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श्रीगणेश संस्कृतमारात्रिकम्

Shri Ganesha Sanskrit Aratrikam | Jai Dev Jai Dev Gajamukha

श्रीगणेश संस्कृतमारात्रिकम्
जयदेव जयदेव गजमुख सुखहेतो।
नेतर्विघ्नगणानां जाड्यर्णवसेतो॥

येन भवदुपायनतां नीता नवदूर्वा
विद्यासम्पत्कीर्तिस्तेनाप्ताऽपूर्वा।
मुक्तिर्लभ्या सुखतस्तव नित्याऽपूर्वा
धार्या जगतः स्थितये भूमौ दिवि पूर्वा॥१॥

प्रथमनमस्कृतिभाक् त्वं तव लोकप्रथितं
दृष्टं सद्व्यवहारे गुरुभिरपि च कथितम्।
यः कश्चन विमुखस्त्वयि निजसिद्धेः पथि तं
विविधा विघ्ना भगवन् कुर्वन्ति व्यथितम्॥२॥

बालं सकृदनुसरति त्वद्दृष्टिश्चेत्ता
मनुरासीमिव दास्यो विद्याः स हि वेत्ता।
पविपाणिरिव परं परपक्षाणां भेत्ता
भवति मयूरोऽहेरिव मोहस्यच्छेत्ता॥३॥
॥ इति श्रीमयूरकविविरचितं श्रीगणेश संस्कृतमारात्रिकं सम्पूर्णम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीगणेश संस्कृतमारात्रिकम्" मयूर कवि द्वारा रचित भगवान गणेश की एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण संस्कृत आरती है। इसमें गणेश जी को 'गजमुख' और 'सुखहेतु' (सुख का कारण) बताकर उनकी वंदना की गई है।

आरती के मुख्य भाव

  • जाड्य अर्णव सेतु (Bridge over Ignorance): "जाड्यर्णवसेतो" - भगवान गणेश अज्ञान (जड़ता) रूपी सागर को पार करने के लिए सेतु (पुल) के समान हैं।
  • प्रथम पूज्य (First Worshipped): "प्रथमनमस्कृतिभाक् त्वं" - सभी शुभ कार्यों में सबसे पहले आपकी ही पूजा और नमस्कार किया जाता है।
  • दूर्वा अर्पण (Offering Durva): "येन भवदुपायनतां नीता नवदूर्वा" - जो भक्त आपको नवीन दूर्वा अर्पित करता है, उसे अपूर्व विद्या, संपत्ति और कीर्ति प्राप्त होती है।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती गणेश चतुर्थी, बुधवार और प्रतिदिन की पूजा में गाई जा सकती है।
  • विधि (Method): भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाकर, मोदक का भोग लगाकर और दीप प्रज्वलित कर इस आरती का पाठ करें।
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