकश्यप का वध कर उसकी रक्षा की।
  • ताप हरण (Removal of Suffering): "तापत्रयहरणम्" - भगवान नृसिंह दैहिक, दैविक और भौतिक - तीनों प्रकार के तापों (कष्टों) का हरण करने वाले हैं।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती नृसिंह जयंती, प्रदोष व्रत और प्रतिदिन की पूजा में गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान नृसिंह के शांत और सौम्य रूप का ध्यान करते हुए, श्रद्धापूर्वक इस आरती का गान करें।
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