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श्रीनृसिंहार्तिक्यम्

Shri Nrisimha Artikyam | Yah Kanakakashipurakarot

श्रीनृसिंहार्तिक्यम्
यः कनककशिपुरकरोत्साधौ संरम्भं, पुष्ट्वा गर्वं क्रोधं सद्वेषं दम्भं।
कर्तुमृतं भृत्यवचो भित्त्वाशु स्तम्भं, मार्तण्डमिवात्मानं कृतवानसि भान्तम्॥१॥
जय देव जय देव श्रीनरहरिमूर्ते! यत्तव नाम्नि फलमलं तन्नेष्टापूर्ते॥ध्रुव॥

भो भगवन्! सर्वसुजनमानसजलजाले! करुणा सर्वत्र कृता नैकस्मिन्बाले।
मोचय मामपि दीनं पतितं भवजाले, यत्तेजोऽस्ति तव नखे न हि तत्करवाले॥२॥

प्रह्लादं पितुरिव मां मोहादव दासं, दह दुरितं द्रुतमिद्धो दमुना इव घासम्।
दीनानामसि बन्धुर्मा कुरु परिहासं, भक्तमयूरघनार्पय पदपङ्कजवासम्॥३॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं नृसिंहार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीनृसिंहार्तिक्यम्" (मयूरेश्वर कृत) भगवान नृसिंह की एक भावपूर्ण स्तुति है। इसमें भक्त प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकश्यप के अहंकार के नाश का वर्णन करते हुए भगवान से दया की याचना की गई है।

आरती के मुख्य भाव

  • सत्य की रक्षा (Protection of Truth): "कर्तुमृतं भृत्यवचो" - अपने सेवक (प्रह्लाद) के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिए भगवान खंभे से प्रकट हुए।
  • सूर्य समान तेज (Radiance like Sun): "मार्तण्डमिवात्मानं" - भगवान का स्वरूप सूर्य (मार्तण्ड) के समान तेजस्वी और देदीप्यमान है।
  • शरणागति (Surrender): "मोचय मामपि दीनं" - कवि भगवान से प्रार्थना करते हैं कि जैसे उन्होंने प्रह्लाद को बचाया, वैसे ही उन्हें भी संसार रूपी जाल से मुक्त करें।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती नृसिंह जयंती और संकट निवारण के लिए विशेष रूप से गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान नृसिंह के चरणों में पूर्ण समर्पण भाव से, आरती की थाली घुमाते हुए इस स्तुति का गान करें।
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