अश्वपती पुसता झाला। नारद सांगताती तयाला॥
अल्पायुषी सत्यवंत। सावित्रीनें का प्रणीला॥
आणखी वर वरी बाळे। मनीं निश्चय जो केला॥
आरती वडराजा॥१॥
दयावंत यमदूजा। सत्यवंत ही सावित्री॥
भावे करीन मी पूजा। आरती वडराजा॥
ज्येष्ठामास त्रयोदशी। करिती पूजन वडाशीं॥
त्रिरात्र व्रत करूनीया। जिंकी तूं सत्यवंताशी॥२॥
स्वर्गावरी जाऊनियां। अग्निखांब कचळीला॥
धर्मराजा उचकला। हत्या घालील जीवाला॥
येई ग पतिव्रते। पती नेई गे आपुला॥३॥
जाऊनियां यमापाशीं। मागतसे आपुला पती॥
चारी वर देऊनियां। दयावंता द्यावा पती॥४॥
पतिव्रते तुझी कीर्ति। ऐकुनी ज्या नारी॥
तुझें व्रतें आचरती। तुझी भुवनें पावती॥५॥
पतिव्रते तुझी स्तुती। त्रिभुवनी ज्या करिती॥
स्वर्गी पुष्पवृष्टी। करुनियां आणिलासी आपुला पती॥
अभय देऊनियां। पतिव्रते तारी त्यासी॥६॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
अल्पायुषी सत्यवंत। सावित्रीनें का प्रणीला॥
आणखी वर वरी बाळे। मनीं निश्चय जो केला॥
आरती वडराजा॥१॥
दयावंत यमदूजा। सत्यवंत ही सावित्री॥
भावे करीन मी पूजा। आरती वडराजा॥
ज्येष्ठामास त्रयोदशी। करिती पूजन वडाशीं॥
त्रिरात्र व्रत करूनीया। जिंकी तूं सत्यवंताशी॥२॥
स्वर्गावरी जाऊनियां। अग्निखांब कचळीला॥
धर्मराजा उचकला। हत्या घालील जीवाला॥
येई ग पतिव्रते। पती नेई गे आपुला॥३॥
जाऊनियां यमापाशीं। मागतसे आपुला पती॥
चारी वर देऊनियां। दयावंता द्यावा पती॥४॥
पतिव्रते तुझी कीर्ति। ऐकुनी ज्या नारी॥
तुझें व्रतें आचरती। तुझी भुवनें पावती॥५॥
पतिव्रते तुझी स्तुती। त्रिभुवनी ज्या करिती॥
स्वर्गी पुष्पवृष्टी। करुनियां आणिलासी आपुला पती॥
अभय देऊनियां। पतिव्रते तारी त्यासी॥६॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Ashwapati pusata jhala, Narad sangatati tayala,
Alpayushi Satyavant, Savitrinen ka pranila. ||
Aankhi var vari baale, manin nishchay jo kela,
Aarti Vadaraja. ||1||
Dayavant Yamaduja, Satyavant hi Savitri,
Bhave karin mi puja, Aarti Vadaraja. ||
Jyeshthamasa trayodashi, kariti pujan vadashin,
Triratra vrat karuniya, jinki tun Satyavantashi. ||2||
Svargavari jauniyan, agnikhamb kachalila,
Dharmaraja uchakala, hatya ghalil jivala. ||
Yei ga pativrate, pati nei ge aapula. ||3||
Jauniyan yamapashin, magatase aapula pati,
Chari var deuniyan, dayavanta dyava pati. ||4||
Pativrate tujhi kirti, aikuni jya naari,
Tujhen vraten aacharati, tujhi bhuvanen paavati. ||5||
Pativrate tujhi stuti, tribhuvani jya kariti,
Svargi pushpavrishti, karuniyan aanilasi aapula pati. ||
Abhay deuniyan, pativrate tari tyasi. ||6||
॥ Iti Sampurnam ॥
Alpayushi Satyavant, Savitrinen ka pranila. ||
Aankhi var vari baale, manin nishchay jo kela,
Aarti Vadaraja. ||1||
Dayavant Yamaduja, Satyavant hi Savitri,
Bhave karin mi puja, Aarti Vadaraja. ||
Jyeshthamasa trayodashi, kariti pujan vadashin,
Triratra vrat karuniya, jinki tun Satyavantashi. ||2||
Svargavari jauniyan, agnikhamb kachalila,
Dharmaraja uchakala, hatya ghalil jivala. ||
Yei ga pativrate, pati nei ge aapula. ||3||
Jauniyan yamapashin, magatase aapula pati,
Chari var deuniyan, dayavanta dyava pati. ||4||
Pativrate tujhi kirti, aikuni jya naari,
Tujhen vraten aacharati, tujhi bhuvanen paavati. ||5||
Pativrate tujhi stuti, tribhuvani jya kariti,
Svargi pushpavrishti, karuniyan aanilasi aapula pati. ||
Abhay deuniyan, pativrate tari tyasi. ||6||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"अश्वपती पुसता झाला" यह पारंपरिक मराठी आरती वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) के पावन अवसर पर गाई जाती है। यह आरती केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि सावित्री और सत्यवान (Savitri and Satyavan) की पौराणिक कथा का संगीतमय वर्णन है। सावित्री को भारतीय संस्कृति में 'महासती' और पतिव्रता धर्म का आदर्श माना जाता है, जिन्होंने अपने तप और बुद्धि के बल पर यमराज से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यह आरती ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) और अमावस्या के दिन सुहागिन महिलाओं द्वारा अखंड सौभाग्य (eternal marital bliss) की कामना के साथ गाई जाती है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती पूरी कथा को संक्षेप में प्रस्तुत करती है:
- नारद की भविष्यवाणी (Narada's Prophecy): "अश्वपती पुसता झाला, नारद सांगताती तयाला" - राजा अश्वपति (सावित्री के पिता) नारद मुनि से पूछते हैं, और नारद बताते हैं कि सत्यवान अल्पायु (short-lived) हैं। फिर भी, सावित्री सत्यवान को ही अपने पति के रूप में चुनती हैं।
- यमराज से संवाद (Dialogue with Yama): "जाऊनियां यमापाशीं, मागतसे आपुला पती" - सावित्री यमराज का पीछा करती हैं और उनसे अपने पति के प्राण मांगती हैं। यमराज उनकी भक्ति और ज्ञान से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देते हैं।
- वरदान प्राप्ति (Granting of Boons): आरती में सावित्री द्वारा चार वर (four boons) प्राप्त करने का उल्लेख है, जिसमें उनके ससुर की खोई हुई दृष्टि और राज्य, उनके पिता के लिए पुत्र, और स्वयं के लिए सौ पुत्र (hundred sons) का वर शामिल है, जिससे परोक्ष रूप से सत्यवान का जीवन बच जाता है।
- वडराजा की आरती (Aarti of Vadraja): "आरती वडराजा" - यह आरती वट वृक्ष (Banyan Tree) को समर्पित है, जिसे 'वडराजा' कहा गया है, क्योंकि सावित्री ने इसी वृक्ष के नीचे सत्यवान के प्राण वापस पाए थे।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- वट पूजन (Worship of Banyan Tree): महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर सूत का धागा लपेटते हुए परिक्रमा (circumambulation) करती हैं और वृक्ष की पूजा करती हैं।
- त्रिरात्र व्रत (Three-night Fast): पारंपरिक रूप से यह "त्रिरात्र व्रत" (तीन रातों का व्रत) माना जाता है, जैसा कि आरती में "त्रिरात्र व्रत करूनीया" पंक्ति में उल्लेखित है।
- प्रार्थना (Prayer): आरती के अंत में महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन (happy married life) के लिए प्रार्थना करती हैं।
