देवैः कृतं देवीस्तोत्रम्

देवा ऊचुः
नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते काञ्चनप्रभे । नमस्ते पद्मपत्राक्षि नमस्ते जगदम्बिके ॥ ३१॥नमस्ते विश्वरूपे च नमस्ते विश्वसंस्तुते । त्वं मतिस्त्वं धृतिः कान्तिस्त्वं सुधा त्वं विभावरी ॥ ३२॥
क्षमा ऋद्धिः प्रभा स्वाहा सावित्री कमला सती । त्वं गौरी त्वं महामाया चामुण्डा त्वं सरस्वती ॥ ३३॥
भैरवी भीषणाकारा चण्डमुण्डासिधारिणी । भूतप्रिया महाकाया घटाली विक्रमोत्कटा ॥ ३४॥
मद्यमांसप्रिया नित्यं भक्तत्राणपरायणा । त्वया व्याप्तमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३५॥
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे प्रभासखण्डे अर्बुदखण्डे षट्त्रिंशाध्यायान्तर्गतं देवैः कृतं देवीस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और उद्गम
देवैः कृतं देवीस्तोत्रम् (Devaih Kritam Devi Stotram) का उद्गम स्कन्दपुराण (Skanda Purana) के प्रभासखण्ड के अर्बुदखण्ड (अध्याय ३६) में मिलता है। जब देवता असुरों के अत्याचार से पीड़ित थे, तब उन्होंने माँ जगदम्बा की स्तुति की। यह स्तोत्र देवी के विराट स्वरूप का दर्शन कराता है। इसमें उन्हें न केवल सौम्य रूपा (जैसे सावित्री, कमला, गौरी) बताया गया है, बल्कि उनके उग्र और रक्षक रूप (जैसे भैरवी, चामुण्डा, खड्गधारिणी) का भी नमन किया गया है। यह स्तोत्र जीवन में संतुलन, शक्ति और सुरक्षा (Protection) प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)
इस स्तोत्र में देवी के विरोधी गुणों का अद्भुत समन्वय (Synthesis of opposites) देखने को मिलता है:
- काञ्चनप्रभे और विश्वरूपे: देवी की आभा स्वर्ण (Golden) के समान है और वे ही संपूर्ण विश्व का स्वरूप हैं। यह उनकी सुंदरता और व्यापकता (omnipresence) को दर्शाता है।
- बुद्धि और शांति: श्लोक ३२ में उन्हें 'मति' (Intellect), 'धृति' (Patience/Fortitude) और 'सुधा' (Nectar) कहा गया है। यह बताता है कि आंतरिक शांति और ज्ञान देवी की कृपा से ही मिलता है।
- उग्र रक्षक रूप: श्लोक ३४-३५ में उन्हें 'भैरवी', 'भीषणाकारा' और 'चण्डमुण्डासिधारिणी' कहा गया है। यहाँ 'मद्यमांसप्रिया' का अर्थ उनके तांत्रिक और उग्र स्वरूप से है, जो शत्रुओं का संहार करती हैं और अहंकार (Ego) की बलि स्वीकार करती हैं। यह रूप भक्तों के लिए भय नहीं, बल्कि अभय प्रदान करने वाला है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
स्कन्दपुराण के अनुसार, इस स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- भक्तों की रक्षा (Protection of Devotees): अंतिम श्लोक में देवी को 'भक्तत्राणपरायणा' (भक्तों की रक्षा में तत्पर) कहा गया है। इसका पाठ करने वाले पर कभी कोई दैवीय या भौतिक संकट नहीं आता।
- शत्रु और भय नाश (Victory over Enemies): चामुंडा और भैरवी स्वरूप का ध्यान करने से शत्रु बाधा, कोर्ट-कचहरी के विवाद और अज्ञात भय (Fear) समाप्त होते हैं।
- मानसिक बल और बुद्धि: देवी को 'मति' और 'स्मृति' कहा गया है, जिससे छात्रों और साधकों को कुशाग्र बुद्धि और स्मरण शक्ति प्राप्त होती है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय
- नवरात्रि (Navratri) के दिनों में, अष्टमी या मंगलवार/शुक्रवार को इसका पाठ करना विशेष फलदायी है।
- स्नान के बाद लाल वस्त्र धारण करें और देवी को लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें।
- किसी विशेष संकट के समय, सायंकाल में इस स्तोत्र का ११ बार पाठ करें और देवी से रक्षा की प्रार्थना करें।
- तांत्रिक श्लोकों के कारण, इसका पाठ पूर्ण पवित्रता और सात्विक संकल्प के साथ ही करना चाहिए।