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श्रीतुकारामांची आरती (प्रपंञ्चरचना)

Sant Tukaram Aarti in Marathi

श्रीतुकारामांची आरती (प्रपंञ्चरचना)
जय जयाजी सद्गुरु तुकया दातारा।
तारक तू सकळांचा जिवलग सोयरा॥

प्रपंञ्चरचना सर्वहि भोगूनि त्यागिली।
अनुतापाचे ज्वाळी देहबुद्धि हरविली॥
वैराग्याची निष्ठा प्रगटुनि दाखविली।
अहंममता दवडुनि निजशान्ती वरिली॥१॥

हरिभक्तीचा महिमा विशेष वाढविला।
विरक्त ज्ञानाचा ठेवा उघडुनि दाखविला॥
जगदुद्धारालागीं उपाय सुचविला।
निंदक दुर्जनाचा संदेह निरसीला॥२॥

तेरा दिवस वह्या रक्षुनियां उदकीं।
कोरड्याचि काढुनि दाखविल्या शेखी॥
अपार कविताशक्ति मिणवुनि इहलोकीं।
कीर्तन श्रवणें तुमच्या उद्धरति जन लोकीं॥३॥

बाळवेष घेऊनि श्रीहरी भेटला।
विधि जनिता तोचि आठव हा दीधला॥
तेणें ब्रह्मानन्दे प्रेमा डोलविला।
न तुके म्हणोनि तुका नामीं गौरविला॥४॥

प्रयाणकाळीं देवें विमान पाठविलें।
कळिच्या काळामाजी अद्भुत वर्तविलें॥
मानव देह घेऊनि निजधामा गेले।
निळा म्हणे सकळ संत तोषविले॥५॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

यह आरती संत तुकाराम महाराज (Sant Tukaram Maharaj) को समर्पित एक और महत्वपूर्ण मराठी स्तुति है, जिसकी रचना उनके प्रमुख शिष्य, संत निळोबा (Sant Niloba) ने की थी। "जय जयाजी सद्गुरु तुकया दातारा" से प्रारंभ होने वाली यह आरती, संत तुकाराम के जीवन की प्रमुख घटनाओं और उनकी आध्यात्मिक महानता का सार प्रस्तुत करती हैं। निळोबा महाराज, तुकाराम जी को अपना 'सद्गुरु' मानते थे, और इस आरती में उन्होंने अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त की है। यह आरती तुकाराम महाराज के संघर्षों, उनके चमत्कारों और अंततः उनके सदेह वैकुंठ-गमन की अद्भुत लीला का वर्णन करती हैं।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती संत तुकाराम के जीवन और शिक्षाओं का एक सुंदर सारांश है:

  • वैराग्य और आत्म-ज्ञान (Renunciation and Self-Knowledge): "प्रपंञ्चरचना सर्वहि भोगूनि त्यागिली। अनुतापाचे ज्वाळी देहबुद्धि हरविली॥" - इन पंक्तियों में कहा गया ਹੈ कि तुकाराम जी ने सभी सांसारिक सुखों को भोगकर भी उनका त्याग कर दिया और पश्चाताप की अग्नि में अपनी देह-बुद्धि (body-consciousness) को जला दिया।
  • अभंगों का चमत्कार (Miracle of the Abhangas): "तेरा दिवस वह्या रक्षुनियां उदकीं। कोरड्याचि काढुनि दाखविल्या शेखी॥" - यह आरती भी उस प्रसिद्ध चमत्कार का उल्लेख करती है जब संत तुकाराम के अभंगों की पांडुलिपियां 13 दिनों तक नदी में रहने के बाद भी सूखी निकल आईं थीं।
  • सदेह वैकुंठ-गमन (Ascension to Vaikuntha in the Mortal Body): "प्रयाणकाळीं देवें विमान पाठविलें। मानव देह घेऊनि निजधामा गेले॥" - यह पंक्ति तुकाराम महाराज के जीवन की सबसे अद्भुत घटना का वर्णन करती हैं। माना जाता है कि वे एकमात्र ऐसे संत हैं जिन्हें भगवान विष्णु स्वयं विमान भेजकर सदेह अपने दिव्य धाम, वैकुंठ, ले गए।
  • गुरु-शिष्य परंपरा (Guru-Disciple Tradition): अंतिम पंक्ति "निळा म्हणे सकळ संत तोषविले" में, रचयिता संत निळोबा कहते हैं कि तुकाराम जी ने अपने कार्यों से सभी संतों को संतुष्ट किया। यह गुरु के प्रति शिष्य की गहरी भक्ति और सम्मान को दर्शाता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती वारकरी संप्रदाय में भजन और कीर्तन सत्र के दौरान भक्तिभाव से गाई जाती है।
  • तुकाराम बीज (Tukaram Beej) के दिन, जो फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है। इस आरती का गान विशेष महत्व रखता हैं।
  • जो साधक भक्ति के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहते हैं और सांसारिक मोह से मुक्त होना चाहते हैं, उनके लिए यह आरती अत्यंत प्रेरणादायक है।
  • इस आरती का पाठ करने से गुरु-कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आध्यात्मिक उन्नति (spiritual progress) के लिए मार्गदर्शन मिलता हैं।
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