जय देवि जय देवि जय जगदाधारे।
शाकम्भरि विश्वेश्वरि जय तिलकागारे॥ध्रु॥
वर्षाभावान्मातः शतवर्षम्भुवनम्।
अन्नाभावाज्जातं कामदभिपन्नम्॥
चक्षुःशतकाद्वर्षं वर्षन्त्या भुवनम्।
शताक्षिरक्षितमेतद्दत्वा पूर्णान्नम्॥१॥
निजतनुसम्भवशाकैरक्षितमितिभुवनम्।
शाकम्भरीतिनाम प्राप्तं त्वघशमनम्॥
लोकत्रयपीडाकर दुर्गासुर हननात्।
दुर्गेत्याख्या जाता शिवसुन्दरि मान्या॥२॥
त्वमेव माया प्रकृतिर्जननी त्वं शान्ता।
त्वमेव बाला बगला दुर्गा त्वं ललिता॥
त्वमेव भीमा त्वमेव हिमवगिरिजाता।
त्वमेव वाणी लक्ष्मीस्त्वं रघुसुतमाता॥३॥
शाकम्भरि विश्वेश्वरि जय तिलकागारे॥ध्रु॥
वर्षाभावान्मातः शतवर्षम्भुवनम्।
अन्नाभावाज्जातं कामदभिपन्नम्॥
चक्षुःशतकाद्वर्षं वर्षन्त्या भुवनम्।
शताक्षिरक्षितमेतद्दत्वा पूर्णान्नम्॥१॥
निजतनुसम्भवशाकैरक्षितमितिभुवनम्।
शाकम्भरीतिनाम प्राप्तं त्वघशमनम्॥
लोकत्रयपीडाकर दुर्गासुर हननात्।
दुर्गेत्याख्या जाता शिवसुन्दरि मान्या॥२॥
त्वमेव माया प्रकृतिर्जननी त्वं शान्ता।
त्वमेव बाला बगला दुर्गा त्वं ललिता॥
त्वमेव भीमा त्वमेव हिमवगिरिजाता।
त्वमेव वाणी लक्ष्मीस्त्वं रघुसुतमाता॥३॥
Jai Devi Jai Devi Jai Jagadadhare,
Shakambhari Vishveshvari Jai Tilakagare. ||Dhru||
Varshabhavanmatah Shatavarshambhuvanam,
Annabhavajjatam Kamadabhipannam.
Chakshuhshatakadvarsham Varshantya Bhuvanam,
Shatakshirakshitametaddattva Purnannam. ||1||
Nijatanusambhavashakairakshitamitibhuvanam,
Shakambharitinama Praptam Tvaghashamanam.
Lokatrayapidakara Durgasura Hananat,
Durgetyakhyata Jata Shivasundari Manya. ||2||
Tvameva Maya Prakritirjanani Tvam Shanta,
Tvameva Bala Bagala Durga Tvam Lalita.
Tvameva Bhima Tvameva Himavagirijata,
Tvameva Vani Lakshmistvam Raghusutmata. ||3||
Shakambhari Vishveshvari Jai Tilakagare. ||Dhru||
Varshabhavanmatah Shatavarshambhuvanam,
Annabhavajjatam Kamadabhipannam.
Chakshuhshatakadvarsham Varshantya Bhuvanam,
Shatakshirakshitametaddattva Purnannam. ||1||
Nijatanusambhavashakairakshitamitibhuvanam,
Shakambharitinama Praptam Tvaghashamanam.
Lokatrayapidakara Durgasura Hananat,
Durgetyakhyata Jata Shivasundari Manya. ||2||
Tvameva Maya Prakritirjanani Tvam Shanta,
Tvameva Bala Bagala Durga Tvam Lalita.
Tvameva Bhima Tvameva Himavagirijata,
Tvameva Vani Lakshmistvam Raghusutmata. ||3||
इस आरती का विशिष्ट महत्व
यह संस्कृत आरती देवी के दो अत्यंत करुणामयी और पोषण करने वाले अवतारों - शताक्षी और शाकम्भरी - की कथा और महिमा का वर्णन करती है। 'दुर्गा सप्तशती' के अनुसार, जब एक बार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई और पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा, तब ऋषियों की पुकार सुनकर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने अपनी सौ आँखों ('शताक्षी') से निरंतर अश्रुधारा बहाई, जिससे नदियाँ फिर से भर गईं। इसके बाद, उन्होंने अपने ही शरीर से उत्पन्न शाक-सब्जियों ('शाकम्भरी' - शाक को धारण करने वाली) से संपूर्ण जगत का भरण-पोषण किया। यह आरती देवी के 'जगदाधारे' (जगत का आधार) और अन्नपूर्णा स्वरूप का उत्सव है, जो हमें याद दिलाती है कि देवी ही प्रकृति हैं और सभी जीवों का पालन करती हैं।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह संस्कृत आरती देवी के पोषणकर्ता और रक्षक स्वरूपों का गुणगान करती है:
- शताक्षी - सौ आँखों वाली (The Hundred-Eyed Goddess): "चक्षुःशतकाद्वर्षं वर्षन्त्या भुवनम्। शताक्षिरक्षितमेतद्दत्वा पूर्णान्नम्॥" - यह पंक्तियाँ उस कथा का वर्णन करती हैं जब देवी ने अपनी सौ आँखों से वर्षा करके अकाल से पीड़ित धरती को बचाया और सबको पूर्ण अन्न प्रदान किया। यह उनकी अपार करुणा (boundless compassion) को दर्शाता है।
- शाकम्भरी - वनस्पतियों की देवी (The Bearer of Greens): "निजतनुसम्भवशाकैरक्षितमितिभुवनम्। शाकम्भरीतिनाम प्राप्तं..." - 'अपने शरीर से उत्पन्न शाक से आपने जगत की रक्षा की, इसलिए आपका नाम शाकम्भरी पड़ा।' यह प्रकृति और भोजन के स्रोत के रूप में देवी की पूजा का प्रतीक है।
- दुर्गा - दुर्गमासुर का वध करने वाली (The Slayer of Durgamasura): "लोकत्रयपीडाकर दुर्गासुर हननात्। दुर्गेत्याख्या जाता..." - आरती बताती है कि दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण ही उनका एक नाम 'दुर्गा' पड़ा। यह उनके दुष्टों का संहार करने वाले और धर्म की रक्षा (protection of Dharma) करने वाले स्वरूप को दर्शाता है।
- सर्वदेवी स्वरूपिणी (Embodiment of All Goddesses): "त्वमेव वाणी लक्ष्मीस्त्वं रघुसुतमाता॥" - अंतिम पंक्तियाँ देवी को सभी प्रमुख देवियों - सरस्वती (वाणी), लक्ष्मी, और सीता (रघुसुतमाता) - का एकीकृत स्वरूप मानती हैं, जो उनकी सर्वोच्च और सर्वव्यापी प्रकृति को स्थापित करता है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती विशेष रूप से शाकम्भरी नवरात्रि (आमतौर पर पौष मास में मनाई जाती है) के दौरान प्रतिदिन की जाती है।
- अकाल, सूखा या भोजन की कमी जैसी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए इस आरती का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
- पूजा करते समय देवी को ताजे फल, सब्जियाँ और हरे पत्ते अर्पित करना शुभ होता है। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता (gratitude towards nature) व्यक्त करने का एक तरीका है।
- इस आरती का पाठ करने से घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती, परिवार का पोषण होता है और आरोग्य (health and well-being) की प्राप्ति होती है।
