श्री दुर्गाष्टकम् (कात्यायनि महामाये)

खड्गधारिणि चण्डि दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥१॥
वसुदेवसुते कालि वासुदेवसहोदरि।
वसुन्धराश्रिये नन्दे दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥२॥
योगनिद्रे महानिद्रे योगमाये महेश्वरि।
योगसिद्धिकरी शुद्धे दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥३॥
शङ्खचक्रगदापाणे शार्ङ्गज्यायतबाहवे।
पीताम्बरधरे धन्ये दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥४॥
ऋग्यजुस्सामाथर्वाणश्चतुस्सामन्तलोकिनि।
ब्रह्मस्वरूपिणि ब्राह्मि दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥५॥
वृष्णीनां कुलसम्भूते विष्णुनाथसहोदरि।
वृष्णिरूपधरे धन्ये दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥६॥
सर्वज्ञे सर्वगे शर्वे सर्वेशे सर्वसाक्षिणि।
सर्वामृतजटाभारे दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥७॥
अष्टबाहु महासत्त्वे अष्टमी नवमि प्रिये।
अट्टहासप्रिये भद्रे दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते॥८॥
दुर्गाष्टकमिदं पुण्यं भक्तितो यः पठेन्नरः।
सर्वकाममवाप्नोति दुर्गालोकं स गच्छति॥९॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री दुर्गाष्टकम् (Shri Durgashtakam) माँ दुर्गा के एक विशेष स्वरूप की स्तुति करता ہے, जिसका संबंध सीधे तौर पर भगवान श्री कृष्ण के अवतार से है। इस स्तोत्र में देवी को "वासुदेवसुते" (वसुदेव की पुत्री) और "विष्णुनाथसहोदरि" (भगवान विष्णु की बहन) कहकर संबोधित किया गया है। यह उस पौराणिक कथा का संदर्भ है, जिसमें योगमाया (Yogamaya) ने देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया था और कंस को यह चेतावनी दी थी कि उसे मारने वाला जन्म ले चुका ਹੈ। इस प्रकार, यह अष्टकम् देवी दुर्गा को केवल शिव की शक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की योगमाया शक्ति के रूप में भी पूजता है, जो सृष्टि के संचालन और लीला के लिए आवश्यक हैं।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
यह स्तोत्र देवी के शक्तिशाली और ज्ञान-स्वरूप का वर्णन करता ਹੈ, जिसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
सर्वकामना पूर्ति (Fulfillment of All Desires): फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है, "सर्वकाममवाप्नोति" - जो भी भक्त इस पुण्यदायी दुर्गाष्टकम् का पाठ करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं (desires) पूर्ण होती हैं।
दुर्गालोक की प्राप्ति (Attainment of Durga Loka): स्तोत्र का अंतिम फल "दुर्गालोकं स गच्छति" ہے, जिसका अर्थ है कि भक्त अंत में देवी के दिव्य धाम को प्राप्त करता ਹੈ। यह आध्यात्मिक उन्नति (spiritual progress) और मोक्ष का प्रतीक ਹੈ।
दुष्टों का नाश (Destruction of Evils): देवी को 'खड्गधारिणि', 'चण्डि', और 'सर्वदुष्टभयङ्करि' कहा गया है, जो उनके दुष्टों का संहार करने वाले स्वरूप को दर्शाता है। इसका पाठ भक्तों की नकारात्मक शक्तियों (negative energies) और शत्रुओं से रक्षा करता है।
ब्रह्म-स्वरूप का ज्ञान (Knowledge of the Absolute): "ब्रह्मस्वरूपिणि ब्राह्मि" कहकर उन्हें वेदों का सार और ब्रह्म का स्वरूप बताया गया है। उनकी उपासना से साधक को तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस अष्टकम् का पाठ करने का सबसे शुभ अवसर नवरात्रि (Navratri) है, विशेषकर अष्टमी और नवमी तिथि, जिनका उल्लेख स्तोत्र में भी है ("अष्टमी नवमि प्रिये")।
शुक्रवार (Friday) का दिन भी देवी की पूजा के लिए उत्तम माना जाता है। इस दिन स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
किसी भी प्रकार के संकट, भय या शत्रु-बाधा से मुक्ति पाने के लिए इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
पाठ करते समय माँ दुर्गा के हाथ में खड्ग, बाण और धनुष धारण किए हुए कात्यायनी (Katyayani) स्वरूप का ध्यान करना चाहिए और उनसे अपनी रक्षा तथा मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।