Logoपवित्र ग्रंथ

श्री लक्ष्मीधराष्टकम् (डॉ. प्रदीप्त कुमार नंदा कृत)

श्री लक्ष्मीधराष्टकम् (डॉ. प्रदीप्त कुमार नंदा कृत)
॥ श्रीलक्ष्मीधराष्टकम् ॥

मङ्गलं श्यामलं शीतलं कोमलं राधिकावल्लभं निर्मलं माधवम् ।
मूरलीमोहनं देवकीनन्दनं कृष्णनारायणं वासुदेवं भजे ॥ १॥
श्रीधरं सुन्दरं विष्णुदामोदर-मिन्दिरावल्लभं देवपीताम्बरम् ।
गोपवृन्दारकं पापसङ्घातकं सौख्यविस्तारकं वासुदेवं भजे ॥ २॥
दारवं भास्वरं गोलनेत्रोज्ज्वलं घोषयात्राकरं चारुलीलाकरम् ।
नीलशैलेश्वरं श्रीपुरीनागरं देवताशेखरं वासुदेवं भजे ॥ ३॥
भोगदं योगदं मोक्षदं केशवं भक्तपालं जगन्नाथ-पापापहम् ।
नीलमेघावृतं चेलचामीकृतं शान्तिदं स्वस्तिदं वासुदेवं भजे ॥ ४॥
राघवं बान्धवं जानकीनायकं दैत्यसन्तारकं सत्यसम्पालकम् ।
कोशले नन्दितं वासवैर्वन्दितं श्यामदूर्वादलं रामचन्द्रं भजे ॥ ५॥
नृसिंहं भीषणं दुष्टसंहारकं सर्वगं शाश्वतं सिद्धविद्याधरम् ।
लोकनाथं महाविष्णु-चक्रायुधं शर्वसर्वेश्वरं वासुदेवं भजे ॥ ६॥
केतनं नूतनं मन्दिरे शोभनं वेतनं देहि मे त्वत्पुरे सत्वरम् ।
गुण्डिचावामनं घोषयात्राधनं वेदवाणीश्वरं वासुदेवं भजे ॥ ७॥
स्यन्दने दर्शनं घोरतापापहं मन्दिरे निर्जितं कालिआ नामकम् ।
सम्पदापत्सु वा ब्रह्मदारुप्रियं कामनापूरकं वासुदेवं भजे ॥ ८॥

॥ इति श्रीलक्ष्मीधराष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्री लक्ष्मीधराष्टकम् (Shri Lakshmidhara Ashtakam), जिसकी रचना डॉ. प्रदीप्त कुमार नंदा (Dr. Pradipta Kumar Nanda) ने की है, एक अर्वाचीन किन्तु अत्यंत भावपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) को समर्पित है। 'लक्ष्मीधर' का अर्थ है 'लक्ष्मी को धारण करने वाले', अर्थात् भगवान विष्णु। यह स्तोत्र भगवान जगन्नाथ को विष्णु के विभिन्न अवतारों, विशेषकर कृष्ण, राम और नृसिंह के एकीकृत स्वरूप में देखता है। इसकी मुख्य विशेषता इसका पुनरावृत्त होने वाला चरण "वासुदेवं भजे" है, जो सभी रूपों में एक ही परम तत्व वासुदेव का भजन करने पर बल देता है। यह स्तोत्र भगवान के मंगलमय, श्याम, शीतल, और कोमल स्वरूप का ध्यान करता है और पुरी धाम की प्रसिद्ध रथयात्रा (Gundicha Yatra) का भी उल्लेख करता है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से भक्तों को भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है:

  • पापों का नाश और सुख की वृद्धि (Destruction of Sins and Increase in Happiness): भगवान को "पापसङ्घातकं" (पापों के समूह का नाश करने वाले) और "सौख्यविस्तारकं" (सुख का विस्तार करने वाले) कहा गया है। इसका नित्य पाठ करने से पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख-शांति (happiness and peace) की वृद्धि होती है।

  • भोग, योग और मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of Enjoyment, Yoga, and Liberation): चौथे श्लोक में भगवान को "भोगदं, योगदं, मोक्षदं" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे भक्त की योग्यता और इच्छा के अनुसार उसे सांसारिक भोग, आध्यात्मिक योग और अंततः मोक्ष (Moksha) प्रदान करते हैं।

  • मनोकामना पूर्ति (Fulfillment of Desires): आठवें श्लोक में भगवान को "कामनापूरकं" अर्थात् सभी कामनाओं को पूरा करने वाला कहा गया है। उनकी शरण लेने से भक्त की सभी सात्विक इच्छाएं (righteous desires) पूर्ण होती हैं।

  • रथयात्रा दर्शन का पुण्य (Merit of Ratha Yatra Darshan): स्तोत्र में "स्यन्दने दर्शनं घोरतापापहं" कहकर रथ पर विराजमान भगवान के दर्शन को भयानक कष्टों को हरने वाला बताया गया है। जो भक्त पुरी नहीं जा सकते, वे इस स्तोत्र का पाठ करके मानसिक रूप से रथयात्रा (Ratha Yatra) का पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस स्तोत्र का पाठ किसी भी दिन, विशेषकर गुरुवार (Thursday) को, पूर्ण भक्ति भाव से किया जा सकता है।

  • जगन्नाथ रथयात्रा (Jagannath Ratha Yatra) के दिनों में इस अष्टकम् का पाठ करना अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है।

  • प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का ध्यान करते हुए, तुलसी दल अर्पित करके इसका पाठ करना चाहिए।

  • इसकी सरल और संगीतमय भाषा के कारण, इसे अपनी नित्य संध्या-वंदन में शामिल करने से मन को विशेष शांति और आनंद की अनुभूति होती है।