हनुमदष्टोत्तरशतनामावलिः (पारिजातप्रियाय)
Hanumad Ashtottarashatanamavali

ॐ योगिने नमः ।
ॐ हनूमते नमः ।
ॐ नृहरिप्रियाय नमः ।
ॐ प्लवगेन्द्राय नमः ।
ॐ पिङ्गलाक्षाय नमः ।
ॐ शीघ्रगामिने नमः ।
ॐ दृढव्रताय नमः ।
ॐ शङ्खचक्रवराभीतिपाणये नमः ।
ॐ आनन्ददायकाय नमः ।
ॐ स्थायिने नमः ।
ॐ विक्रमसम्पन्नाय नमः ।
ॐ रामदूताय नमः ।
ॐ महायशसे नमः ।
ॐ सौमित्रिजीवनकराय नमः ।
ॐ लङ्काविक्षोभकारकाय नमः ।
ॐ उदधिक्रमणाय नमः ।
ॐ सीताशोकहेतुहराय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ बलिने नमः । २०
ॐ राक्षससंहर्त्रे नमः ।
ॐ दशकण्ठमदापहाय नमः ।
ॐ बुद्धिमते नमः ।
ॐ नैरृतवधूकण्ठसूत्रविदारकाय नमः ।
ॐ सुग्रीव सचिवाय नमः ।
ॐ भीमाय नमः ।
ॐ भीमसेनसहोदराय नमः ।
ॐ सावित्रविद्यासंसेविने नमः ।
ॐ चरितार्थाय नमः ।
ॐ महोदयाय नमः ।
ॐ वासवाभीष्टदाय नमः ।
ॐ भव्याय नमः ।
ॐ हेमशैलनिवासवते नमः ।
ॐ किंशुकाभाय नमः ।
ॐ अग्रयतनवे नमः ।
ॐ ऋजुरोम्णे नमः ।
ॐ महामतये नमः ।
ॐ महाक्रमाय नमः ।
ॐ वनचराय नमः ।
ॐ स्थिरबुद्धये नमः । ४०
ॐ अभीशुमते नमः ।
ॐ सिंहिकागर्भनिर्भेत्त्रे नमः ।
ॐ लङ्कानिवासिनां भेत्त्रे नमः ।
ॐ अक्षशत्रुविनिघ्नाय नमः ।
ॐ रक्षोऽमात्यभयावहाय नमः ।
ॐ वीरघ्ने नमः ।
ॐ मृदुहस्ताय नमः ।
ॐ पद्मपाणये नमः ।
ॐ जटाधराय नमः ।
ॐ सर्वप्रियाय नमः ।
ॐ सर्वकामप्रदाय नमः ।
ॐ प्रांशुमुखाय नमः ।
ॐ शुचये नमः ।
ॐ विशुद्धात्मने नमः ।
ॐ विज्वराय नमः ।
ॐ सटावते नमः ।
ॐ पाटलाधराय नमः ।
ॐ भरतप्रेमजनकाय नमः ।
ॐ चीरवाससे नमः ।
ॐ महोक्षधृशे नमः । ६०
ॐ महास्त्रबन्धनसहाय नमः ।
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।
ॐ यतीश्वराय नमः ।
ॐ महौषधोपहर्त्रे नमः ।
ॐ वृषपर्वणे नमः ।
ॐ वृषोदराय नमः ।
ॐ सूर्योपलालिताय नमः ।
ॐ स्वामिने नमः ।
ॐ पारिजातावतंसकाय नमः ।
ॐ सर्वप्राणधराय नमः ।
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ सर्वभूतादिगाय नमः ।
ॐ मनवे नमः ।
ॐ रौद्राकृतये नमः ।
ॐ भीमकर्मणे नमः ।
ॐ भीमाक्षाय नमः ।
ॐ भीमदर्शनाय नमः ।
ॐ सुदर्शनकराय नमः ।
ॐ अव्यक्ताय नमः ।
ॐ व्यक्तास्याय नमः । ८०
ॐ दुन्दुभिस्वनाय नमः ।
ॐ सुवेलचारिणे नमः ।
ॐ नाकहर्षदाय नमः ।
ॐ हर्षणप्रियाय नमः ।
ॐ सुलभाय नमः ।
ॐ सुव्रताय नमः ।
ॐ योगिने नमः ।
ॐ योगिसेव्याय नमः ।
ॐ भयापहाय नमः ।
ॐ वालाग्निमथितानेकलङ्कावासिगृहोच्चयाय नमः ।
ॐ वर्धनाय नमः ।
ॐ वर्धमानाय नमः ।
ॐ रोचिष्णवे नमः ।
ॐ रोमशाय नमः ।
ॐ महते नमः ।
ॐ महादंष्ट्राय नमः ।
ॐ महाशूराय नमः ।
ॐ सद्गतये नमः ।
ॐ सत्परायणाय नमः ।
ॐ सौम्यदशिर्ने नमः । १००
ॐ सौम्यवेषाय नमः ।
ॐ हेमयज्ञोपवीतिमते नमः ।
ॐ मौञ्जीकृष्णाजिनधराय नमः ।
ॐ मन्त्रज्ञाय नमः ।
ॐ जितारातये नमः ।
ॐ षडूर्मये नमः ।
ॐ सर्वप्रियहितेरताय नमः । १०८
॥ इति हनुमदष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ॥
इस नामावली का विशिष्ट महत्व
हनुमदष्टोत्तरशतनामावलिः (Hanumad Ashtottarashatanamavali) भगवान श्री हनुमान के 108 दिव्य नामों का एक शक्तिशाली संग्रह है। यह विशेष संस्करण "ॐ पारिजातप्रियाय नमः" से प्रारंभ होता है, जो हनुमान जी के एक विशिष्ट और दुर्लभ स्वरूप को दर्शाता है—वह जो कल्पवृक्ष के समान सभी इच्छाएं पूरी करने वाले 'पारिजात' के प्रेमी हैं। नाममात्र के जाप के बजाय, यह नामावली अर्चना (Archana) के लिए अत्यंत उपयोगी है, जहाँ प्रत्येक नाम के साथ फूल या अक्षत अर्पित किया जाता है। यह नामावली भक्तों को हनुमान जी के वीरतापूर्ण कार्यों, उनकी असीम शक्ति और भगवान राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति का स्मरण कराती है।
नामावली के प्रमुख भाव और लाभ
इन 108 नामों का पाठ करने से साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:
- संकटों से रक्षा (Protection from Dangers): इस नामावली में हनुमान जी को "राक्षससंहर्त्रे" (राक्षसों का संहार करने वाले) और "भयापहाय" (भय को दूर करने वाले) कहा गया है। इसका पाठ करने से जीवन में आने वाले संकट और भय (fear and obstacles) दूर होते हैं।
- बल और बुद्धि की प्राप्ति (Gain of Strength and Wisdom): "महाशूराय" (महान वीर) और "बुद्धिमते" (बुद्धिमान) जैसे नामों का जाप करने से भक्त को शारीरिक बल (strength) और तीक्ष्ण बुद्धि (wisdom) का आशीर्वाद मिलता है।
- ग्रह दोष निवारण (Removal of Planetary Afflictions): हनुमान जी की उपासना विशेष रूप से शनि दोष (Shani Dosha) और मंगल ग्रह के कुप्रभावों को कम करने के लिए प्रभावी मानी जाती है।
- मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of Desires): "सर्वकामप्रदाय" (सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले) नाम का जाप यह सुनिश्चित करता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती और भक्त को सफलता (success) प्राप्त होती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
- इस नामावली का पाठ विशेष रूप से मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) के अवसर पर 108 नामों के साथ हनुमान जी को सिंदूर, चमेली का तेल या लाल पुष्प अर्पित करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
- प्रातः काल स्नान के बाद, पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। प्रत्येक नाम के उच्चारण के बाद "नमः" बोलते हुए तुलसी दल या पुष्प अर्पित करें।
- जो लोग लंबे समय से किसी बीमारी या शत्रु बाधा से पीड़ित हैं, उन्हें संकल्प लेकर 41 दिनों तक इस नामावली का नित्य पाठ करना चाहिए, जिससे उन्हें अच्छे स्वास्थ्य (good health) और शांति की प्राप्ति होगी।