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श्री पादुकाष्टकम्

श्री पादुकाष्टकम्
श्रीपादुकाष्टकम्

श्रीसमज्ञितमव्ययं परमप्रकाशगोचरं
खेदवर्जितमप्रमेयमनन्तमझ्झितकल्मषम् ।
निर्मलं निगमान्तनमद्भुतमप्यतर्क्यमनुत्तमं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ १॥
नादबिन्दु कलात्मकं दशनाद वेद विनोदितं
मन्त्रराजपराजितं निजमण्डलान्तरभासितम् ।
पञ्चवर्णमखण्डमद्भुतमादिकारणमच्युतं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ २॥
हन्तचारुमखण्डनादमनेक वर्णमरूपकं
शब्दजालमयं चराचर जन्तुदेहनिरासिनम् ।
चक्रराजमनाहतोद्भवमेघवर्णमतत्परं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ ३॥
बुद्धिरूपमबद्धकं त्रिदैवकूटस्थनिवासिनं
निश्चयं निरतप्रकाशमनेक सद्रुचिरूपकम् ।
पङ्कजान्तरखेलनं निजशुद्धसख्यमगोचरं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ ४॥
पञ्चपञ्चहृषिकदेहमनश्च तुष्कपरस्परं
पञ्चभूतनिकामषट्क समीरशब्दमभीकरम् ।
पञ्चकोशगुणत्रयादि समस्तधर्मविलक्षणं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ ५॥
पञ्चमुद्रसुलक्ष्यदर्शन भावमात्रनिरूपणं
विद्युदग्नि दग्धतिग विनोद कान्तिविवर्तनम् ।
चिन्मयत्रय वर्तिनं सदसद्विवेकमयायिकं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ ६॥
पञ्चवर्णशुकं समस्त रुचिर्विचित्र विचारिणं
चन्द्र सूर्य चिदग्नि मण्डल मण्डितं घन चिन्मयम् ।
चित्कलापरिपूर्णमण्डल चित्समाधिनिरीक्षितं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ ७॥
स्थूलसूक्ष्मसकारणान्तरखेलनं परिपालनं
विश्वतैजपप्राज्ञ चेत समन्तरात्मनिजस्थितिम् ।
सर्वकारणमीश्वरं निटलान्तरालविहारिणं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ ८॥
तप्तकाञ्चनदीप्यमानमहानुरूपमरूपकं
चन्द्रकान्तरतारकैरवमुज्वलं परमं पदम् ।
नीलनीलरथमध्यमस्थित विद्युदाभविभासितं
प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये ॥ ९॥

इति श्रीपादुकाष्टकं सम्पूर्णम् ।

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्री पादुकाष्टकम् (Shri Paduka Ashtakam) भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में गुरु के प्रति सर्वोच्च सम्मान और शरणागति को दर्शाने वाला एक गहन दार्शनिक स्तोत्र है। 'पादुका' का अर्थ है गुरु की चरण पादुकाएं (खड़ाऊँ)। यह अष्टकम् (यद्यपि इसमें नौ श्लोक हैं) गुरु की पादुकाओं को भौतिक वस्तु न मानकर, उन्हें साक्षात् परब्रह्म, ज्ञान और मोक्ष का स्रोत मानता है। इसकी मुख्य विशेषता इसका पुनरावृत्त होने वाला चरण "प्रातरेव हि मानसे गुरुपादुकाद्वयमाश्रये" है, जिसका अर्थ है, "मैं प्रातःकाल ही अपने मन में गुरु की दोनों पादुकाओं का आश्रय लेता हूँ।" यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) के गूढ़ सिद्धांतों, जैसे कि नाद-बिंदु-कला, पंचकोश, और चेतना की विभिन्न अवस्थाओं को गुरु की पादुकाओं के माध्यम से व्यक्त करता है। यह सिखाता है कि गुरु की कृपा ही आत्म-ज्ञान का एकमात्र द्वार है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

इस गहन स्तोत्र का पाठ और चिंतन करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • गुरु कृपा की प्राप्ति (Attainment of Guru's Grace): यह स्तोत्र गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास को मज़बूत करता है। गुरु की पादुकाओं का ध्यान करने से शिष्य पर गुरु की कृपा (Guru's grace) सहज ही बरसती है, जो आध्यात्मिक मार्ग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

  • पापों और दुखों का नाश (Destruction of Sins and Sorrows): स्तोत्र में गुरु-पादुकाओं को "खेदवर्जितम्" (दुःख से रहित) और "अझ्झितकल्मषम्" (पापों से रहित) कहा गया है। उनकी शरण लेने से साधक के सभी संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और वह सांसारिक दुखों से ऊपर उठ जाता है।

  • आत्म-ज्ञान और विवेक (Self-Knowledge and Discernment): गुरु-पादुकाओं को "बुद्धिरूपम्" (बुद्धि का स्वरूप) और "सदसद्विवेकमयायिकं" (सत्-असत् का विवेक प्रदान करने वाला) कहा गया है। इसका पाठ करने से साधक को सत्य और मिथ्या में भेद करने की क्षमता प्राप्त होती है और वह आत्म-ज्ञान (Self-knowledge) की ओर अग्रसर होता है।

  • समाधि और परम पद की प्राप्ति (Attainment of Samadhi and the Supreme State): स्तोत्र में पादुकाओं को "चित्समाधिनिरीक्षितं" (जिन्हें चित्त की समाधि में देखा जाता है) और "परमं पदम्" (परम पद) के रूप में वर्णित किया गया है। गुरु की कृपा से साधक को ध्यान की गहरी अवस्थाएं और अंततः मोक्ष (liberation) की प्राप्ति होती है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • स्तोत्र के अनुसार, इसका पाठ "प्रातरेव" (early morning) अर्थात् प्रातःकाल में करना सर्वोत्तम है।

  • गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) और अपने गुरु के जन्मदिन या पुण्यतिथि पर इस स्तोत्र का पाठ करना उनकी कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन है।

  • प्रतिदिन ध्यान या साधना आरम्भ करने से पहले, अपने गुरु का स्मरण करते हुए और उनकी पादुकाओं को अपने मस्तक पर धारण करने का भाव करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

  • यह स्तोत्र केवल पाठ करने के लिए नहीं, बल्कि इसके गूढ़ अर्थों पर मनन और चिंतन (contemplation and meditation) करने के लिए है। प्रत्येक श्लोक वेदांत के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को उजागर करता है।