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श्री शाकम्भरी आरती (जय शङ्करि शाकम्भरी)

Shakambhari Aarti Sanskrit

श्री शाकम्भरी आरती (जय शङ्करि शाकम्भरी)
जय शङ्करि शाकम्भरी सुतिलकवनगेहे।
वितरय करुणापाङ्गं निजमिह मम देहे॥ध्रु॥

दुर्घटहटदुर्गासुरभटसंहृतितोषे।
अत्युत्कटसङ्कटनतखेटोत्करपोषे॥
कटितटसङ्घटपिङ्गटपटुसद्द्टुवेषे।
कुटिलालकपटलस्फुटकटकादिकमूषे॥१॥

लक्षाधिकरक्षोगणशिक्षाकृतदीक्षे।
दाक्षायणि यक्षाधिपलक्ष्मिदिक्कटाक्षे॥
साक्षात्कृतमोक्षोदयभिक्षुकजनरक्षे।
रक्षां कुरु रक्षां कुरु मम पूर्णापेक्षे॥२॥

चिन्तकजनचर्चित फलचितामणि चरणे।
सन्तापत्रयहरणे मत्सन्ततिशरणे॥
दान्तश्रीमद्रामानदान्तःकरणे।
सन्तोषय सन्तोषय मातः सुखकरणे॥३॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"जय शङ्करि शाकम्भरी" देवी शाकम्भरी को समर्पित एक अत्यंत काव्यात्मक और भावपूर्ण संस्कृत आरती है। इस आरती की मुख्य विशेषता इसका सीधा और व्यक्तिगत निवेदन है। भक्त देवी को 'शङ्करि' (शंकर की पत्नी) और 'शाकम्भरी' (वनस्पतियों की देवी) के रूप में संबोधित करता है और उनसे सीधे अपने ऊपर करुणा दृष्टि डालने की प्रार्थना करता है ("वितरय करुणापाङ्गं निजमिह मम देहे")। यह आरती देवी के शक्तिशाली और दुष्ट-नाशक रूप का भी गुणगान करती है, लेकिन इसका मूल भाव भक्त की व्यक्तिगत पुकार और देवी की कृपा-दृष्टि (compassionate glance) की आकांक्षा है। इसकी जटिल और अलंकृत संस्कृत भाषा भक्ति में एक गहनता और शास्त्रीयता का अनुभव कराती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती देवी के रक्षक, पालक और मोक्षदाता स्वरूपों का एक साथ वर्णन करती है:

  • दुष्टों का संहार करने वाली (Vanquisher of the Wicked): "दुर्घटहटदुर्गासुरभटसंहृतितोषे" - यह पंक्ति उस देवी का वर्णन करती है जो दुष्ट और हठी दुर्गासुर जैसे राक्षसों का संहार करके प्रसन्न होती हैं। यह भक्तों को आश्वासन देता है कि देवी हमेशा बुराई पर विजय (victory over evil) प्राप्त करती हैं।
  • शरणागतों की रक्षक (Protector of the Devotees): "अत्युत्कटसङ्कटनतखेटोत्करपोषे" - वे उन भक्तों के समूह का पोषण और रक्षा करती हैं जो अत्यंत कठिन संकटों में उनके सामने झुकते हैं। यह देवी के शरणागत-वत्सल स्वभाव को दर्शाता है।
  • मोक्ष प्रदान करने वाली (Bestower of Liberation): "साक्षात्कृतमोक्षोदयभिक्षुकजनरक्षे" - वे उन humble seekers (भिक्षुकजन) की रक्षा करती हैं, जिन्होंने मोक्ष को ही अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया है। यह देवी के आध्यात्मिक रूप को उजागर करता है, जो भक्तों को सांसारिक बंधनों से मुक्त करती हैं।
  • चिंतामणि-स्वरूपी चरण (Wish-fulfilling Feet): "चिन्तकजनचर्चित फलचिन्तामणि चरणे" - उनके चरण उन भक्तों के लिए चिंतामणि रत्न के समान हैं, जो उनका ध्यान करते हैं। जैसे चिंतामणि हर इच्छा पूरी करती है, वैसे ही देवी के चरण भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं, चाहे वे भौतिक हों या आध्यात्मिक (material or spiritual)।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती शाकम्भरी नवरात्रि (पौष मास) और शारदीय नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन की जा सकती है।
  • शुक्रवार के दिन देवी की पूजा के अंत में इस आरती का पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
  • इसकी जटिल संस्कृत के कारण, इसे शांत और एकाग्र मन से पढ़ना चाहिए। इसका शुद्ध उच्चारण वातावरण में शक्तिशाली सकारात्मक कंपन (powerful positive vibrations) पैदा करता है।
  • इस आरती का पाठ करने से न केवल भौतिक सुख-समृद्धि प्राप्त होती है, बल्कि यह आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और a deep connection with the divine mother स्थापित करने में भी मदद करती है।
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