दुर्गाष्टकम् (कृष्ण स्तुते)

वन्द्ये महेशदयिते करुणार्णवेशि ।
स्तुत्ये स्वधे सकलतापहरे सुरेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ १॥
दिव्ये नुते श्रुतिशतैर्विमले भवेशि
कन्दर्पदाराशतसुन्दरि माधवेशि ।
मेधे गिरीशतनये नियते शिवेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ २॥
रासेश्वरि प्रणततापहरे कुलेशि
धर्मप्रिये भयहरे वरदाग्रगेशि ।
वाग्देवते विधिनुते कमलासनेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ ३॥
पूज्ये महावृषभवाहिनि मंगलेशि
पद्मे दिगम्बरि महेश्वरि काननेशि ।
रम्येधरे सकलदेवनुते गयेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ ४॥
श्रद्धे सुराऽसुरनुते सकले जलेशि
गंगे गिरीशदयिते गणनायकेशि ।
दक्षे स्मशाननिलये सुरनायकेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ ५॥
तारे कृपार्द्रनयने मधुकैटभेशि
विद्येश्वरेश्वरि यमे निखलाक्षरेशि ।
ऊर्जे चतुःस्तनि सनातनि मुक्तकेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ ६॥
मोक्षेऽस्थिरे त्रिपुरसुन्दरिपाटलेशि
माहेश्वरि त्रिनयने प्रबले मखेशि ।
तृष्णे तरंगिणि बले गतिदे ध्रुवेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ ७॥
विश्वम्भरे सकलदे विदिते जयेशि
विन्ध्यस्थिते शशिमुखि क्षणदे दयेशि ।
मातः सरोजनयने रसिके स्मरेशि
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि ॥ ८॥
दुर्गाष्टकं पठति यः प्रयतः प्रभाते
सर्वार्थदं हरिहरादिनुतां वरेण्यां ।
दुर्गां सुपूज्य महितां विविधोपचारैः
प्राप्नोति वांछितफलं न चिरान्मनुष्यः ॥ ९॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
यह दुर्गाष्टकम् (Durga Ashtakam) एक अत्यंत दुर्लभ और विशेष स्तोत्र है, जो 'विश्वसार तंत्र' से लिया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी रचना स्वयं भगवान श्री कृष्ण (Lord Shri Krishna) ने की है। इसमें भगवान कृष्ण, जो स्वयं जगत के स्वामी हैं, देवी दुर्गा की स्तुति करते हुए उनसे कृपा की याचना कर रहे हैं। प्रत्येक श्लोक का अंत "कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि" (हे कृष्ण द्वारा पूजित देवी, हे ललिता, हे अखिलेश्वरी, मुझ पर कृपा करो) से होता है, जो इस तथ्य को प्रमाणित करता हैं।। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की सर्वोच्च शक्ति और महिमा को दर्शाता है, जिनकी वंदना हरि और हर (विष्णु और शिव) जैसे देवता भी करते हैं।
अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)
यह स्तोत्र देवी के विभिन्न रूपों और शक्तियों का सुंदर समन्वय है:
सर्वदेवमयी स्वरूप (Embodiment of All Deities): श्री कृष्ण देवी को 'महेशदयिते' (शिव की प्रिय), 'माधवेशि' (विष्णु की स्वामिनी), 'वाग्देवते' (सरस्वती), और 'कमलासनेशि' (लक्ष्मी) जैसे नामों से संबोधित करते हैं। यह दर्शाता है कि देवी दुर्गा ही सभी देवियों की मूल शक्ति हैं।
कृष्ण द्वारा स्तुति (Praised by Krishna): "कृष्णस्तुते" शब्द का बार-बार आना यह सिद्ध करता हैं। कि देवी की शक्ति इतनी महान हैं। कि पूर्णावतार श्री कृष्ण भी उनकी कृपा चाहते हैं। यह पाठ करने वाले को कृष्ण और दुर्गा, दोनों की कृपा का पात्र बनाता है।
फलश्रुति - सर्व मनोकामना पूर्ति (Benefit - Fulfillment of All Desires): अंतिम श्लोक में स्पष्ट कहा गया है, "प्राप्नोति वांछितफलं न चिरान्मनुष्यः" - जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल पवित्र होकर इस "सर्वार्थदं" (सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाले) दुर्गाष्टकम् का पाठ करता है, वह शीघ्र ही अपने सभी इच्छित फलों (all desired results) को प्राप्त कर लेता है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल (in the morning) में, स्नान करने के बाद पवित्र होकर करना चाहिए।
नवरात्रि (Navratri), दुर्गा पूजा और प्रत्येक शुक्रवार (Friday) को इसका पाठ करना विशेष रूप से फलदायी होता हैं।।
पाठ से पूर्व देवी दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। उन्हें लाल पुष्प, सिंदूर और मिष्ठान्न का भोग लगाना शुभ होता है।
चूंकि यह भगवान कृष्ण द्वारा रचित है, इसका पाठ करने से भक्तों को देवी दुर्गा के साथ-साथ श्री कृष्ण का भी आशीर्वाद प्राप्त होता हैं।, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता (happiness, prosperity, and success) आती है।