एकादशमुखहनुमत्कवचम् (अगस्त्य संहिता)
Ekadashamukha Hanumatkavacham

लोपामुद्रा उवाच ।कुम्भोद्भव दयासिन्धो श्रुतं हनुमतः परम् ।
यन्त्रमन्त्रादिकं सर्वं त्वन्मुखोदीरितं मया ॥ १॥
दयां कुरु मयि प्राणनाथ वेदितुमुत्सहे ।
कवचं वायुपुत्रस्य एकादशमुखात्मनः ॥ २॥
इत्येवं वचनं श्रत्वा प्रियायाः प्रश्रयान्वितम् ।
वक्तुं प्रचक्रमे तत्र लोपामुद्रां प्रति प्रभुः ॥ ३॥
अगस्त्य उवाच ।नमस्कृत्वा रामदूतां हनुमन्तं महामतिम् ।
ब्रह्मप्रोक्तं तु कवचं शृणु सुन्दरि सादरम् ॥ ४॥
सनन्दनाय सुमहच्चतुराननभाषितम् ।
कवचं कामदं दिव्यं रक्षःकुलनिबर्हणम् ॥ ५॥
सर्वसम्पत्प्रदं पुण्यं मर्त्यानां मधुरस्वरे ।
ॐ अस्य श्रीकवचस्यैकादशवक्त्रस्य धीमतः ॥ ६॥
हनुमत्स्तुतिमन्त्रस्य सनन्दन ऋषिः स्मृतः ।
प्रसन्नात्मा हनूमांश्च देवता परिकीर्तिता ॥ ७॥
छन्दोऽनुष्टुप् समाख्यातं बीजं वायुसुतस्तथा ।
मुख्यः प्राणः शक्तिरिति विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ८॥
सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थं जप एवमुदीरयेत् ।
ॐ स्फ्रें-बीजं शक्तिधृक् पातु शिरो मे पवनात्मजः ॥ ९॥
क्रौं-बीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः ।
क्षं-बीजरूपः कर्णौ मे सीताशोकविनाशनः ॥ १०॥
ग्लौं-बीजवाच्यो नासां मे लक्ष्मणप्राणदायकः ।
वं-बीजार्थश्च कण्ठं मे पातु चाक्षयकारकः ॥ ११॥
ऐं-बीजवाच्यो हृदयं पातु मे कपिनायकः ।
वं-बीजकीर्तितः पातु बाहू मे चाञ्जनीसुतः ॥ १२॥
ह्रां-बीजो राक्षसेन्द्रस्य दर्पहा पातु चोदरम् ।
ह्रसौं-बीजमयो मध्यं पातु लङ्काविदाहकः ॥ १३॥
ह्रीं-बीजधरः पातु गुह्यं देवेन्द्रवन्दितः ।
रं-बीजात्मा सदा पातु चोरू वार्धिलंघनः ॥ १४॥
सुग्रीवसचिवः पातु जानुनी मे मनोजवः ।
पादौ पादतले पातु द्रोणाचलधरो हरिः ॥ १५॥
आपादमस्तकं पातु रामदूतो महाबलः ।
पूर्वे वानरवक्त्रो मामाग्नेय्यां क्षत्रियान्तकृत् ॥ १६॥
दक्षिणे नारसिंहस्तु नैरृत्यां गणनायकः ।
वारुण्यां दिशि मामव्यात्खगवक्त्रो हरीश्वरः ॥ १७॥
वायव्यां भैरवमुखः कौबेर्यां पातु मां सदा ।
क्रोडास्यः पातु मां नित्यमैशान्यां रुद्ररूपधृक् ॥ १८॥
ऊर्ध्वं हयाननः पातु गुह्याधः सुमुखस्तथा ।
रामास्यः पातु सर्वत्र सौम्यरूपो महाभुजः ॥ १९॥
इत्येवं रामदूतस्य कवचं यः पठेत्सदा ।
एकादशमुखस्यैतद्गोप्यं वै कीर्तितं मया ॥ २०॥
रक्षोघ्नं कामदं सौम्यं सर्वसम्पद्विधायकम् ।
पुत्रदं धनदं चोग्रशत्रुसंघविमर्दनम् ॥ २१॥
स्वर्गापवर्गदं दिव्यं चिन्तितार्थप्रदं शुभम् ।
एतत्कवचमज्ञात्वा मन्त्रसिद्धिर्न जायते ॥ २२॥
चत्वारिंशत्सहस्राणि पठेच्छुद्धात्मको नरः ।
एकवारं पठेन्नित्यं कवचं सिद्धिदं पुमान् ॥ २३॥
द्विवारं वा त्रिवारं वा पठन्नायुष्यमाप्नुयात् ।
क्रमादेकादशादेवमावर्तनजपात्सुधीः ॥ २४॥
वर्षान्ते दर्शनं साक्षाल्लभते नात्र संशयः ।
यं यं चिन्तयते चार्थं तं तं प्राप्नोति पूरुषः ॥ २५॥
ब्रह्मोदीरितमेतद्धि तवाग्रे कथितं महत् ॥ २६॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महर्षिस्तूष्णीं बभूवेन्दुमुखीं निरीक्ष्य ।
संहृष्टचित्तापि तदा तदीयपादौ ननामातिमुदा स्वभर्तुः ॥ २७॥
॥ इत्यगस्त्यसारसंहितायामेकादशमुखहनुमत्कवचं सम्पूर्णम् ॥
इस कवच का विशिष्ट महत्व
एकादशमुख हनुमत्कवचम् (Ekadashamukha Hanumatkavacham), जो कि अगस्त्य संहिता (Agastya Samhita) से लिया गया है, भगवान हनुमान के ग्यारह मुख वाले विराट और शक्तिशाली स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत गोपनीय और प्रभावी रक्षा स्तोत्र है। 'कवच' का अर्थ है 'कवच' या 'सुरक्षा कवच'। यह स्तोत्र ऋषि अगस्त्य और उनकी पत्नी लोपामुद्रा के बीच एक संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें ऋषि अगस्त्य अपनी पत्नी को ब्रह्मा जी द्वारा सनन्दन ऋषि को सुनाया गया यह गुप्त कवच बताते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बीज मंत्रों (स्फ्रें, क्रौं, क्षं आदि) को शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए नियोजित करता है और साथ ही हनुमान जी के ग्यारह विभिन्न मुखों (जैसे वानर, नृसिंह, गरुड़, भैरव, वराह, हयग्रीव और राम) द्वारा सभी दिशाओं से सर्वांगीण सुरक्षा (all-encompassing protection) प्रदान करता है।
कवच के प्रमुख भाव और लाभ
इस कवच की फलश्रुति अत्यंत विस्तृत है और इसके पाठ से प्राप्त होने वाले असंख्य लाभों का वर्णन करती है:
समस्त कामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of All Desires): स्तोत्र में इसे "कामदं" (कामनाओं को पूरा करने वाला) और "चिन्तितार्थप्रदं" (सोची हुई इच्छाओं को प्रदान करने वाला) कहा गया है। फलश्रुति में यह भी कहा गया है, "यं यं चिन्तयते चार्थं तं तं प्राप्नोति पूरुषः" अर्थात् मनुष्य जिस-जिस वस्तु का चिंतन करता है, उसे वह निश्चित रूप से प्राप्त करता है।
शत्रु और राक्षसों का नाश (Destruction of Enemies and Demons): इसे "रक्षःकुलनिबर्हणम्" (राक्षसों के कुल का नाश करने वाला) और "उग्रशत्रुसंघविमर्दनम्" (भयंकर शत्रु समूहों का मर्दन करने वाला) कहा गया है। यह शत्रुओं पर विजय (victory over enemies) और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा के लिए एक अमोघ अस्त्र है।
धन, पुत्र और संपत्ति की प्राप्ति (Attainment of Wealth, Progeny, and Prosperity): यह कवच "सर्वसम्पद्विधायकम्", "पुत्रदं" और "धनदं" है, जिसका अर्थ है कि यह सभी प्रकार की संपत्ति, पुत्र और धन प्रदान करता है।
मंत्र सिद्धि का आधार (Foundation of Mantra Siddhi): स्तोत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "एतत्कवचमज्ञात्वा मन्त्रसिद्धिर्न जायते" अर्थात् इस कवच को जाने बिना हनुमान जी के किसी भी मंत्र की सिद्धि नहीं हो सकती। यह सभी हनुमान साधनाओं का आधार है।
साक्षात् दर्शन की प्राप्ति (Attainment of Divine Vision): फलश्रुति में एक अद्भुत वचन है कि जो साधक नियमपूर्वक इस कवच का पाठ (विशेषकर एक वर्ष तक ग्यारह बार प्रतिदिन) करता है, उसे वर्ष के अंत में भगवान हनुमान के साक्षात् दर्शन (direct vision of the Lord) प्राप्त होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
सर्वोत्तम फल प्राप्ति और मंत्र सिद्धि के लिए, इस कवच का 40,000 बार पाठ करने का विधान बताया गया है।
सामान्य सिद्धि के लिए, "एकवारं पठेन्नित्यं" अर्थात् प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। दो या तीन बार पाठ करने से दीर्घायु (long life) की प्राप्ति होती है।
हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti), मंगलवार और शनिवार के दिन इस कवच का पाठ करना अत्यंत शक्तिशाली और शीघ्र फलदायी होता है।
किसी भी प्रकार के गंभीर संकट, शत्रु भय, तांत्रिक बाधा या असाध्य कार्य की सिद्धि के लिए पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ इस कवच का अनुष्ठान करना चाहिए।