पंचप्राण जीवेंभावें ओवाळू आरती॥१॥
ओवाळू आरती माझ्या पंढरीनाथा।
दोन्ही कर जोडूनि चरणीं ठेविला माथा॥
काय महिमा वर्णू आतां सांगणें तें किती।
कोटी ब्रह्महत्या मुख पाहतां जाती॥२॥
राही रखुमाबाई उभ्या दोन्ही दों बाहीं।
मयूरपिच्छचामरें ढाळिती ठाईंच्या ठाई॥३॥
विटेसहित पाय म्हणुनी भावें ओवाळू।
कोटी रवि शशी दिव्य उगवले हेळू॥४॥
तुका म्हणे दीप घेउनी उन्मनींत शोभा।
विटेवरी उभा दिसे लावण्यगाभा॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Panchpran jivebhaven ovalun aarti. ||1||
Ovalu aarti majhya pandharinatha,
Donhi kar joduni charanin thevila matha. ||
Kay mahima varnu aatan sanganen ten kiti,
Koti brahmahatya mukh pahatan jati. ||2||
Rahi Rakhumabai ubhya donhi don bahin,
Mayurpichcha-chamaren dhaliti thainchya thain. ||3||
Vitesahit pay mhanuni bhaven ovalun,
Koti ravi shashi divya ugavale helu. ||4||
Tuka mhane deep gheuni unmanit shobha,
Vitevari ubha dise lavanyagabha. ||5||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
'काकड आरती' महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुबह की प्रार्थना है। यह आरती सूर्योदय से पहले, ब्रह्म मुहूर्त में, भगवान विठ्ठल को प्रेमपूर्वक जगाने के लिए की जाती है। 'काकड' का अर्थ है एक कपड़े की मशाल, जिसे घी में डुबोकर भगवान के सामने घुमाया जाता है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर करने और ज्ञान के प्रकाश का स्वागत करने का प्रतीक है। महान संत तुकाराम महाराज द्वारा रचित "भक्तीचिये पोटी" आरती, काकड आरती के सबसे प्रसिद्ध और दार्शनिक रूप से गहरे गीतों में से एक है। यह केवल एक जागरण गीत नहीं है, बल्कि यह भक्ति और ज्ञान के बीच के गहरे संबंध पर एक सुंदर उपदेश है, जो भक्त के भीतर परमात्मा के जागरण (awakening of the divine) का आह्वान करता है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
संत तुकाराम की यह रचना गहन आध्यात्मिक अर्थों से परिपूर्ण है:
- भक्ति से ज्ञान का उदय (Devotion as the Source of Knowledge): आरती की पहली पंक्ति, "भक्तीचिये पोटी बोध कांकडा ज्योती," इसका सार है। इसका अर्थ है, "भक्ति के गर्भ से ही ज्ञान रूपी काकड की ज्योति (प्रकाश) उत्पन्न होती है।" संत तुकाराम यहाँ स्थापित करते हैं कि सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान (true spiritual knowledge) केवल तर्क या अध्ययन से नहीं, बल्कि निःस्वार्थ और गहन भक्ति से ही प्राप्त होता है।
- पूर्ण समर्पण (Absolute Surrender): "दोन्ही कर जोडूनि चरणीं ठेविला माथा" - 'मैं अपने दोनों हाथों को जोड़कर आपके चरणों में अपना मस्तक रखता हूँ,' यह पंक्ति भगवान के प्रति पूर्ण और बिना शर्त आत्मसमर्पण (unconditional surrender) की 'शरणागति' भावना का प्रतीक है। यह अहंकार के त्याग और ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने का एक सुंदर चित्रण है।
- दर्शन की महिमा (The Glory of Divine Vision): "कोटी ब्रह्महत्या मुख पाहतां जाती" - संत तुकाराम कहते हैं कि भगवान पंढरीनाथ के मुख का दर्शन मात्र करने से करोड़ों ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। यह भगवान के दर्शन की शुद्धिकरण शक्ति (purificatory power of a divine glance) को व्यक्त करने का एक काव्यात्मक अतिशयोक्ति है।
- उन्मनी अवस्था (The Transcendent State): "तुका म्हणे दीप घेउनी उन्मनींत शोभा" - अंतिम पंक्ति में, तुकाराम महाराज कहते हैं कि वे इस ज्ञान के दीपक को लेकर 'उन्मनी' अवस्था में भगवान की शोभा निहार रहे हैं। 'उन्मनी' एक ऐसी उच्च आध्यात्मिक अवस्था है जो मन और बुद्धि से परे है। यह एक विचार-शून्य, आनंदमय स्थिति है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चेतना (pure consciousness) का अनुभव होता है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह एक प्रभात आरती है, जिसे परंपरागत रूप से सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले, ब्राह्ममुहूर्त (Brahma Muhurta) में गाया जाता है। पंढरपुर के मुख्य मंदिर में यह आज भी एक प्रमुख दैनिक अनुष्ठान है।
- यह आरती विशेष रूप से कार्तिक और आषाढ़ के महीनों में, पंढरपुर की वारी (तीर्थयात्रा) के दौरान, हर दिन की जाती है।
- घर पर, इस आरती को सुबह की पूजा शुरू करने से पहले भगवान विठ्ठल की तस्वीर के सामने दीपक जलाकर गाया जा सकता है। इसे प्रेम और भक्ति के उस भाव से गाना चाहिए जैसे कोई अपने प्रिय को नींद से जगा रहा हो।
- इस आरती को भावपूर्ण ढंग से गाने से मन में विनम्रता, भक्ति और ज्ञान की प्यास जागृत होती है, और यह पूरे दिन के लिए एक आध्यात्मिक और सकारात्मक माहौल (positive atmosphere) बनाती है।
