श्री भ्रमराम्बाष्टकम्

बालेन्दुद्युतिपादपल्लवयुतां ब्रह्माण्डसञ्चारिणीम् ।
चारुश्रीकलशातपत्रकमहासौभाग्यरेखाङ्घ्रिकां
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ १॥
पादाम्भोरुहमध्यमानमहिषाम्भद्रायमानोदयां
कूर्माकारपदोपरिस्थलरुचिं घोरान्धकारापहाम् ।
जलघानिर्मितमान्मधेयशरधिं जम्बूफलश्रीमयीं
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ २॥
जानुश्रीजितकुम्भिकुम्भविभवां चण्डीं महायोगिनीं
रम्भारम्भकराधरोरु युगलां रत्नासनस्थायिनीम् ।
श्रीचक्राङ्कितचक्रविभ्रमकटीं सिन्दूरवर्णोज्ज्वलां
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ ३॥
भर्मानिर्मितदिव्यरत्नदलनां भव्याम्बरालङ्कृतां
सौन्दर्योधकपूर्णनाभिसरसीं शातोल्लसन्मध्यमाम् ।
वक्शोजद्वयशातकुम्भकलशां वश्यादि मन्त्रात्मिकां
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ ४॥
कण्ठालम्बिततारहारपटलां कैवल्यसन्दायिनीं
शोभाजालमृणालबाहुडमरु स्थूलाब्जचक्राङ्किताम् ।
सद्बिम्बाधररक्तकुन्दवदनां स्वारस्य सम्भाषिणीं
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ ५॥
नक्षत्राधिकनासिकामणिधरां नव्यारविन्देक्षणां
मुक्तालङ्कृतकर्णभूषणयुगां मुग्धप्रतापान्विताम् ।
आदर्शामलगण्डमण्डलधरामानन्दपूर्णान्तरां
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ ६॥
श्रीबालां च सुगन्धिगन्धतिलकां नव्यद्विरेपालकां
सीमन्तायुतनद्दमौक्तकसरां शृङ्गाररङ्गत्कचाम् ।
गाङ्गेयाचितरत्नकङ्कणझणत्काराग्रहस्तद्वयां
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ ७॥
सर्वाङ्गाभरणां प्रसन्नवदनां सर्वेश्वरीं सर्वदां
सर्वज्ञां सजलाभ्रविभ्रमतनुं भक्तप्रियामम्बिकाम् ।
मौलिस्थापितचन्द्रशेखरवरां माल्यार्पिताङ्गां शिवां
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ ८॥
कल्याणीं कमलासनस्थचरणां गौरीं घनश्यामला
ग्रैवेयाकृतहारनूपुरधरां कञ्जातप्राय्तेक्षणाम् ।
गङ्गातुङ्गतरङ्गभासवदनां गन्धर्वगानप्रियां
श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥ ९॥
श्रीशैलभ्रमराम्बिकाष्टकमिदं श्रेयस्करं शाश्वतं
चैन्द्रश्रीकरमप्रमेयमतुलं हर्षप्रदं बुद्धिदम् ।
प्रभाते नियमात्पठेद्यदि पुमान् भक्त्यन्तरात्मशुचिः
शौक्लींशान्तिमवाप्नुयात्रिजगतां सर्वेश्वरत्वं जयम् ॥ १०॥
॥ इति श्रीभ्रमराम्बाष्टकं समाप्तम् ।
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री भ्रमराम्बाष्टकम् (Shri Bhramaramba Ashtakam) देवी पार्वती के 'भ्रमराम्बा' स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत सुंदर और शक्तिशाली स्तोत्र है। 'भ्रमर' का अर्थ है 'मधुमक्खी'। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी ने अरुणासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए असंख्य मधुमक्खियों का रूप धारण किया था, इसीलिए वे 'भ्रमराम्बा' या 'भ्रमराम्बिका' कहलाईं। उनका मुख्य मंदिर श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश (Srisailam, Andhra Pradesh) में स्थित है, जो 18 महाशक्ति पीठों (18 Maha Shakti Peethas) में से एक है और साथ ही 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक (मल्लिकार्जुन) का भी स्थान है। यह अष्टकम् देवी के सौंदर्य, कृपा और शक्ति का विस्तृत वर्णन करता है और उन्हें 'श्रीशैलभ्रमराम्बिकां शिवयुतां' (श्रीशैलम में शिव के साथ विराजमान भ्रमराम्बिका) के रूप में पूजता है।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
यह स्तोत्र देवी के दिव्य स्वरूप का ध्यान करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए एक उत्तम साधन है:
सौंदर्य और दिव्यता का वर्णन (Description of Beauty and Divinity): स्तोत्र में देवी के नख से शिखा तक के सौंदर्य का अत्यंत काव्यात्मक वर्णन है, जैसे कमल जैसे नेत्र, चंद्रमा जैसा मुख, रत्नों के आभूषण, और सुंदर केश। यह भक्त को देवी के दिव्य स्वरूप में मन को एकाग्र करने में मदद करता ਹੈ।
कल्याण, यश और संपत्ति की प्राप्ति (Attainment of Well-being, Fame, and Wealth): फलश्रुति में कहा गया है, "श्रेयः श्रीशिवकीर्तिसम्पदमलं सम्प्राप्य" - अर्थात जो भक्त प्रातःकाल नियमपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता ਹੈ, उसे कल्याण, शिव की कृपा से प्राप्त कीर्ति और प्रचुर धन-संपत्ति (wealth and prosperity) की प्राप्ति होती है।
सर्वेश्वरत्व और विजय (Lordship and Victory): स्तोत्र के अंत में कहा गया है कि पाठक को "त्रिजगतां सर्वेश्वरत्वं जयम्" अर्थात तीनों लोकों में स्वामित्व और विजय (victory) प्राप्त होती ہے। यह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का प्रतीक है।
बुद्धि और आनंद की वृद्धि (Increase in Intellect and Happiness): इसे "हर्षप्रदं बुद्धिदम्" भी कहा गया ਹੈ, जिसका अर्थ ਹੈ कि यह आनंद और उत्तम बुद्धि (intellect) प्रदान करने वाला ਹੈ।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल (in the morning) में, शुद्ध हृदय और भक्ति के साथ करना सर्वश्रेष्ठ है।
नवरात्रि (Navratri) के नौ दिनों में, विशेषकर अष्टमी तिथि को, और प्रत्येक शुक्रवार (Friday) को इसका पाठ करने से देवी भ्रमराम्बा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
जो भक्त श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग की यात्रा करते हैं, उनके लिए मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन के साथ-साथ देवी भ्रमराम्बा के समक्ष इस अष्टकम् का पाठ करना अनिवार्य माना जाता ਹੈ।
इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ्य (good health), पारिवारिक सुख और जीवन में सभी प्रकार की सफलता प्राप्त होती है।