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श्रीनृसिंहार्तिः

Shri Nrisimha Arti | Chhavikrita Raviparihasa

श्रीनृसिंहार्तिः
छविकृतरविपरिहासा क्षीराब्धिनिवासा, शारदहिमकरभासा मन्दमधुरहासा।
लक्ष्मीमूर्तविलासा काञ्चनमयवासा, रक्षितनिजपददासा कृतदनुजत्रासा॥१॥
जयदेव जयदेव जयजय नरसिंहा, सत्यज्ञानसुखात्मक विदलितकरिरंहा॥ध्रुवपद॥

छत्रीभूतभुजङ्गा चरणच्युतगङ्गा, भूता शतलसदङ्गा त्रिनयननिःसङ्गा।
कलितसुदर्शन शारङ्गा अभयवरासङ्गा, मुनिहृत्पङ्कजभृङ्गा विठ्ठलभवभङ्गा॥२॥
जयदेव जयदेव जयजय नरसिंहा, सत्यज्ञानसुखात्मक विदलितकरिरंहा॥
॥ इति श्रीनृसिंहार्तिः सम्पूर्णा ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीनृसिंहार्तिः" भगवान नृसिंह की एक अत्यंत मधुर और काव्यमय संस्कृत स्तुति है। इसमें भगवान के दिव्य तेज और उनकी भक्त-वत्सलता का सुंदर वर्णन किया गया है।

आरती के मुख्य भाव

  • दिव्य तेज (Divine Radiance): "छविकृतरविपरिहासा" - भगवान का तेज सूर्य का भी उपहास करने वाला (सूर्य से भी अधिक) है। "शारदहिमकरभासा" - उनकी कांति शरद ऋतु के चंद्रमा के समान शीतल और उज्ज्वल है।
  • क्षीरसागर निवास (Abode in Ocean of Milk): "क्षीराब्धिनिवासा" - वे क्षीरसागर में निवास करते हैं और लक्ष्मी जी के साथ विलास करते हैं।
  • भक्त रक्षक (Protector of Devotees): "रक्षितनिजपददासा" - वे अपने चरणों में आए दासों की रक्षा करते हैं और दानवों (हिरण्यकश्यप आदि) को भयभीत करते हैं।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती नृसिंह जयंती और प्रतिदिन की पूजा में भगवान को प्रसन्न करने के लिए गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान नृसिंह का ध्यान करते हुए, मंद और मधुर स्वर में इस स्तुति का गान करें।
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