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श्रीदत्तार्तिक्यम्

Shri Datta Artikyam | Jai Bhagavan Yogishwara Datta

श्रीदत्तार्तिक्यम्
जय भगवन् जय भगवन् योगीश्वर दत्त।
त्वत्तः सर्वः कुशलं प्राप्तो, नो मत्तः॥

गुरुणापि सता भवता जनसङ्ग्रहमतिना।
गुरवो बहवोऽत्र कृता दर्शितसद्गतिना॥
सञ्चित्सुखरूपं त्वां देव तथा सति ना।
न भजति विषयी स समः स्पष्टं मलरतिना॥१॥

अपि च कृतं खलु दशशतभुजमर्जुनभूपं।
श्रुत्वालर्कं च सकृन्नमनात्सुखरूपं॥
भजति जनस्त्वां सिन्धुं मुक्त्वान्यं कूपं।
शूलं वोढुं त्यक्त्वा सौवर्णं यूपम्॥२॥

गृण्हाति यया मूढोऽयं मारं मस्तके।
प्रविशति निरवधिसुखदे न तव यशसि शस्ते॥
भक्तमयूरं करुणाघन नर्तयतस्ते।
सा मायास्तेमायाधिप वत्सल हस्ते॥३॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं श्रीदत्तार्तिक्यम् सम्पूर्णम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीदत्तार्तिक्यम्" भगवान दत्तात्रेय की एक अत्यंत सुंदर और दार्शनिक संस्कृत आरती है। भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का सम्मिलित अवतार माना जाता है। वे आदि गुरु हैं और योगियों के ईश्वर (योगीश्वर) कहलाते हैं।

आरती के मुख्य भाव

  • योगीश्वर दत्त (Lord of Yogis): "जय भगवन् योगीश्वर दत्त" - वे सभी योगियों के स्वामी और परम गुरु हैं।
  • सच्चित्सुखरूप (Embodiment of Truth-Consciousness-Bliss): "सञ्चित्सुखरूपं त्वां" - उनका स्वरूप सत्, चित् और आनंद (सच्चिदानंद) है।
  • गुरु परंपरा (Tradition of Gurus): "गुरवो बहवोऽत्र कृता" - उन्होंने प्रकृति के 24 तत्वों को अपना गुरु मानकर यह शिक्षा दी कि ज्ञान कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती दत्तात्रेय जयंती, गुरु पूर्णिमा, और गुरुवार को विशेष रूप से गाई जाती है।
  • विधि (Method): भगवान दत्तात्रेय की पादुकाओं या मूर्ति का पूजन कर, श्रद्धा और भक्ति भाव से इस संस्कृत आरती का गान करें।
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