श्रीरामरघुनाथाष्टकम् (श्री कृष्णदास कृत)

दशरथनन्दन दाशरथीघन पूर्णचन्द्र तनु कान्तिमयं
दिव्यसुनयन रण्जीतरञ्जन रमापती वीर सीतानाथम् ।
गहनकानने लक्ष्मीलक्ष्मीपति पितृसत्यधारी सत्यसुतं
पूर्णसत्यदेव राघव माधब रामरघुनाथ पदौभजे ॥ १॥
मण्डितधरणी खण्डिततनुनतमस्तकेभूषित क्लेशभारं
सम्भबतियुगेयुगे नानाकृतधृतरूप अरूपस्वरूप शस्त्रधरम् ।
पापासुरनिधन साधुपरित्राण दरिद्रदारुण त्राणमूर्त्तिं
दिव्य कान्ति तनु नेत्र शशी भानु रामरघुनाथ पदौभजे ॥ २॥
घनघनघनीभूत कौशल्यासम्भूत रामरमाकान्त जगन्नाथं
शान्तसुशीतल सुनीलानल नीलतरलरल तवमुखम् ।
चन्दनविमर्दन मदनमोहन नग्ननिमग्नधीर भक्तरमं
हस्तेशस्त्रधारी त्रिभुबनविहारी रामरघुनाथ पदौभजे ॥ ३॥
अहल्यातारक बलीसंहारक शत्रुविनाशक विश्वदेवं
प्रेमप्रदायक ब्रह्माण्डनायक तारणपतक सत्यप्रियम् ।
दशमुखमर्द्धन भक्तप्राणधन नित्यनिरञ्जन सर्वसारं
सर्वमनोरञ्जन सर्वमानभञ्जन रामरघुनाथ पदौभजे ॥ ४॥
विक्रान्तकुण्डीर स्थिरमनोहर दिव्यकलेवर मायाधरम् ।
नीरजवदन पङ्कजलोचन पुष्करचरण मोक्ष्यप्रदं
रामरामहेराम श्रीरामजयराम रामरमणचित्तेचित्तधरं
पतिपतिसीतापति भूपतिश्रीपति रामरघुनाथ पदौभजे ॥ ५॥
मन्दरमान्दर सानन्दसुन्दर तरुणधारूणपति सृष्टिधरं
सदाप्रजाबत्सल कोमलौत्पल विमलश्यामल कलेवरम् ।
जानकीवल्लभ तवकरपल्लव सौरभदुर्लभ तत्त्वसारं
मोक्ष्यप्रदायक आनन्ददायक रामरघुनाथ पदौभजे ॥ ६॥
मारूतिसेवित इन्दिरावन्दित विश्वसन्दनीत श्रीकन्दरं
चण्डवातगति छिदतिदुर्गति सृष्टिप्रलयस्थिति मुलात्मूलम् ।
हेप्रभुईश्वर श्रीधरभूधर सर्वाङ्गसुन्दर रङ्गनाथं
कृपालुसागर नित्यमनोहर रामरघुनाथ पदौभजे ॥ ७॥
तव अनुस्मरण तव परिचिन्तन प्रध्यानपठन नित्यसुखं
मुखेतबगापन तव लीलावर्णन तव नामेमार्जन शुद्धमयम् ।
क्लेशक्लेशमहाक्लेश भवसुरा देबेश रक्षाकुरुस्वामी गोरक्षकं
हे रघुनन्दन सर्वक्लेशखण्डन रामरघुनाथ पदौभजे ॥ ८॥
ममबनरोदन परितापार्दन अपसारतबसङ्ग रघुनाथं
तबपददर्शन सदाचित्तेचिन्तन ममप्राणप्राणधन चक्रधरम् ।
उत्कलसम्भव शुभागसुभग भणतितबमालीका गोनायकं
दीनकृष्णदास प्रतिश्वासप्रश्वास रामरघुनाथ पदौभजे ॥ ९॥
॥ इति श्रीकृष्णदास विरचितं श्रीरामरघुनाथाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्रीरामरघुनाथाष्टकम् (Shri Rama Raghunatha Ashtakam), जिसकी रचना भक्तकवि श्री कृष्णदास (Shri Krishnadasa) ने की है, भगवान श्री राम के प्रति एक अत्यंत व्यक्तिगत और गहन शरणागति का भाव प्रकट करने वाला स्तोत्र है। इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसके पुनरावृत्त होने वाले चरण "रामरघुनाथ पदौभजे" (मैं राम रघुनाथ के चरणों का भजन करता हूँ) में है, जो भक्त की एकमात्र इच्छा को दर्शाता है - भगवान के चरणों की सेवा। अंतिम श्लोक में कवि स्वयं को "दीनकृष्णदास" कहते हुए यह प्रार्थना करते हैं कि उनकी प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में राम-रघुनाथ का भजन हो। यह स्तोत्र भगवान राम (Lord Rama) को दशरथनंदन, सीतापति, और भक्तों के क्लेश का नाश करने वाले के रूप में पूजता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ
इस भक्तिपूर्ण स्तोत्र का पाठ करने से साधक को भगवान राम की विशेष कृपा प्राप्त होती है:
समस्त क्लेशों का नाश (Destruction of All Afflictions): आठवें श्लोक में भगवान को "सर्वक्लेशखण्डन" कहा गया है। इसका पाठ करने से जीवन के सभी प्रकार के आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक क्लेश (afflictions) और कष्ट दूर होते हैं।
मोक्ष और आनंद की प्राप्ति (Attainment of Liberation and Bliss): भगवान को "मोक्ष्यप्रदायक" और "आनन्ददायक" कहा गया है। उनकी भक्ति करने से साधक को न केवल इस जीवन में आनंद मिलता है, बल्कि अंत में मोक्ष (Moksha) की भी प्राप्ति होती है।
पाप और दुर्गति से रक्षा (Protection from Sins and Misfortune): स्तोत्र में भगवान को "पापासुरनिधन" (पापी असुरों का नाश करने वाले) और "छिదतिदुर्गति" (दुर्गति को काटने वाले) के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी शरण लेने से व्यक्ति पाप कर्मों और दुर्भाग्य से बचता है।
प्रेम-भक्ति में वृद्धि (Increase in Loving Devotion): स्तोत्र में भगवान को "प्रेमप्रदायक" कहा गया है। इसका नित्य पाठ और चिंतन करने से हृदय में भगवान राम के प्रति प्रेम (love for Lord Rama) और भक्ति का भाव दृढ़ होता है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल या सायंकाल में, भगवान राम के चरणों का ध्यान करते हुए करना चाहिए।
राम नवमी (Rama Navami), हनुमान जयंती और एकादशी जैसे पवित्र दिनों पर इसका पाठ करना विशेष रूप से कल्याणकारी है।
अंतिम श्लोक में वर्णित "प्रतिश्वासप्रश्वास" (प्रत्येक श्वास में) के भाव को अपनाते हुए, अपने नित्य कर्म करते हुए भी मन-ही-मन इस स्तोत्र का स्मरण किया जा सकता है।
जब भी मन दुखी या व्याकुल हो, तो इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान के सहायक स्वरूप का स्मरण होता है और मन को शांति और बल (peace and strength) मिलता है।