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श्रीतुकारामांची आरती (आरती तुकारामा)

Sant Tukaram Aarti in Marathi

श्रीतुकारामांची आरती (आरती तुकारामा)
आरती तुकारामा। स्वामी सद्गुरुधामा॥
सच्चिदानंद मूर्ती। पाय दाखवी आम्हां॥

आरती तुकारामा। स्वामी सद्गुरुधामा॥
सच्चिदानंद मूर्ती। पाय दाखवी आम्हां॥
राघवें सागरांत। पाषाण तारीले॥
तैसे हें तुकोबाचे। अभंग उदकीं रक्षिले॥
आरती तुकाराम॥

आरती तुकारामा। स्वामी सद्गुरुधामा॥
सच्चिदानंद मूर्ती। पाय दाखवी आम्हां॥

तुकितां तुलनेसी। ब्रह्म तुकासी आले॥
म्हणोनि रामेश्वरें। चरणीं मस्तक ठेविले॥

आरती तुकारामा। स्वामी सद्गुरुधामा॥
सच्चिदानंद मूर्ती। पाय दाखवी आम्हां॥

आरती तुकारामा। स्वामी सद्गुरुधामा॥
सच्चिदानंद मूर्ती। पाय दाखवी आम्हां॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"आरती तुकारामा" महाराष्ट्र के महानतम संतों में से एक, संत तुकाराम महाराज (Sant Tukaram Maharaj) को समर्पित एक भावपूर्ण आरती है। तुकाराम महाराज 17वीं सदी के एक महान कवि-संत और वारकरी संप्रदाय (Varkari Sampradaya) के प्रमुख स्तंभ थे। उनकी भक्ति भगवान विट्ठल के प्रति थी और उनके द्वारा रचे गए 'अभंग' आज भी महाराष्ट्र के घर-घर में गाए जाते हैं। यह आरती उन्हें 'स्वामी सद्गुरुधामा' (सद्गुरु का निवास) और 'सच्चिदानंद मूर्ती' (सत्य, चित्त, और आनंद की प्रतिमूर्ति) के रूप में पूजती है। यह आरती उनके जीवन की दो सबसे महत्वपूर्ण और चमत्कारी घटनाओं का स्मरण कराती है, जो उनकी भक्ति की शक्ति और महानता को प्रमाणित करती हैं।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती संत तुकाराम के जीवन के दो चमत्कारों पर केंद्रित है:

  • अभंगों का चमत्कार (Miracle of the Abhangas): "राघवें सागरांत पाषाण तारीले, तैसे हे तुकोबाचे अभंग उदकीं रक्षिले" - इस पंक्ति में भगवान राम द्वारा समुद्र पर पत्थर तैराने के चमत्कार की तुलना संत तुकाराम के चमत्कार से की गई है। जब कुछ रूढ़िवादी लोगों ने उनके अभंगों (devotional poems) की पांडुलिपियों को इंद्रायणी नदी में डुबो दिया, तो तुकाराम जी ने 13 दिनों तक अन्न-जल त्याग कर विट्ठल का ध्यान किया। तेरहवें दिन, वे पांडुलिपियाँ पानी पर तैरती हुई वापस आ गईं। यह घटना उनकी भक्ति की असीम शक्ति का प्रतीक है।
  • ब्रह्म और तुकाराम की एकता (Oneness of Brahman and Tukaram): "तुकितां तुलनेसी ब्रह्म तुकासी आलें" - इसका अर्थ है कि जब तुकाराम की तुलना (तुला में) परब्रह्म से की गई, तो दोनों बराबर निकले। यह उनके अद्वैत (non-duality) की सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था को दर्शाता है, जहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं। "म्हणुनी रामेश्वरें चरणीं मस्तक ठेविलें" - इस महानता को देखकर रामेश्वर भट्ट जैसे विद्वान ब्राह्मण, जो पहले उनके आलोचक थे, ने भी उनके चरणों में अपना मस्तक झुका दिया।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती महाराष्ट्र में वारकरी भक्तों द्वारा अपनी दैनिक संध्या-आरती में प्रमुखता से गाई जाती है। इसे अक्सर विट्ठल और ज्ञानदेव की आरती के बाद गाया जाता है।
  • आषाढ़ी एकादशी (Ashadhi Ekadashi) और कार्तिकी एकादशी (Kartiki Ekadashi) के अवसर पर पंढरपुर की यात्रा (वारी) के दौरान इसका सामूहिक गान किया जाता है।
  • तुकाराम बीज (Tukaram Beej), जो संत तुकाराम के वैकुंठ-गमन का दिन है, पर इस आरती का विशेष महत्व है।
  • इस आरती का पाठ करने से साधक को भक्ति-मार्ग में आने वाली बाधाओं से लड़ने की प्रेरणा मिलती है और श्रद्धा और विश्वास (faith and belief) में वृद्धि होती है।
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