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श्रीदत्तात्रेयारात्रिका

Shri Dattatreya Aratrika | Jai Dev Jai Dattatreya

श्रीदत्तात्रेयारात्रिका
जय देव जय देव जय दत्तात्रेय।
श्रीसद्गुरुमवधूत मुनिमानसहंस॥

अनसूयात्मज त्रिगुणातीत निजरूप।
सुखघनमाक्रमामल वरणीयसार॥
निर्धूताखिलबन्धन तत्त्वमसिध्येय।
अत्र्यनसूयादत्तो बोद्धुं निजतत्त्वमसि॥१॥

भात्यस्तिप्रियवृत्तौ सच्चित्सुखमात्र।
रेजे त्वयि अद्वयब्रह्मैवाहं तत्त्वं नित्यम्॥
त्रिभिरपि निजमुखकमलैः सच्चित्सुखमित्थं।
ब्रह्मैवाहं तत्त्वं बोधयसि स्वीयम्॥२॥

हरिहरविधिरूपैरपि त्रिगुणैरुपेत।
सच्चित्सुखब्रह्मैवं विमलात्मैवाहमिति॥
ज्ञानविरक्त्युपरतय इतिसाधनत्रितयं।
निजपदसम्प्राप्त्यर्थं बोधयसि स्वार्थम्॥३॥

जगदुद्धरणविधात्रीं निजशक्तीं विद्यां।
धवलां धेनुस्वरूपां संरक्षस्याद्याम्॥
नो शुनकान् वेदांश्च संरक्षसि नित्यं।
वेदवेदस्तुतपरमात्मा दत्तस्तवं सत्यम्॥४॥

नो माया नाविद्या किञ्चिन्नो द्वैतं।
जीवेशौ वापि नैवं पिण्डं ब्रह्माण्डम्॥
एकं समरसभूतं ब्रह्मानन्दघनं।
पञ्चारात्रिका सहजा निर्गुण आत्मपदे॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीदत्तात्रेयारात्रिका" भगवान दत्तात्रेय की स्तुति में रचित एक संस्कृत आरती है। इसमें उन्हें 'सद्गुरु', 'अवधूत' और 'मुनिमानसहंस' (मुनियों के मन रूपी सरोवर में विहार करने वाले हंस) के रूप में वंदित किया गया है।

आरती के मुख्य भाव

  • अनसूयात्मज (Son of Anasuya): "अनसूयात्मज त्रिगुणातीत" - वे माता अनसूया के पुत्र हैं और तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे हैं।
  • तत्त्वमसि (Thou Art That): "तत्त्वमसिध्येय" - वे वेदान्त के महावाक्य 'तत्त्वमसि' (वह तुम ही हो) का साक्षात् स्वरूप हैं।
  • अद्वय ब्रह्म (Non-Dual Brahman): "अद्वयब्रह्मैवाहं" - वे अद्वैत ब्रह्म का ज्ञान कराने वाले हैं कि 'मैं ही ब्रह्म हूँ'।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती दत्तात्रेय जयंती, गुरु पूर्णिमा, और गुरुवार को गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति या चित्र के समक्ष पंचाराती (पाँच बत्तियों वाला दीपक) जलाकर इस आरती का गान करें।
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