Logoपवित्र ग्रंथ

देवैः कृतं दुर्गास्तोत्रम्

देवैः कृतं दुर्गास्तोत्रम्

देवा ऊचुः

दुर्गे जय जय प्राज्ञे जगदम्ब महेश्वरि । सत्यव्रते सत्यपरे त्रिसत्ये सत्यरूपिणी ॥ १९॥
सत्यस्थे सत्यसुप्रीते सत्ययोने च सत्यतः । सत्यसत्ये सत्यनेत्रे प्रपन्नाः शरणं च ते ॥ २०॥
शिवप्रिये महेशानि देवदुःखक्षयङ्करि । त्रैलोक्यमाता शर्वाणी व्यापिनी भक्तवत्सला ॥ २१॥
आविर्भूय त्रिलोकेशि देवकार्यं कुरुष्व ह । सनाथाः कृपया ते हि वयं सर्वे महेश्वरि ॥ २२॥
त्वत्तः सर्वे च सुखिनो लभन्ते सुखमुत्तमम् । त्वां विना न हि किञ्चिद्वै शोभते त्रिभवेष्वपि ॥ २३॥
॥ इति शिवपुराणे रुद्रसंहितायां पार्वतीखण्डे षष्ठाध्यायान्तर्गतं देवैः कृतं दुर्गास्तोत्रं समाप्तम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और उद्गम

देवैः कृतं दुर्गास्तोत्रम् (Devaih Kritam Durga Stotram) का वर्णन शिवपुराण (Shiva Purana) की रुद्रसंहिता के पार्वती खंड (अध्याय ६) में मिलता है। जब देवता घोर संकटों में घिरे हुए थे और उन्हें दैत्य शक्तियों से भय था, तब उन्होंने जगदम्बा महेश्वरी (Mother Goddess) का आह्वान किया। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें देवी को 'सत्य' (Truth) के रूप में पूजा गया है। यह स्तुति केवल शक्ति की याचना नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड के परम सत्य को स्वीकारने की घोषणा है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)

इस स्तोत्र में 'सत्य' शब्द की आवृत्ति (repetition) अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो देवी के शाश्वत स्वरूप को दर्शाता है:
  • सत्य स्वरूपिणी (Embodiment of Truth): देवताओं ने देवी को 'सत्यव्रते' (सत्य का व्रत लेने वाली) और 'त्रिसत्ये' (भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में सत्य) कहा है। यह दर्शाता है कि माया के इस संसार में केवल देवी ही परम सत्य हैं।
  • शिवप्रिये और भक्तवत्सला (Beloved of Shiva & Protector of Devotees): उन्हें 'शिवप्रिये' कहा गया है, जो शिव और शक्ति के अभिन्न संबंध को दर्शाता है। साथ ही, वे 'भक्तवत्सला' हैं, अर्थात भक्तों पर संतान की तरह स्नेह रखने वाली।
  • देवकार्य सिद्धि (Success in Divine Tasks): देवता उनसे प्रार्थना करते हैं—"आविर्भूय... देवकार्यं कुरुष्व" (प्रकट होकर देवताओं का कार्य सिद्ध करें)। यह श्लोक किसी भी रुके हुए कार्य की सिद्धि (success in tasks) के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

शिवपुराण के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • दुख और संकट का नाश (Destruction of Sorrow): देवी को 'देवदुःखक्षयङ्करि' कहा गया है। इसका पाठ करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट और मानसिक संताप नष्ट हो जाते हैं।
  • उत्तम सुख की प्राप्ति (Attainment of Supreme Happiness): अंतिम श्लोक में स्पष्ट कहा गया है—"त्वत्तः सर्वे च सुखिनो", अर्थात देवी की कृपा से ही संसार में सुख और समृद्धि (prosperity) प्राप्त होती है।
  • सुरक्षा और अभय (Divine Protection): "सनाथाः कृपया ते" - देवी की कृपा से भक्त 'सनाथ' हो जाता है, अर्थात उसे कभी भी अकेलेपन या असुरक्षा (insecurity) का भय नहीं रहता।

पाठ करने की विधि

  • नवरात्रि (Navratri), अष्टमी तिथि या शुक्रवार (Friday) को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
  • देवी दुर्गा के चित्र के सामने लाल पुष्प (red flowers) और घी का दीपक अर्पित करें।
  • यदि आप किसी विशेष संकट में हैं, तो "आविर्भूय त्रिलोकेशि देवकार्यं कुरुष्व ह" (श्लोक २२) का १०८ बार जाप करें।
  • सात्विक मन से पाठ करें, क्योंकि देवी 'सत्य' से ही सर्वाधिक प्रसन्न होती हैं।