श्री राघवेन्द्र मङ्गलाष्टकम् (अप्पणाचार्य कृत)

श्रीमद्रामपादारविन्दमधुपः श्रीमध्ववंशाधिपः
सच्चिष्योडुगणोडुपः श्रितजगद्गीर्वाणसत्पादपः ।
अत्यर्थं मनसा कृताच्युतजपः पापान्धकारातपः
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ १॥
कर्मन्दीन्द्रसुधीन्द्रसद्गुरुकराम्भोजोद्भवः सन्ततं
प्राज्यध्यानवशीकृताखिलजगद्वास्तव्यलक्ष्मीधवः ।
सच्छास्त्रादि विदूषकाखिलमृषावादीभकण्ठीरवः
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ २॥
सालङ्कारककाव्यनाटककलाकाणादपातञ्जल-
त्रय्यर्थस्मृतिजैमिनीयकवितासङ्गीतपारङ्गतः ।
विप्रक्षत्रविडङ्गिजातमुखरानेकप्रजासेवितः
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ ३॥
रङ्गोत्तुङ्गतरङ्गमङ्गलकर श्रीतुङ्गभद्रातट-
प्रत्यक्स्थद्विजपुङ्गवालय लसन्मन्त्रालयाख्ये पुरे ।
नव्येन्द्रोपलनीलभव्यकरसद्वृन्दावनान्तर्गतः
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ ४॥
विद्वद्राजशिरः किरीटखचितानर्घरुरत्नप्रभा
रागाघौघहपादुकाद्वयचरः पद्माक्षमालाधरः ।
भास्वद्दण्टकमण्डलूज्ज्वलकरो रक्ताम्बराडम्बरः
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ ५॥
यद्वृन्दावनसत्प्रदक्षिणनमस्काराभिषेकस्तुति-
ध्यानाराधनमृद्विलेपनमुखानेकोपचारान् सदा ।
कारं कारमभिप्रयान्ति चतुरो लोकाः पुमर्थान् सदा
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ ६॥
वेदव्यासमुनीशमध्वयतिराट् टीकार्यवाक्यामृतं
ज्ञात्वाऽद्वैतमतं हलाहलसमं त्यक्त्वा समाख्याप्तये ।
सङ्ख्यावत्सुखदां दशोपनिषदां व्याख्यां समाख्यन्मुदा
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ ७॥
श्रीमद्वैष्णवलोकजालकगुरुः श्रीमत्परिव्राड्गुरुः
शास्त्रे देवगुरुः श्रितामरतरुः प्रत्यूहगोत्रस्वरुः ।
चेतोऽतीतशिरुस्तथा जितवरुस्सत्सौख्यसम्पत्करुः
श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम् ॥ ८॥
यस्सन्ध्यास्वनिशं गुरोर्यतिपतेः सन्मङ्गलस्याष्टकं
सद्यः पापहरं स्वसेवि विदुषां भक्त्यैतदाभाषितम् ।
भक्त्या वक्ति सुसम्पदं शुभपदं दीर्घायुरारोग्यकं
कीर्तिं पुत्रकलत्रबान्धवसुहृन्मूर्तिः प्रयाति ध्रुवम् ॥
इति श्रीमदप्पणाचार्यकृतं राघवेन्द्रमङ्गलाष्टकं सम्पूर्णम् ।
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री राघवेन्द्र मङ्गलाष्टकम् (Shri Raghavendra Mangalashtakam), जिसकी रचना श्री राघवेन्द्र स्वामी के परम शिष्य श्री अप्पणाचार्य (Shri Appanacharya) ने की है, एक अत्यंत भावपूर्ण और चमत्कारी स्तोत्र है। यह स्तोत्र 17वीं सदी के महान माध्व संत और दार्शनिक, श्री राघवेन्द्र स्वामी (Sri Raghavendra Swamy) को समर्पित है, जिन्हें उनके भक्त कल्पवृक्ष (इच्छा पूरी करने वाला वृक्ष) और कामधेनु (सब कुछ देने वाली गाय) के समान मानते हैं। इस स्तोत्र की मुख्य भावना मंगल की कामना है, जैसा कि इसके पुनरावृत्त होने वाले चरण "श्रीमत्सद्गुरुराघवेन्द्रयतिराट् कुर्याद्भुवं मङ्गलम्" (सद्गुरु श्री राघवेन्द्र यतिराज निश्चित रूप से मंगल करें) से स्पष्ट है। यह अष्टकम् उनके ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और उनके जीवंत समाधि स्थल, मंत्रालय (Mantralayam) की महिमा का गुणगान करता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ
इस स्तोत्र की फलश्रुति और इसके श्लोकों में वर्णित गुणों के आधार पर, इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
तत्काल पापों का नाश (Instant Destruction of Sins): फलश्रुति का आरंभ "सद्यः पापहरं" से होता है, जिसका अर्थ है कि यह स्तोत्र तत्काल पापों का हरण करने वाला है। गुरु की कृपा से व्यक्ति के सभी पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
संपूर्ण पारिवारिक सुख (Complete Family Well-being): फलश्रुति यह आश्वासन देती है कि भक्तिपूर्वक इसका पाठ करने वाला व्यक्ति "सुसम्पदं" (उत्तम संपत्ति), "दीर्घायुरारोग्यकं" (लंबी आयु और स्वास्थ्य), "कीर्तिं" (यश), और "पुत्रकलत्रबान्धवसुहृत्" (पुत्र, पत्नी, बंधु और मित्र) आदि सभी सुखों को निश्चित रूप से प्राप्त करता है। यह एक संपूर्ण और सुखी पारिवारिक जीवन (a complete and happy family life) का वरदान है।
सर्व-पुरुषार्थ सिद्धि (Attainment of All Four Purusharthas): छठे श्लोक में कहा गया है कि जो भक्त श्री राघवेन्द्र स्वामी के वृन्दावन (समाधि) की प्रदक्षिणा, नमस्कार, अभिषेक और स्तुति आदि करते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थों (the four goals of human life) को प्राप्त करते हैं।
ज्ञान और विद्या में पारंगतता (Expertise in Knowledge and Arts): तीसरे श्लोक में गुरु राघवेन्द्र को काव्य, नाटक, संगीत और विभिन्न शास्त्रों में पारंगत बताया गया है। उनकी उपासना करने से विद्यार्थियों और कला के साधकों को अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता (excellence) प्राप्त होती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
फलश्रुति के अनुसार, इस मंगलाष्टकम् का पाठ "सन्ध्यासु अनिशं" अर्थात् प्रतिदिन तीनों संध्याओं (सुबह, दोपहर, शाम) में करना चाहिए।
गुरुवार (Thursday) का दिन गुरु की पूजा के लिए सर्वोत्तम माना जाता है, इसलिए इस दिन इसका पाठ विशेष फलदायी है।
श्री राघवेन्द्र स्वामी की आराधना (जयंती और पुण्यतिथि) के दिनों में इसका पाठ करना उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन है।
किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में, यात्रा पर जाने से पहले, या किसी भी प्रकार के संकट के समय मंगल की कामना के साथ इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।