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श्रीलक्ष्मीनृसिंहारात्रिका

Shri Lakshminrisimha Aratrika | Jaidev Jaidev Lakshminarasimham

श्रीलक्ष्मीनृसिंहारात्रिका
जयदेव जयदेव लक्ष्मीनरसिंहं
भवनग नाशन वज्रं सुखदायक देवम्॥

स्तम्भः कडकडशद्वैः सुरकुलभय भीतं।
पुलकित विह्वल मानस ब्रह्मादिक जातम्॥
भूधर कम्पित शिखरं गुरगुर शब्दयुतम्।
सागर सरिता उदकं समये सन्तप्तम्॥१॥

काञ्चनमणि भूषं रणशोभित देहं।
कण्ठेशोभित शुभ्रं अतिसुन्दर हारम्॥
जगद्वने मण्डित स्वच्छं चपला इव वस्त्रं।
दशनखछिद्यं स्थूलं दुर्धर अरिउदरम्॥२॥

प्रह्लादोत्तम भक्तः स्पर्शित द्वे चरणे।
नानागीतैर्वाद्यैः स्तुतदेवस्तवनम्॥
सागरतनुजा सहितं यस्याति श्रीवदनं।
खद्याक्षर सुतवरदं नित्यमहोरात्रम्॥३॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीलक्ष्मीनृसिंहारात्रिका" भगवान नृसिंह के उस रौद्र और अद्भुत स्वरूप का वर्णन करती है, जब वे भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए खंभे से प्रकट हुए थे। यह आरती भय और संकटों का नाश करने वाली है।

आरती के मुख्य भाव

  • स्तम्भ से प्राकट्य (Emergence from Pillar): "स्तम्भः कडकडशद्वैः" - भगवान नृसिंह का प्राकट्य खंभे को फाड़कर भयंकर गर्जना के साथ हुआ, जिससे देवता भी भयभीत हो गए।
  • हिरण्यकश्यप वध (Slaying of Hiranyakashipu): "दशनखछिद्यं स्थूलं" - भगवान ने अपने तीखे नखों से दुष्ट हिरण्यकश्यप का उदर विदीर्ण कर दिया।
  • भक्त वत्सलता (Love for Devotee): "प्रह्लादोत्तम भक्तः स्पर्शित द्वे चरणे" - अपने परम भक्त प्रह्लाद को देखकर भगवान शांत हुए और उसे अपने चरणों की शरण दी।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती नृसिंह जयंती, प्रदोष व्रत और किसी भी प्रकार के भय या संकट के समय गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान नृसिंह के चित्र या मूर्ति के सामने दीप जलाकर, पूर्ण समर्पण और निर्भयता के भाव से इस आरती का गान करें।
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