जय देवी जय देवी जय शाकंभरी।
श्रीवनशंकरी माये आदि विश्वंभरी॥ध्रु॥
दैत्यें सुरजन गांजित पडला दुष्काळ।
देखुनि दानव वधिसी सक्रोधें प्रबळ।
शाखा वटुनि पाळिसी विश्वप्रिय सकळ।
भक्ता संकटी पावसी जननी तात्काळ॥१॥
सद्भक्ति देवी तू सुरसर्वेश्वरी।
साठी शाखा तुज प्रिय षड्विध सांभारी।
तिळवे तंबिट कर्मठ द्वादश कोशिंबीरीं।
पापड सांडगे वाढिती हलवा परोपरी॥२॥
अंबे कर्दळि द्राक्षे नाना फळे जाण।
दधि घृत पय शर्करा लोणची नववर्ण।
कथिका चाकवत चुक्का मधुपूर्ण।
वाढिती पंचामृत आले लिंबू लवण॥३॥
बबूरे कडी वडे वडिया वरान्न।
सुगंध केशरी अन्न विचित्र चित्रान्न।
भक्ष्यभोज्य प्रियकर नाना पक्वान्न।
सुरार रायति वाढिती षड्रस परमान्न॥४॥
पोळी सुगरे भरीत आणि वांगीभात।
पात्रीं वाढिती सर्वही अपूप नवनीत।
जीवन घेता भोजनी प्रसन्न भक्तातें।
प्रार्थुनि तांबूल देऊनि वंदी गुरुभक्त॥५॥
श्रीवनशंकरी माये आदि विश्वंभरी॥ध्रु॥
दैत्यें सुरजन गांजित पडला दुष्काळ।
देखुनि दानव वधिसी सक्रोधें प्रबळ।
शाखा वटुनि पाळिसी विश्वप्रिय सकळ।
भक्ता संकटी पावसी जननी तात्काळ॥१॥
सद्भक्ति देवी तू सुरसर्वेश्वरी।
साठी शाखा तुज प्रिय षड्विध सांभारी।
तिळवे तंबिट कर्मठ द्वादश कोशिंबीरीं।
पापड सांडगे वाढिती हलवा परोपरी॥२॥
अंबे कर्दळि द्राक्षे नाना फळे जाण।
दधि घृत पय शर्करा लोणची नववर्ण।
कथिका चाकवत चुक्का मधुपूर्ण।
वाढिती पंचामृत आले लिंबू लवण॥३॥
बबूरे कडी वडे वडिया वरान्न।
सुगंध केशरी अन्न विचित्र चित्रान्न।
भक्ष्यभोज्य प्रियकर नाना पक्वान्न।
सुरार रायति वाढिती षड्रस परमान्न॥४॥
पोळी सुगरे भरीत आणि वांगीभात।
पात्रीं वाढिती सर्वही अपूप नवनीत।
जीवन घेता भोजनी प्रसन्न भक्तातें।
प्रार्थुनि तांबूल देऊनि वंदी गुरुभक्त॥५॥
Jai Devi Jai Devi Jai Shakambhari,
Shrivanashankari Maye Aadi Vishvambhari. ||Dhru||
Daitye Surajan Ganjit Padala Dushkal,
Dekhuni Danav Vadhisi Sakrodhe Prabal.
Shakha Vatuni Palisi Vishvapriya Sakal,
Bhakta Sankati Pavasi Janani Tatkal. ||1||
Sadbhakti Devi Tu Sursarveshvari,
Sathi Shakha Tuj Priya Shadvidh Sambhari.
Tilave Tambit Karmath Dvadash Koshimbiri,
Papad Sandage Vadhiti Halava Paropari. ||2||
Ambe Kardali Drakshe Nana Phale Jaan,
Dadhi Ghrit Pay Sharkara Lonachi Navavarn.
Kathika Chakavat Chukka Madhupurn,
Vadhiti Panchamrit Aale Limbu Lavan. ||3||
Babure Kadi Vade Vadiya Varanna,
Sugandh Keshari Anna Vichitra Chitranna.
Bhakshyabhojya Priyakar Nana Pakvanna,
Surar Rayati Vadhiti Shadras Paramanna. ||4||
Poli Sugare Bharit Aani Vangibhat,
Patri Vadhiti Sarvahi Apup Navanit.
Jivan Gheta Bhojani Prasanna Bhaktate,
Prarthuni Tambul Deuni Vandi Gurubhakt. ||5||
Shrivanashankari Maye Aadi Vishvambhari. ||Dhru||
Daitye Surajan Ganjit Padala Dushkal,
Dekhuni Danav Vadhisi Sakrodhe Prabal.
Shakha Vatuni Palisi Vishvapriya Sakal,
Bhakta Sankati Pavasi Janani Tatkal. ||1||
Sadbhakti Devi Tu Sursarveshvari,
Sathi Shakha Tuj Priya Shadvidh Sambhari.
Tilave Tambit Karmath Dvadash Koshimbiri,
Papad Sandage Vadhiti Halava Paropari. ||2||
Ambe Kardali Drakshe Nana Phale Jaan,
Dadhi Ghrit Pay Sharkara Lonachi Navavarn.
Kathika Chakavat Chukka Madhupurn,
Vadhiti Panchamrit Aale Limbu Lavan. ||3||
Babure Kadi Vade Vadiya Varanna,
Sugandh Keshari Anna Vichitra Chitranna.
Bhakshyabhojya Priyakar Nana Pakvanna,
Surar Rayati Vadhiti Shadras Paramanna. ||4||
Poli Sugare Bharit Aani Vangibhat,
Patri Vadhiti Sarvahi Apup Navanit.
Jivan Gheta Bhojani Prasanna Bhaktate,
Prarthuni Tambul Deuni Vandi Gurubhakt. ||5||
इस आरती का विशिष्ट महत्व
श्री शाकंभरी आरती देवी के शाकंभरी (Shakambhari) स्वरूप को समर्पित है, जिन्हें "शाक" अर्थात वनस्पतियों और साग-सब्जियों को धारण करने वाली देवी माना जाता है। देवी भागवत पुराण और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, जब पृथ्वी पर सौ वर्षों तक भयानक अकाल (famine) पड़ा, तब ऋषियों की प्रार्थना पर देवी ने अपने शरीर से उत्पन्न शाक-सब्जियों से संपूर्ण विश्व का भरण-पोषण किया। इसी कारण वह शाकंभरी और वनशंकरी (Vanashankari) कहलाईं। यह आरती देवी के उसी करुणामय और पालक स्वरूप का गुणगान करती है, जो भक्तों को संकट के समय, विशेषकर अन्न-जल की कमी से, तत्काल उबार लेती हैं।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती माँ शाकंभरी के पोषणकर्ता और रक्षक स्वरूप का सुंदर चित्रण करती है:
- संकट-नाशक स्वरूप (Remover of Crisis): प्रथम पद में बताया गया है कि कैसे देवी ने अकाल पैदा करने वाले दुर्गम नामक दैत्य का संहार किया और वनस्पतियों से जगत का पालन किया। पंक्ति "भक्ता संकटी पावसी जननी तात्काळ" दर्शाती है कि वह अपने भक्तों की संकट में तत्काल सहायता (immediate help in crisis) करती हैं।
- विविध नैवेद्य का वर्णन (Description of Offerings): यह आरती अपनी विस्तृत नैवेद्य सूची के लिए अनूठी है। इसमें विभिन्न प्रकार की सब्जियां, फल, मिठाइयां और पकवानों का उल्लेख है, जैसे कोशिंबीर (salad), पापड, सांडगे, हलवा, वडे, पोळी, वांगीभात आदि। यह देवी के अन्नपूर्णा (Annapurna) स्वरूप को भी दर्शाता है, जो सभी को भोजन प्रदान करती हैं।
- षड्रस भोजन (Six Tastes of Food): आरती में "षड्रस परमान्न" का उल्लेख है, जिसका अर्थ है छह स्वादों (मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा, कसैला) से युक्त उत्तम भोजन। यह देवी को अर्पित किए जाने वाले संपूर्ण और संतुलित भोग का प्रतीक है, जो जीवन में भी संतुलन का संदेश देता है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती विशेष रूप से शाकंभरी नवरात्रि (Shakambhari Navratri) के दौरान की जाती है, जो पौष मास की शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक मनाई जाती है।
- इस आरती को करते समय देवी को ताजे फल, हरी सब्जियां और विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- जिन घरों में अन्न-धन की कमी हो या समृद्धि (prosperity) की कामना हो, उन्हें इस आरती का नित्य पाठ करना चाहिए।
- यह आरती किसानों और कृषि से जुड़े लोगों के लिए विशेष फलदायी है, क्योंकि माँ शाकंभरी अच्छी फसल और हरियाली की देवी हैं।
