आञ्जनेय दण्डकम्
Anjaneya Dandakam Stotram

प्रभादिव्यकायं प्रकीर्ति प्रदायं
भजे वायुपुत्रं भजे वालगात्रं भजेहं पवित्रं
भजे सूर्यमित्रं भजे रुद्ररूपं
भजे ब्रह्मतेजं बटञ्चुन् प्रभातम्बु सायन्त्रमुन्
नीनामसङ्कीर्तनल् जेसि
नी रूपु वर्णिञ्चि नीमीद ने दण्डकं बॊक्कटिन् जेय नोहिन्चि
नी मूर्तिगाविञ्चि नीसुन्दरं बॆञ्चि नी दासदासुण्डनै
रामभक्तुण्डनै निन्नु नेगॊल्चॆदन्
(नी) नन् कटाक्षम्बुनन् जूचिते वेडुकल् चेसिते
ना मॊरालिञ्चिते नन्नु रक्षिञ्चिते
अञ्जनादेवि गर्भान्वया देव
निन्नॆञ्च नेनॆन्तवाडन्
दयाशालिवै जूचियुन् दातवै ब्रोचियुन्
दग्गरन् निल्चियुन् दॊल्लि सुग्रीवुकुन्-मन्त्रिवै
स्वामि कार्यार्थमै येगि
श्रीराम सौमित्रुलं जूचि वारिन्विचारिञ्चि
सर्वेशु बूजिञ्चि यब्भानुजुं बण्टु गाविञ्चि
यव्वालिनिन् जम्पिञ्चि काकुत्थ्स तिलकुन् [कृपादृष्टि] दयादृष्टि वीक्षिञ्चि
किष्किन्धकेतॆञ्चि श्रीराम कार्यार्थमै लङ्क केतॆञ्चियुन्
लङ्किणिन् जम्पियुन् लङ्कनुन् गाल्चियुन्
यभ्भूमिजं जूचि यानन्दमुप्पॊङ्गि यायुङ्गरम्बिच्चि
यारत्नमुन् दॆच्चि श्रीरामुनकुन्निच्चि सन्तोषमुन्जेसि
सुग्रीवुनिन् यङ्गदुन् जाम्बवन्तु [न्नलुन्नीलुलन्] वीराधुलन् गूडि
यासेतुवुन् दाटि वानरुल्मूकलै पॆन्मूकलै
[यादैत्युलन्] दैत्युलन् द्रुञ्चगा
रावणुण्डन्त कालाग्नि रुद्रुण्डुगा कोरि [वच्चि]
ब्रह्माण्डमैनट्टि या शक्तिनिन्वैचि यालक्षणुन् मूर्छनॊन्दिम्पगा
नप्पुडे पोयि [नीवु] सञ्जीविनिन्दॆच्चि सौमित्रिकिन्निच्चि प्राणम्बु रक्षिम्पग
कुम्भकर्णादुल न्वीरुलं बोर श्रीराम बाणाग्नि
वारन्दरिन् रावणुन् जम्पगा
नन्त लोकम्बु लानन्दमै युण्ड
नव्वेलनु न्विभीषुणुन् वेडुकन् दोडुकन् वच्चि पट्टाभिषेकम्बु चेयिञ्चि,
सीतामहादेविनिन् दॆच्चि [श्रीरामुकुन्निच्चि] श्रीरामुतो चेर्चि,
यन्तन्नयोध्यापुरिन्जॊच्चि पट्टाभिषेकम्बु संरम्भमैयुन्न
नीकन्न नाकॆव्वरुन् गूर्मि लेरञ्चु मन्निञ्चिनन्
श्रीरामभक्ति प्रशस्तम्बुगा निन्नु [सेविञ्चि] नीनाम सङ्कीर्तनल् चेसिति
पापमुल्ल्बायुने भयमुलुन् दीरुने भाग्यमुल् गल्गुने
सकल साम्राज्यमुल् गल्गु सम्पत्तुलुन् कल्गुनो
वानराकार यो भक्त मन्दार यो पुण्य सञ्चार यो धीर यो वीर
नीवे समस्तम्बु नीवे महाफलमुगा वॆलसि
यातारक ब्रह्म मन्त्रम्बु [पठियिञ्चुचुन्] सन्धानमुन् चेयुचु स्थिरम्मुगन्
वज्रदेहम्बुनुन् दाल्चि श्रीराम श्रीरामयञ्चुन् मनःपूतमैन ऎप्पुडुन् तप्पकन्
तलतुना जिह्वयन्दुण्डि नी दीर्घदेहम्मु त्रैलोक्य सञ्चारिवै
रामनामाङ्कित ध्यानिवै ब्रह्मवै ब्रह्मतेजम्बुनन् रौद्रनीज्वाल
कल्लोल हावीर हनुमन्त ओङ्कार शब्दम्बुलन् क्रूरकर्म ग्रह भूत प्रेतम्बुलन् बॆन्
पिशाचम्बुलन् शाकिनी ढाकिनी मोहिनी त्यादुलन् गालिदय्यम्बुलन्
नीदु वालम्बुनन् जुट्टि नेलम्बडं गॊट्टि नीमुष्टि घातम्बुलन्
बाहुदण्डम्बुलन् रोमखण्डम्बुलन् द्रुञ्चि कालाग्नि
रुद्रुण्डवै नीवु ब्रह्म प्रभाभासितम्बैन नीदिव्य तेजम्बुनुन् जूचि
[रारोरि] रारा नामुद्दु नरसिंह यन्चुन् दयादृष्टि
वीक्षिञ्चि नन्नेलु नास्वामियो याञ्जनेया
नमस्ते सदा ब्रह्मचारी
नमस्ते व्रतपूर्णहारि नमस्ते नमोवायुपुत्रा नमस्ते नमो नमः
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इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
आञ्जनेय दण्डकम् भगवान हनुमान (Lord Hanuman) को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और विस्तृत स्तुति है। 'दण्डकम्' संस्कृत और तेलुगु काव्य की एक विशेष शैली है जिसमें एक ही लय में लंबे, निरंतर छंद होते हैं, जो एक कहानी या देवता की महिमा का धाराप्रवाह वर्णन करते हैं। यह दण्डकम्, जो मूल रूप से तेलुगु भक्ति साहित्य की देन है, भगवान हनुमान के सम्पूर्ण जीवन चरित्र को एक ही स्तोत्र में समाहित कर लेता है। इसमें उनके जन्म से लेकर, सूर्य को फल समझना, श्री राम से मिलन, लंका दहन, संजीवनी लाना, और श्री राम के प्रति उनकी अटूट रामभक्ति (devotion to Rama) तक की सभी लीलाओं का बहुत ही ओजस्वी और भावपूर्ण वर्णन है।
दण्डकम् के विस्तृत लाभ
इस दण्डकम् का पाठ करने से साधक को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं, जिनका उल्लेख स्तोत्र में ही मिलता है:
सर्व-संकट निवारण (Removal of All Dangers): "भयमुलुन् दीरुने" - इसका पाठ करने से सभी प्रकार के भय, चाहे वे ज्ञात हों या अज्ञात, समाप्त हो जाते हैं। यह संकटमोचन (remover of calamities) के रूप में हनुमान जी की शक्ति को जागृत करता है।
नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा (Protection from Negative Energies): स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है कि क्रूर ग्रह, भूत, प्रेत, पिशाच, शाकिनी, डाकिनी और अन्य दुष्ट शक्तियाँ हनुमान जी के ओजस्वी रूप के स्मरण मात्र से नष्ट हो जाती हैं। यह बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) के खिलाफ एक शक्तिशाली कवच प्रदान करता है।
समृद्धि और सफलता (Prosperity and Success): "भाग्यमुल् गल्गुने, सकल साम्राज्यमुल् गल्गु सम्पत्तुलुन् कल्गुनो" - इसका अर्थ है कि पाठक का भाग्य उदय होता है और उसे सभी प्रकार की संपत्ति, सुख और सफलता (success) की प्राप्ति होती है।
आरोग्य और शक्ति (Health and Strength): हनुमान जी 'वज्रदेह' हैं, अर्थात उनका शरीर वज्र के समान कठोर है। उनके इस रूप का ध्यान करने से पाठक को अच्छे स्वास्थ्य और शारीरिक शक्ति (good health and physical strength) की प्राप्ति होती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
दण्डकम् का पाठ करने का सबसे उत्तम दिन मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) है।
पाठ शुरू करने से पहले हनुमान जी की मूर्ति के सामने घी या चमेली के तेल का दीपक जलाएं और उन्हें सिंदूर और गुड़-चने का भोग लगाएं।
क्योंकि यह एक लंबा स्तोत्र है, इसे पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता से, बिना जल्दबाजी के पढ़ना चाहिए। इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष संकट या भय से पीड़ित है, तो उसे प्रतिदिन इस दण्डकम् का पाठ करना चाहिए जब तक कि समस्या का समाधान न हो जाए।