धन्य धन्य हे प्रदक्षिणा सद्गुरुरायाची।
झाली त्वरा सुरवरां विमान उतरायाची॥
पदोपदीं अपार झाल्या पुण्याच्या राशी।
सर्वही तीर्थे घडलीं आम्हा आदिकरुनि काशी॥१॥
मृदंग टाळ घोळ भक्त भावार्थे गाती।
नामसंकीर्तनें ब्रह्मानंदें नाचती॥२॥
कोटि ब्रह्महत्या हरती करितां दंडवत।
लोटांगण घालितां मोक्ष लोळे पायांत॥३॥
गुरुभजनाचा महिमा न कळे आगमा-निगमांसी।
अनुभव ते जाणती जे गुरुपदिंचे रहिवासी॥४॥
प्रदक्षिणा करूनि देह भावें वाहिला।
श्रीरंगात्मज विठ्ठल पुढें उभा राहिला॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
झाली त्वरा सुरवरां विमान उतरायाची॥
पदोपदीं अपार झाल्या पुण्याच्या राशी।
सर्वही तीर्थे घडलीं आम्हा आदिकरुनि काशी॥१॥
मृदंग टाळ घोळ भक्त भावार्थे गाती।
नामसंकीर्तनें ब्रह्मानंदें नाचती॥२॥
कोटि ब्रह्महत्या हरती करितां दंडवत।
लोटांगण घालितां मोक्ष लोळे पायांत॥३॥
गुरुभजनाचा महिमा न कळे आगमा-निगमांसी।
अनुभव ते जाणती जे गुरुपदिंचे रहिवासी॥४॥
प्रदक्षिणा करूनि देह भावें वाहिला।
श्रीरंगात्मज विठ्ठल पुढें उभा राहिला॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Dhanya dhanya he pradakshina sadgururayachi,
Jhali tvara suravaran viman utarayachi. ||
Padopadin apar jhalya punyachya rashi,
Sarvahi tirthe ghadalin aamha aadikaroni kashi. ||1||
Mridang taal ghol bhakt bhavarthe gaati,
Naamsankirtanen brahmananden naachati. ||2||
Koti brahmahatya harati karitan dandavat,
Lotangan ghalitan moksha lole payant. ||3||
Gurubhajanacha mahima na kale aagama-nigamansi,
Anubhav te jaanati je gurupadinche rahivasi. ||4||
Pradakshina karuni deha bhaven vahila,
Shrirangatmaj vitthal pudhen ubha rahila. ||5||
॥ Iti Sampurnam ॥
Jhali tvara suravaran viman utarayachi. ||
Padopadin apar jhalya punyachya rashi,
Sarvahi tirthe ghadalin aamha aadikaroni kashi. ||1||
Mridang taal ghol bhakt bhavarthe gaati,
Naamsankirtanen brahmananden naachati. ||2||
Koti brahmahatya harati karitan dandavat,
Lotangan ghalitan moksha lole payant. ||3||
Gurubhajanacha mahima na kale aagama-nigamansi,
Anubhav te jaanati je gurupadinche rahivasi. ||4||
Pradakshina karuni deha bhaven vahila,
Shrirangatmaj vitthal pudhen ubha rahila. ||5||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"धन्य धन्य हे प्रदक्षिणा" आरती सद्गुरु (Sadguru) की परिक्रमा (प्रदक्षिणा) की महिमा का वर्णन करती है। यह आरती बताती है कि गुरु की प्रदक्षिणा करना सभी तीर्थों की यात्रा करने के समान फलदायी है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
- प्रदक्षिणा का पुण्य (Merit of Circumambulation): "पदोपदीं अपार झाल्या पुण्याच्या राशी" - गुरु की प्रदक्षिणा के हर कदम पर अपार पुण्य की प्राप्ति होती है। यह काशी यात्रा (Kashi Yatra) और अन्य सभी तीर्थों के पुण्य के समान है।
- पाप नाश (Destruction of Sins): "कोटि ब्रह्महत्या हरती करितां दंडवत" - गुरु को साष्टांग प्रणाम (दंडवत) करने से करोड़ों जन्मों के पाप, यहाँ तक कि ब्रह्महत्या (Brahmahatya) जैसा महापाप भी नष्ट हो जाता है।
- मोक्ष प्राप्ति (Attainment of Moksha): "लोटांगण घालितां मोक्ष लोळे पायांत" - गुरु के चरणों में लोटांगण (rolling prostration) करने से मोक्ष (Salvation) स्वयं चरणों में लोटता है, अर्थात सहज प्राप्त हो जाता है।
पौराणिक संदर्भ (Mythological Context)
आरती के अंत में उल्लेख है कि प्रदक्षिणा पूर्ण होने पर स्वयं भगवान विठ्ठल (Lord Vitthal) भक्त के सामने प्रकट होते हैं ("श्रीरंगात्मज विठ्ठल पुढें उभा राहिला"), जो गुरु और ईश्वर की एकता को दर्शाता है।
आरती/पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
- विशेष अवसर (Special Occasions): यह आरती विशेष रूप से गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima), दत्त जयंती और गुरुवार को गाई जाती है।
- विधि (Method): आरती गाते समय गुरु या उनकी पादुकाओं की प्रदक्षिणा करें। यदि स्थान कम हो, तो अपने स्थान पर ही गोल घूमकर प्रदक्षिणा की जा सकती है।
