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श्रीगजाननारात्रिका

Shri Gajanana Aratrika | Jai Dev Jai Gajamukhadeva

श्रीगजाननारात्रिका
जय देव जय देव जयगजमुखदेव।
सच्चित्सुखघनरूप सर्वानन्दकर॥

ओङ्कारैकस्वरूप परब्रह्माकार
सर्वाभयवररूप नित्यं मोक्षकर।
सर्वामरनुतमार्चनसंस्कृतपदयुगल
सर्वाग्रणिविधिहरिहरसर्वामररूप॥१॥

तिमिराज्ञाननिवारकदिनमणिमतिशुद्ध
भवभयहरचिद्रत्नं सकलाभीष्टकर।
दैवीसम्पत्पूरितनिजसुखकरचन्द्र
आत्मज्ञानविरक्तिश्रेयस्सिद्धिकर॥२॥

ॐ गं गणपतयेनघमनुविग्रहदेव
सकलपापविनाशकमङ्गलमतिपूत।
दोषघ्न पापघ्न शापघ्न विभव
विघ्नाम्बुधिशोषणकरमद्भुतमुखकमल॥३॥

स्वानन्दामृतलोक वैदिकधर्मगुरो
श्रुतिपावितसच्चरितप्रदमतिहितवन्।
धर्मोद्धारधुरीण धरणीभाग्यकर
अविरततत्त्वमसीति बोधनपटुदेव॥४॥

सुमुखविनायकनाम्ना कृतयुगपरिपाल
गणेश इति नाम्ना तु त्रेतापरिपाल।
गजमुखनाम्नाप्येवं द्वापरपरिपाल
कलिकामादिनिवारणब्रह्मानन्दकर॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीगजाननारात्रिका" भगवान गणेश की एक अत्यंत प्रभावशाली संस्कृत आरती है। इसमें उन्हें 'गजमुखदेव' और 'ओङ्कारैकस्वरूप' (ॐकार का साक्षात् स्वरूप) कहकर वंदना की गई है। यह आरती विघ्नों का नाश करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली है।

आरती के मुख्य भाव

  • ओङ्कार स्वरूप (Embodiment of Omkara): "ओङ्कारैकस्वरूप परब्रह्माकार" - भगवान गणेश साक्षात् ॐ और परब्रह्म के स्वरूप हैं।
  • विघ्न नाशक (Destroyer of Obstacles): "विघ्नाम्बुधिशोषणकर" - वे विघ्नों के सागर को सोखने वाले (सुखाने वाले) हैं।
  • युगों के पालक (Protector of Ages): "कृतयुगपरिपाल... त्रेतापरिपाल" - वे सतयुग में 'विनायक', त्रेता में 'गणेश', द्वापर में 'गजमुख' और कलियुग में 'धूम्रकेतु' (आदि) नामों से भक्तों का पालन करते हैं।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान गणेश को दूर्वा और मोदक अर्पित कर, धूप-दीप जलाकर श्रद्धापूर्वक इस संस्कृत आरती का गान करें।
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