Logoपवित्र ग्रंथ

ब्रह्मणा प्रोक्तं जगन्नाथस्तोत्रम्

ब्रह्मणा प्रोक्तं जगन्नाथस्तोत्रम्

ब्रह्मोवाच ।

जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाघनाशन । जय चाणूरकेशिघ्न जय कंसनिषूदन ॥ ३३॥ जय पद्मपलाशाक्ष जय चक्रगदाधर । जय नीलाम्बुदश्याम जय सर्वसुखप्रद ॥ ३४॥ जय देव जगत्पूज्य जय संसारनाशन । जय लोकपते नाथ जय वाञ्छाफलप्रद ॥ ३५॥ संसारसागरे घोरे निःसारे दुःखफेनिले । निमग्नोऽहं सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरुषोत्तम ॥ ३६॥ नानारोगोर्मिकलिले मोहावर्तसुदुस्तरे । निमग्नोऽहं सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरुषोत्तम ॥ ३७॥ ॥ इति ब्रह्मपुराणे सप्तपञ्चाशत्तमाध्यायान्तर्गतं ब्रह्मणा प्रोक्तं जगन्नाथस्तोत्रं समाप्तम् ॥
संलिखित ग्रंथ पढ़ें

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और उद्गम

ब्रह्मणा प्रोक्तं जगन्नाथस्तोत्रम् का वर्णन ब्रह्मपुराण (Brahma Purana) के 57वें अध्याय में मिलता है। यह स्तुति स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी (Lord Brahma) द्वारा भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) के प्रति की गई है। जब ब्रह्मा जी ने पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) में भगवान के दर्शन किए, तो वे भावविभोर हो गए और उन्होंने इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान की महिमा का गान किया। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के 'जगन्नाथ' (जगत के नाथ) और 'पुरुषोत्तम' (पुरुषों में उत्तम) स्वरूप को समर्पित है।

स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)

ब्रह्मा जी ने इस स्तोत्र में भगवान के रक्षक और पाप-नाशक रूप का सुंदर वर्णन किया है:
  • पाप और असुर संहारक: "सर्वाघनाशन" (सभी पापों का नाश करने वाले) और "कंसनिषूदन" (कंस का वध करने वाले)। ब्रह्मा जी याद दिलाते हैं कि भगवान का अवतार धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए होता है।
  • पद्मपलाशाक्ष: भगवान के नेत्र कमल की पंखुड़ी (Lotus petals) के समान सुंदर और विशाल हैं। उनकी दृष्टि मात्र से जीव का कल्याण हो जाता है।
  • संसार सागर से रक्षा: श्लोक ३६ और ३७ में ब्रह्मा जी कहते हैं—"संसारसागरे घोरे... निमग्नोऽहं" (मैं इस भयानक संसार सागर में डूबा हुआ हूँ)। यह जीव की असहाय स्थिति का चित्रण है, जहाँ केवल भगवान 'पुरुषोत्तम' ही एकमात्र सहारा हैं।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

ब्रह्मपुराण के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
  • संसार भय से मुक्ति: यह स्तोत्र 'दुःखफेनिले' (दुखों के झाग से भरे) संसार सागर से पार उतारने वाली नौका है। इसका पाठ जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (Moksha) प्रदान करता है।
  • रोग निवारण: "नानारोगोर्मिकलिले" - संसार में अनेक रोगों की लहरें उठ रही हैं। भगवान जगन्नाथ की यह स्तुति शारीरिक और मानसिक रोगों (Diseases) से रक्षा करती है।
  • मनोकामना पूर्ति: भगवान को 'वाञ्छाफलप्रद' कहा गया है। अर्थात, वे भक्तों की सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • रथ यात्रा (Rath Yatra): आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (रथ यात्रा) के दिन इस स्तोत्र का पाठ विशेष पुण्यदायी होता है।
  • गुरुवार और एकादशी: भगवान विष्णु और कृष्ण को प्रिय इन दिनों में स्नान के बाद तुलसी दल अर्पित कर इसका पाठ करें।
  • स्तोत्र के ३२वें श्लोक (जो संदर्भ है) में कहा गया है कि भगवान को गंध, पुष्प आदि से पूजकर (Sampuja Gandhapushpadyaih) इस स्तोत्र द्वारा उन्हें प्रसन्न करना चाहिए।
  • अंत में "त्राहि मां पुरुषोत्तम" (हे पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा करो) का भावपूर्ण उच्चारण करें।