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श्रीनृसिंहार्तिः

Shri Nrisimha Arti | Devam Brahmashivadyairvandyam

श्रीनृसिंहार्तिः
देवं ब्रह्मशिवाद्यैर्वन्द्यं वन्देऽहम्। केसरिमुखनरदेहं हापितसन्देहम्॥जयदेव जयदेव॥ध्रु॥

स्वर्णकशिपुपादहतस्तम्भाविर्भूतम्। वामाङ्कस्थितचन्द्राननजलनिधिभूतम्। स्वाविर्भावविभूषितमाधवसितभूतम्॥देवं ब्रह्म॥१॥

घोरध्वानध्वानितजगदण्डाभोगम्। स्तब्धजटाजालजरितमिहिरादिनभोगम्। दीर्घभुजाधरितधराधरपन्नगभोगम्। भक्तश्रेणीविश्राणितवाञ्छितभोगम्॥देवं ब्रह्म॥२॥

खरतरनखरप्रखरविदारितरिपुहृदयम्। वह्निविषाम्बुत्रातप्रह्लादं, सदयम्॥ रोपविलोहितलोचनधिकृतरव्युदयम्। कनककशिपुनिर्मथनाद्वर्धितदिविषदयम्॥देवं ब्रह्म॥३॥

क्षीराकूपारान्तर्द्धपि कृतवासम्। चक्रपिनाकाभयवरधरकरमतिभासम्॥ प्रतिपक्षक्षोभक्षमचण्डाट्टहासम्। पालितपदनतदाजिज्योतिर्विद्वांसम्॥देवं ब्रह्म॥४॥
॥ इति श्रीलक्ष्मीनृसिंहार्तिः सम्पूर्णा ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीनृसिंहार्तिः" भगवान नृसिंह की एक शक्तिशाली स्तुति है, जिसमें उनके उस अद्भुत रूप का वंदन किया गया है, जिसकी पूजा स्वयं ब्रह्मा और शिव जैसे देवता भी करते हैं।

आरती के मुख्य भाव

  • देव वंदित (Worshipped by Gods): "देवं ब्रह्मशिवाद्यैर्वन्द्यं" - भगवान नृसिंह का स्वरूप इतना दिव्य और महान है कि ब्रह्मा और शिव आदि देवता भी उनकी वंदना करते हैं।
  • केसरी मुख (Lion Face): "केसरिमुखनरदेहं" - उनका मुख सिंह (केसरी) के समान और शरीर मनुष्य का है, जो भक्तों के संदेहों का नाश करता है।
  • स्तम्भ उद्भव (Emergence from Pillar): "स्वर्णकशिपुपादहतस्तम्भाविर्भूतम्" - हिरण्यकश्यप द्वारा लात मारे गए खंभे से वे प्रकट हुए।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती नृसिंह जयंती, प्रदोष और विशेष पूजा अवसरों पर गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान नृसिंह के रौद्र किन्तु भक्त-वत्सल रूप का ध्यान करते हुए, पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से इस आरती का गान करें।
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