पक्वान्नादी सिद्धी अर्पी तुज ठायीं॥
षड्रसपक्वान्नें हीं अर्पित तुज माई।
कृपा करुनी तीं तूं मान्य करुनि घेई॥
तृप्ती सर्व जीवां जेवितां तूं आई।
जीवन सर्वांचें हें असे तव पायीं॥१॥
आनंदें भोजन करावें आतां।
यथेच्छ जेवूनी उच्छिष्ट उरतां॥
प्रसाद तो देई आपुल्या भक्ता।
हेंचि मागें ठेवूनि तव चरणीं माथा॥२॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Pakvannadi siddhi arpi tuj thayin. ||
Shadrasapakvannen hin arpit tuj mai,
Kripa karuni tin tun manya karuni ghei. ||
Tripti sarv jivan jevitan tun aai,
Jivan sarvanche hen ase tav payin. ||1||
Ananden bhojan karaven aatan,
Yathechchha jevuni uchchhisht uratan. ||
Prasad to dei aapulya bhakta,
Henchi magen thevuni tav charanin matha. ||2||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
'नैवेद्य आरती' हिंदू पूजा का एक अभिन्न अंग है, जिसे भगवान को भोजन (नैवेद्य) अर्पित करते समय गाया जाता है। यह आरती, "जय देव जय देव जय विठाबाई," विशेष रूप से भगवान विठ्ठल को समर्पित है, जिन्हें वारकरी संप्रदाय में प्रेम से 'विठू माऊली' या 'विठाबाई' (माँ विठ्ठल) कहकर पुकारा जाता है। इस आरती का सार भक्त और भगवान के बीच के गहरे और व्यक्तिगत संबंध को दर्शाता है, जहाँ भक्त अपने ईश्वर को एक माँ की तरह देखता है और उनसे भोजन स्वीकार करने का आग्रह करता है। यह केवल भोजन अर्पित करने की एक क्रिया नहीं है, बल्कि यह भक्ति, प्रेम और कृतज्ञता (gratitude and devotion) की अभिव्यक्ति है। भक्त ईश्वर को सभी जीवों का पालक मानकर उन्हें भोग लगाता है और फिर उनके जूठन (उच्छिष्ट) को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की कामना करता है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती भक्त की सरल और गहरी भावनाओं को व्यक्त करती है:
- मातृ स्वरूप में ईश्वर (God as the Mother): "जय देव जय देव जय विठाबाई" - भगवान विठ्ठल को 'विठाबाई' (माँ विठाई) के रूप में संबोधित करना वारकरी संप्रदाय की एक अनूठी और सुंदर परंपरा है। यह ईश्वर के पालन-पोषण करने वाले, करुणामयी और वात्सल्यपूर्ण (nurturing and compassionate) स्वरूप पर जोर देता है, जैसे एक माँ अपने बच्चों का पेट भरती है।
- छह रसों का अर्पण (Offering of the Six Tastes): "षड्रसपक्वान्नें हीं अर्पित तुज माई" - भक्त माँ विठाबाई को षड्रस (मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कसैला) से युक्त संपूर्ण भोजन अर्पित करता है। यह अपनी सबसे अच्छी और संपूर्ण वस्तु को भगवान को समर्पित करने का प्रतीक है।
- प्रसाद की कामना (The Desire for Prasad): "यथेच्छ जेवूनी उच्छिष्ट उरतां। प्रसाद तो देई आपुल्या भक्ता" - भक्त प्रार्थना करता है कि 'हे माँ, आप अपनी इच्छानुसार भोजन करें और जो भी जूठन बचे, उसे अपने भक्तों को प्रसाद के रूप में दें।' यह सर्वोच्च विनम्रता (ultimate humility) का भाव है, जहाँ भक्त भगवान के जूठन को भी परम आशीर्वाद मानता है।
- सर्वस्व समर्पण (Complete Surrender): "हेंचि मागें ठेवूनि तव चरणीं माथा" - आरती का समापन भक्त द्वारा अपने मस्तक को माँ के चरणों में रखकर इस प्रसाद की याचना के साथ होता है, जो ईश्वर के प्रति उसके पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती प्रतिदिन दोपहर की पूजा (धूप आरती) या रात्रि की पूजा (शेजारती) के बाद, भगवान को नैवेद्य अर्पित करते समय गाई जाती है।
- एकादशी, विशेष रूप से आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी, के दिन इस आरती का विशेष महत्व होता है।
- घर पर, भोजन बनाने के बाद, सबसे पहले एक थाली में सात्विक भोजन (बिना प्याज-लहसुन का) निकालकर उसे भगवान के सामने रखें, जल का छिड़काव करें और फिर इस आरती को गाकर भोग लगाएं।
- आरती के बाद कुछ देर प्रतीक्षा करें और फिर उस नैवेद्य को 'प्रसाद' मानकर परिवार के सभी सदस्यों में वितरित करें। यह भोजन को पवित्र करता है और a feeling of divinity लाता है।
