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काकड आरती (उठा उठा हो साधक)

Kakad Aarti (Marathi)

काकड आरती (उठा उठा हो साधक)
उठा उठा हो साधक। साधा आपुलालें हित॥
गेला गेला हा नरदेह। मग कैंचा भगवंत॥१॥

उठा उठा हो वेगेंसीं। चला जाऊं राऊळासी॥
हरतिल पातकांच्या राशी। कांकड आरती पाहोनी॥

उठोनियां हो पाहाटें। पाहा विठ्ठल उभा विटे॥
चरण तयाचे गोमटे। अमृतदृष्टीं अवलोका॥२॥

जागें करा रुक्मिणीवरा। देव आहे निजसुरा॥
वेगें निंबलोण करा। दृष्ट होईल तयासी॥३॥

पुढें वाजंत्री वाजती। ढोल दमामे गर्जती॥
होत कांकड आरती। माझ्या पंढरीरायाची॥४॥

सिंहनाद शंख भेरी। गजर होतो महाद्वारीं॥
केशवराज विटेवरी। नामा चरण वंदितो॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

संत नामदेव द्वारा रचित "उठा उठा हो साधक" महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय की एक प्रमुख काकड आरती है। यह आरती केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधक के लिए एक शक्तिशाली और तत्काल आह्वान है। 'काकड आरती' का अनुष्ठान भोर में भगवान को जगाने का प्रतीक है, लेकिन संत नामदेव इस आरती के माध्यम से साधक की अंतरात्मा को जगाने का आग्रह करते हैं। वह हमें याद दिलाते हैं कि यह मानव जीवन (human life) अत्यंत दुर्लभ है और इसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। आरती के शब्द साधक को आलस्य त्याग कर तुरंत अपने आध्यात्मिक हित (spiritual well-being) के लिए कार्य करने को प्रेरित करते हैं, जो इसे अत्यंत व्यावहारिक और प्रेरक बनाता है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती साधक को उसकी आध्यात्मिक यात्रा के प्रति सचेत करती है:

  • अवसर का सदुपयोग (Seizing the Opportunity): "उठा उठा हो साधक। साधा आपुलालें हित॥ गेला गेला हा नरदेह। मग कैंचा भगवंत॥" - हे साधक, उठो! और अपने हित को साधो। यदि यह मनुष्य देह हाथ से निकल गई, तो फिर भगवान की प्राप्ति कैसे होगी? यह पंक्तियाँ मानव जीवन की क्षणभंगुरता और मोक्ष प्राप्ति के लिए इसके महत्व पर जोर देती हैं।
  • पापों का शमन (Destruction of Sins): "हरतिल पातकांच्या राशी। कांकड आरती पाहोनी॥" - संत नामदेव आश्वासन देते हैं कि सुबह-सुबह भगवान की काकड आरती का दर्शन मात्र करने से पापों के ढेर नष्ट हो जाते हैं। यह सुबह की शुद्ध ऊर्जा और भक्ति के purifying effect को दर्शाता है।
  • अमृत दृष्टि की कृपा (Grace of the Nectar-like Gaze): "चरण तयाचे गोमटे। अमृतदृष्टीं अवलोका॥" - वे साधक को विठ्ठल के सुंदर चरणों और उनकी अमृतमयी दृष्टि को देखने के लिए कहते हैं। भगवान की एक कृपादृष्टि भक्त के जीवन को बदल सकती है और उसे आध्यात्मिक शांति (spiritual peace) प्रदान कर सकती है।
  • दिव्य उत्सव का वातावरण (Atmosphere of Divine Celebration): "पुढें वाजंत्री वाजती। ढोल दमामे गर्जती॥ सिंहनाद शंख भेरी।" - ये पंक्तियाँ पंढरपुर के विठ्ठल मंदिर (राऊळ) के जीवंत दृश्य को चित्रित करती हैं, जहाँ विभिन्न वाद्ययंत्रों की ध्वनि के बीच आरती होती है। यह भक्ति के आनंदमय और celebratory aspect को उजागर करता है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक प्रभात आरती है, जिसे परंपरागत रूप से ब्राह्ममुहूर्त (Brahma Muhurta) में, सूर्योदय से पहले गाया जाता है ताकि दिन की शुरुआत आध्यात्मिक चेतना के साथ हो।
  • पंढरपुर की प्रसिद्ध वारी (Waari) के दौरान यह आरती प्रतिदिन भक्तों द्वारा सामूहिक रूप से गाई जाती है, जो एक अद्भुत और ऊर्जावान वातावरण बनाती है।
  • घर पर इस आरती का पाठ करने के लिए, सुबह जल्दी उठकर, स्नान के बाद, भगवान विठ्ठल की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं और इस आरती को गाएं।
  • यह आरती आलस्य को दूर करने और दिन भर के कार्यों के लिए एक सकारात्मक और ऊर्जावान दृष्टिकोण (positive and energetic outlook) प्रदान करने में मदद करती है।
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