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श्री सद्गुरुंची आरती

Shree Sadguru Aarti (Marathi) | Sagun He Aarti

श्री सद्गुरुंची आरती
सगुण हे आरती निर्गुण ओंवाळू।
कल्पनेचें घृत घालूं दीप पाजळू॥१॥

ओंवाळू आरती सद्गुरुनाथा श्रीगुरुनाथा।
भावें चरणकमळावरी ठेविला माथा॥

अविद्येचा मोह पडला उपडोनी सांडूं।
आशा मनशा तृष्णा काम क्रोध कुरवंडू॥२॥

सद्गुरूचे पूजन केले षोडशोपचारे।
रामानंद जीवन्मुक्त झाला संसारी॥३॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"सगुण हे आरती" एक अद्वितीय रचना है जो सगुण (साकार) भक्ति से निर्गुण (निराकार) सत्य की ओर ले जाती है। यह आरती सद्गुरु को साक्षात परब्रह्म मानकर उनकी पूजा करती है और अज्ञान के अंधकार को दूर करने की प्रार्थना करती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

  • सगुण से निर्गुण की यात्रा (Journey from Form to Formless): "सगुण हे आरती निर्गुण ओंवाळू" - हम सद्गुरु के सगुण रूप की आरती करते हैं ताकि हम निर्गुण तत्व को समझ सकें और उसमें लीन हो सकें।
  • कल्पना का घृत (Ghee of Imagination): "कल्पनेचें घृत घालूं दीप पाजळू" - हम अपनी कल्पना और भक्ति रूपी घी डालकर ज्ञान का दीपक जलाते हैं, जो अज्ञान को नष्ट करता है।
  • अविद्या और मोह का नाश (Destruction of Ignorance): "अविद्येचा मोह पडला उपडोनी सांडूं" - सद्गुरु की कृपा से अविद्या (Ignorance) और मोह (Delusion) का पर्दा हट जाता है और हम काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों को त्याग देते हैं।

पौराणिक संदर्भ (Mythological Context)

आरती के अंत में संत रामानंद (Ramanand) का उल्लेख है, जो सद्गुरु की कृपा से संसार में रहते हुए भी जीवनमुक्त (Jivanmukta - Liberated while living) हो गए। यह दर्शाता है कि गृहस्थ जीवन में भी मोक्ष संभव है।

आरती/पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • विशेष अवसर (Special Occasions): यह आरती नित्य उपासना, गुरुवार और दत्त जयंती के अवसर पर विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।
  • विधि (Method): आरती करते समय मन में यह भाव रखें कि आप अपने अहंकार और अज्ञान को गुरु के चरणों में समर्पित कर रहे हैं और ज्ञान का प्रकाश मांग रहे हैं।
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