श्रीहनुमदाष्टोत्तरशतनामावली
Shri Hanumat Ashtottarashatanamavali (Agastya Rishi)

अगस्त्यो भगवान् ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीहनुमान् देवता ।
मारुतात्मज इति बीजम् । अञ्जनासूनुरिति शक्तिः ।
वायुपुत्रेति कीलकम् ।
मम श्रीहनुमत्प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ अथ करन्यासः ॥ ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ नमो भगवते वायुपुत्राय तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ नमो भगवते केसरिप्रियनन्दनाय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ नमो भगवते रामदूताय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ नमो भगवते लक्ष्मणप्राणदात्रे कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ नमो भगवते श्रीहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ॥
॥ अथ हृदयादि षडङ्गन्यासः ॥ ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय हृदयाय नमः ।
ॐ नमो भगवते वायुपुत्राय शिरसे स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते केसरिप्रियनन्दनाय शिखायै वषट् ।
ॐ नमो भगवते रामदूताय कवचाय हुम् ।
ॐ नमो भगवते लक्ष्मणप्राणदात्रे नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ नमो भगवते श्रीहनुमते अस्त्राय फट् ।
इति हृदयादि षडङ्गन्यासः ॥
॥ अथ दिग्बन्धः ॥ भूर्भूवस्वरोमिति दिग्बन्धः ॥
॥ अथ ध्यानम् ॥ पम्पातटवनोद्देशे परमर्षिनिषेविते ।
परितस्सिद्धगन्धर्वकिन्नरोरगसेविते ॥
निर्वैरमृगसिंहादि नानासत्वनिषेविते ।
मधुरे मधुरालापे मनोज्ञतलकन्दरे ॥
मतङ्गपर्वतप्रान्तमानसादिमनोहरे ।
महासिंहगुहागेहे उपरञ्जितपश्चिमे ॥
अतीन्द्रियमनोभारैः अतिमन्मथकाननैः ।
शमादि गुणसम्पन्नैः अतीतषडरातिभिः ॥
निखिलागमतत्वज्ञैः मुनिभिर्मुदितात्मभिः ।
उपास्यमानवद्भाजन मणिपीठ उपस्थितम् ॥
नलनीलमुखैश्चापि वानरैन्द्रैरुपासितम् ।
समुदञ्चितवालाग्रं समग्रमणिभूषणम् ॥
शमान्तकमहोरस्कसमाहितभुजद्वयम् ।
परार्थ्यं पद्मरागादि स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥
वज्रपाताङ्किततनुं वज्रपिङ्गाक्षभीषणम् ।
वज्रपाताङ्किततनुं वज्रपिङ्गाक्षभीषणम् ।
स्वर्णाब्जकेसरिप्रख्यशिरोरुहविराजितम् ॥
नवरत्नाञ्चितस्वर्णविचित्रवनमालया ।
आसिनपादपाथोजमापन्नार्तिनिवारणम् ॥
करुणावरुणावासमरुणारुणमण्डलम् ।
किरणारुणितोपान्तचरणं नवहारिणम् ॥
कारणं सुरकार्याणामसुराणां निवारणम् ।
भूषणं हि नगेन्द्रस्य मानसाचलपारगम् ॥
पुराणं प्रणताशानां चरणायोधनप्रियम् ।
स्मरणापहृताघौघं भरणावहितं सताम् ॥
शरणागतसन्त्राणकारणैकव्रतक्षमम् ।
क्षणादसुरराजेन्द्रतनयप्राणहारिणम् ॥
पवमानसुतं वीरं परीतं पनसादिभिः ॥
इत्थ ध्यायन्नमन्नेव चेतसा साधकोत्तमः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥
॥ इति ध्यानम् ॥
॥ अथ नामावलिः ॥ ॐ प्लवगेन्द्राय नमः ।
ॐ वायुपुत्राय नमः ।
ॐ वालिने नमः ।
ॐ वालाग्निदग्धलङ्काय नमः ।
ॐ बालार्कज्योतिषे नमः ।
ॐ आञ्जनेयाय नमः ।
ॐ महते नमः ।
ॐ प्रभञ्जनसुताय नमः ।
ॐ प्रमतादिहृते नमः ।
ॐ प्रमाणाद्भुतचेतसे नमः । १०
ॐ प्राचेतसप्रणयिने नमः ।
ॐ असुरवैरिणे नमः ।
ॐ वीराय नमः ।
ॐ वीरवन्द्याय नमः ।
ॐ वीरोन्मत्ताय नमः ।
ॐ विद्विषाम् नमः ।
ॐ विशातकाय नमः ।
ॐ वेद्याय नमः ।
ॐ विश्वव्यापिशरीरिणे नमः ।
ॐ विष्णुभक्ताय नमः । २०
ॐ भक्तानामुपकर्त्रे नमः ।
ॐ जितात्मने नमः ।
ॐ वनमालाग्रवालाय नमः ।
ॐ पवमानात्मने नमः ।
ॐ कृतमानाय नमः ।
ॐ कृत्येषु वीतरागाय नमः ।
ॐ वालधृतमहेन्द्राय नमः ।
ॐ सूर्यपुत्रहितैषिणे नमः ।
ॐ बलसूदनमित्राय नमः ।
ॐ वरदाय नमः । ३०
ॐ शमादिगुणनिष्ठाय नमः ।
ॐ शान्ताय नमः ।
ॐ शमितारये नमः ।
ॐ शत्रुघ्नाय नमः ।
ॐ शम्बरारिजिते नमः ।
ॐ जानकीक्लेशसंहर्त्रे नमः ।
ॐ जनकानन्ददायिने नमः ।
ॐ लङ्घितोदधये नमः ।
ॐ तेजसां निधये नमः ।
ॐ नित्याय नमः । ४0
ॐ नित्यानन्दाय नमः ।
ॐ नैष्ठिकब्रह्मचारिणे नमः ।
ॐ ब्रह्माण्डव्याप्तदेहाय नमः ।
ॐ भविष्यद्ब्रह्मणे नमः ।
ॐ ब्रह्मास्त्रवारकायस्तु नमः ।
ॐ सहसद्ब्रह्मवेदिने नमः ।
ॐ वेदान्तविदुषे नमः ।
ॐ वेदाध्ययनशालिने नमः ।
ॐ नखायुधाय नमः ।
ॐ नाथाय नमः । ५०
ॐ नक्षत्राधिपवर्चसे नमः ।
ॐ नागारिसेव्याय नमः ।
ॐ सुग्रीवमन्त्रिणे नमः ।
ॐ दशास्यदर्पहन्त्रेच नमः ।
ॐ छायाप्राणापहारिणे नमः ।
ॐ गगनत्वरगतये नमः ।
ॐ गरुडरंहसे नमः ।
ॐ गुहानुयाय नमः ।
ॐ गुह्याय नमः ।
ॐ गम्भीरपतये नमः । ६०
ॐ शत्रुघ्नाय नमः ।
ॐ शरान्तरविहारिणे नमः ।
ॐ राघवप्रियदूताय नमः ।
ॐ लक्ष्मणप्राणदायिने नमः ।
ॐ लङ्किणीसत्वसंहर्त्रे नमः ।
ॐ चैत्यप्रासादभञ्जिने नमः ।
ॐ भवाम्बुराशेः नमः ।
ॐ पाराय नमः ।
ॐ परविक्रमहारिणे नमः ।
ॐ वज्रशरीयाय नमः । ७०
ॐ वज्राशनिनिवारिणे नमः ।
ॐ रुद्रावताराय नमः ।
ॐ वैरिणाम्रौद्राकाराय नमः ।
ॐ किङ्करान्तकरूपाय नमः ।
ॐ मन्त्रीपुत्रनिहन्त्रिणे नमः ।
ॐ महाबलाय नमः ।
ॐ भीमाय नमः ।
ॐ महताम्पतये नमः ।
ॐ मैनाककृतमानाय नमः ।
ॐ मनोवेगायमालिने नमः । ८०
ॐ कदलीवनसंस्थाय नमः ।
ॐ सर्वार्थदायिने नमः ।
ॐ ऐन्द्रव्याकरणज्ञाय नमः ।
ॐ तत्त्वज्ञानार्थवेदिने नमः ।
ॐ कारुण्यनिधये नमः ।
ॐ कुमारब्रह्मचारिणे नमः ।
ॐ गम्भीरशब्दाय नमः ।
ॐ सर्वग्रहनिवारिणे नमः ।
ॐ सुभगाय नमः ।
ॐ सुशान्ताय नमः । ९०
ॐ सुमुखाय नमः ।
ॐ सुवर्चसे नमः ।
ॐ सुदुर्जयाय नमः ।
ॐ सूक्ष्माय नमः ।
ॐ सुमनःप्रियबन्धवे नमः ।
ॐ सुरारिवर्गसंहर्त्रे नमः ।
ॐ हर्यृक्षाधीश्वराय नमः ।
ॐ भूतप्रेतादिसंहर्त्रे नमः ।
ॐ भूतावेशकराय नमः ।
ॐ भूतनिषेवाय नमः । १००
ॐ भूताधिपतये नमः ।
ॐ ग्रहस्वरूपाय नमः ।
ॐ ग्रहाधिपतये नमः ।
ॐ ग्रहनिवाराय नमः ।
ॐ उग्राय नमः ।
ॐ उग्रवर्चसे नमः ।
ॐ ब्रह्मतन्त्रस्वतन्त्राय नमः ।
ॐ शम्भुतन्त्रस्वतन्त्रिणे नमः ।
ॐ हरितन्त्रस्वतन्त्राय नमः ।
ॐ हनुमते नमः । ११०
अष्टोत्तरशतं सङ्ख्या हनुमन्नाममूर्तयः ॥
॥ अथ फलश्रुतिः ॥ पुरतः परतो व्यापी मम पातु महाबलः ।
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु सत्यास्सन्तु मनोरथाः ॥
रक्षा भवतु योनी वा विविधे वरदेहिनाम् ।
अविघ्नो दुःखहानिश्च वाञ्छासिद्धिश्शुभोदयाः ।
प्रजासिद्धिश्च सामर्थ्यं मानोन्नतिरनामयम् ॥
॥ इति श्रीमधनुमदाष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ॥
इस नामावली का विशिष्ट महत्व
श्रीहनुमदाष्टोत्तरशतनामावली (Shri Hanumat Ashtottarashatanamavali) एक अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य स्तोत्र है, जिसकी रचना महान महर्षि अगस्त्य (Maharshi Agastya) ने की थी। यह नामावली भगवान हनुमान (Lord Hanuman) के 108 पवित्र नामों का एक व्यवस्थित संग्रह है। सामान्य नामावलियों के विपरीत, यह एक पूर्ण तांत्रिक विधान के साथ आती है, जिसमें विनियोग, करन्यास, हृदयादि षडङ्गन्यास, दिग्बन्ध और ध्यान शामिल हैं। यह संरचना इसे एक साधारण स्तोत्र से कहीं अधिक, एक शक्तिशाली मंत्र साधना (mantra sadhana) बनाती है। इसका पाठ करने से साधक न केवल हनुमान जी के गुणों का स्मरण करता है, बल्कि अपने शरीर और चेतना को उन दिव्य गुणों को धारण करने के लिए तैयार भी करता है। यह स्तोत्र भक्तों के लिए सभी प्रकार की सुरक्षा, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खोलता है।
नामावली के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति पर आधारित)
इस नामावली के अंत में दी गई फलश्रुति इसके पाठ से प्राप्त होने वाले महान लाभों को स्पष्ट करती है:
सर्वकामना सिद्धि (Fulfillment of All Desires): फलश्रुति में कहा गया है, "सर्वान्कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा," अर्थात इस स्तोत्र का ध्यानपूर्वक पाठ करने वाला साधक अपनी सभी मनोकामनाओं को निश्चित रूप से पूर्ण करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
संकट और दुखों का नाश (Destruction of Obstacles and Sorrows): "अविघ्नो दुःखहानिश्च" का अर्थ है कि पाठ करने वाले के जीवन से सभी विघ्न और दुःख समाप्त हो जाते हैं। 'शत्रुघ्नाय' और 'भूतप्रेतादिसंहर्त्रे' जैसे नाम शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) से रक्षा करते हैं।
शांति और शुभता की प्राप्ति (Attainment of Peace and Auspiciousness): "शान्तिरस्तु शिवं चास्तु" यह आशीर्वाद देता है कि साधक के जीवन में हर ओर से शांति और कल्याण (auspiciousness) का वास होता है।
समग्र उन्नति और आरोग्य (Overall Progress and Health): "प्रजासिद्धिश्च सामर्थ्यं मानोन्नतिरनामयम्" - यह पंक्ति संतान सुख, कार्य करने की क्षमता (capability), समाज में मान-सम्मान (respect) और निरोगी काया (good health) का वरदान देती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
यह एक विधि-विधान युक्त स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ करना चाहिए। प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान के बाद स्वच्छ आसन पर बैठें।
सर्वप्रथम स्तोत्र में दिए गए निर्देशानुसार विनियोग, करन्यास, और हृदयादि षडङ्गन्यास का पाठ करें। यह प्रक्रिया शरीर को शुद्ध और मंत्र ग्रहण के लिए तैयार करती है।
इसके बाद ध्यान मंत्र का पाठ करते हुए, उसमें वर्णित हनुमान जी के तेजस्वी, शांत और शक्तिशाली स्वरूप का मन में चिंतन करें।
पूर्ण एकाग्रता के साथ 108 नामों की नामावली का पाठ करें। प्रत्येक नाम के उच्चारण पर हनुमान जी के उस गुण को महसूस करने का प्रयास करें।
अंत में फलश्रुति का पाठ करें और हनुमान जी से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें। मंगलवार और शनिवार इस पाठ के लिए विशेष रूप से शुभ दिन हैं।