भूदेवीकृतं वराहस्तोत्रम्

ॐ नमो भगवते मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय
यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महापुरुषाय
नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते ॥ ३५॥
यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो
गुणेषु दारुष्विव जातवेदसम् ।
मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो
गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६॥
द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-
र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।
अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि-
र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७॥
करोति विश्वस्थितिसंयमोदयं
यस्येप्सितं नेप्सितमीक्षितुर्गुणैः ।
माया यथायो भ्रमते तदाश्रयं
ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥ ३८॥
प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधे
यो मां रसाया जगदादिसूकरः ।
कृत्वाग्रदंष्ट्रे निरगादुदन्वतः
क्रीडन्निवेभः प्रणतास्मि तं विभुमिति ॥ ३९॥
इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे पञ्चमस्कन्धे अष्टादशाध्यायान्तर्गतं
भूदेवीकृतं वराहस्तोत्रं समाप्तम् ।
यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महापुरुषाय
नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते ॥ ३५॥
यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो
गुणेषु दारुष्विव जातवेदसम् ।
मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो
गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६॥
द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-
र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।
अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि-
र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७॥
करोति विश्वस्थितिसंयमोदयं
यस्येप्सितं नेप्सितमीक्षितुर्गुणैः ।
माया यथायो भ्रमते तदाश्रयं
ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥ ३८॥
प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधे
यो मां रसाया जगदादिसूकरः ।
कृत्वाग्रदंष्ट्रे निरगादुदन्वतः
क्रीडन्निवेभः प्रणतास्मि तं विभुमिति ॥ ३९॥
इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे पञ्चमस्कन्धे अष्टादशाध्यायान्तर्गतं
भूदेवीकृतं वराहस्तोत्रं समाप्तम् ।
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इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
भूदेवीकृतं वराहस्तोत्रम् (Bhudevi Kritam Varaha Stotram), श्रीमद्भागवत महापुराण (पंचम स्कंध, अध्याय 18) से लिया गया एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसकी रचना स्वयं भूदेवी (पृथ्वी माता) ने की थी, जब भगवान विष्णु (Lord Vishnu) ने वराह अवतार (Varaha Avatar) लेकर हिरण्याक्ष नामक दैत्य का वध किया और रसातल में डूबी हुई पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठाकर उसका उद्धार किया। कृतज्ञता और भक्ति से भरी हुई पृथ्वी माता ने भगवान वराह की जो स्तुति की, वही 'वराहस्तोत्रम्' के नाम से प्रसिद्ध हुई। यह स्तोत्र भगवान की यज्ञमय, वेदमय और सर्वव्यापी प्रकृति का गुणगान करता है।
स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ
यह स्तोत्र अत्यंत गहन दार्शनिक भावों से परिपूर्ण है और इसका पाठ करने से भक्तों को विशेष लाभ प्राप्त होते हैं:
- भूमि और संपत्ति संबंधी समस्याओं का निवारण (Resolution of Land and Property Issues): चूँकि यह स्तुति स्वयं भूदेवी द्वारा अपने उद्धारकर्ता के लिए की गई है, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ भूमि-भवन (land and property) से संबंधित विवादों, वास्तु दोषों और स्थिरता की समस्याओं के निवारण के लिए अचूक माना जाता है।
- स्थिरता और आधार की प्राप्ति (Attainment of Stability and Foundation): जैसे भगवान वराह ने पृथ्वी को स्थिरता प्रदान की, वैसे ही यह स्तोत्र जीवन में अस्थिरता, अनिश्चितता और आधारहीनता को दूर कर भक्त के जीवन में स्थिरता (stability) और दृढ़ता लाता है।
- ज्ञान और तत्व-बोध (Knowledge and Realization of Truth): स्तोत्र में भगवान को 'मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय' और 'गूढं' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे मंत्रों के सार और गूढ़ तत्व हैं। इसका पाठ करने से साधक को शास्त्रों के गूढ़ अर्थ को समझने और आत्म-ज्ञान (self-realization) की ओर बढ़ने में सहायता मिलती है।
- भगवान विष्णु की कृपा (Grace of Lord Vishnu): यह स्तोत्र सीधे भगवान विष्णु के महापराक्रमी वराह अवतार की स्तुति है। इसका भक्तिपूर्वक पाठ करने से भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है और भक्त सभी संकटों से मुक्त हो जाता है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
- इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए शनिवार (Saturday) का दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है, क्योंकि भूमि तत्व का संबंध शनि ग्रह से भी है। इसके अतिरिक्त, एकादशी और पूर्णिमा तिथियाँ भी उत्तम हैं।
- प्रातःकाल स्नान के बाद, भगवान विष्णु या वराह देव की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर शुद्ध मन से इसका पाठ करें।
- यदि आप किसी भूमि या भवन संबंधी समस्या से जूझ रहे हैं, तो उस भूमि की मिट्टी को एक पात्र में रखकर उसके सामने इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
- पाठ के बाद भगवान विष्णु से अपनी समस्याओं के निवारण और जीवन में स्थिरता प्रदान करने की प्रार्थना करें।