जय जय विठ्ठल भगवन् करुणामयमूर्ते!।
धूर्तेतरसकृदुपनतसर्वेप्सितपूर्तेः॥
श्रुतिशास्त्राचारानधिकारादतिमलिना
जीवास्तव दृष्टस्मृतवन्दितपदनलिनाः।
ते साञ्जलिना दूरान्नमिताः खलु कलिना
कालेनापि कवलिताखिलजगता बलिना॥१॥
भवताधिष्ठितमानशं भीमरथीतीरं
वैकुण्ठीकृतमिह नो रमयति कं धीरं।
जडमपि कुरुषे सुपटुं वाचि यथा कीरं
शिरसि बिभर्षि घृतं ते येन चरणनीरम्॥२॥
त्वां मेघमिव मयूरा दृष्ट्वा तव भृत्याः
प्रेमाश्रुप्लुतनयना भृशविस्मृतकृत्याः।
व्यक्तं मङ्ख भवन्ति प्रमुदादृतकृत्या
मुक्तिर्वृणुते तानुरुगाय! मनोवृत्त्या॥३॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं श्रीविठ्ठलार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥
धूर्तेतरसकृदुपनतसर्वेप्सितपूर्तेः॥
श्रुतिशास्त्राचारानधिकारादतिमलिना
जीवास्तव दृष्टस्मृतवन्दितपदनलिनाः।
ते साञ्जलिना दूरान्नमिताः खलु कलिना
कालेनापि कवलिताखिलजगता बलिना॥१॥
भवताधिष्ठितमानशं भीमरथीतीरं
वैकुण्ठीकृतमिह नो रमयति कं धीरं।
जडमपि कुरुषे सुपटुं वाचि यथा कीरं
शिरसि बिभर्षि घृतं ते येन चरणनीरम्॥२॥
त्वां मेघमिव मयूरा दृष्ट्वा तव भृत्याः
प्रेमाश्रुप्लुतनयना भृशविस्मृतकृत्याः।
व्यक्तं मङ्ख भवन्ति प्रमुदादृतकृत्या
मुक्तिर्वृणुते तानुरुगाय! मनोवृत्त्या॥३॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं श्रीविठ्ठलार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥
Jai Jai Vitthala Bhagavan Karunamayamurte!,
Dhurtetarasakridupanatasarvepsitapurteh. ||
Shrutishastracharanadhikaradatimallina,
Jivastava Drishtasmritavanditapadanalinah. |
Te Sanjalina Duran'namitah Khalu Kalina,
Kalenapi Kavalitakhilajagata Balina. ||1||
Bhavatadhishthitamanasham Bhimarathitiram,
Vaikunthikritamiha No Ramayati Kam Dhiram. |
Jadamapi Kurushe Supatum Vachi Yatha Kiram,
Shirasi Bibharshi Ghritam Te Yena Charananiram. ||2||
Tvam Meghamiva Mayura Drishtva Tava Bhrityah,
Premashruplutanayana Bhrishavismritakrityah. |
Vyaktam Mankha Bhavanti Pramudadritakritya,
Muktirvrinute Tanurugaya! Manovrittya. ||3||
॥ Iti Shriramanandanamayureshvarakritam Shri Vitthalartikyam Sampurnam ॥
Dhurtetarasakridupanatasarvepsitapurteh. ||
Shrutishastracharanadhikaradatimallina,
Jivastava Drishtasmritavanditapadanalinah. |
Te Sanjalina Duran'namitah Khalu Kalina,
Kalenapi Kavalitakhilajagata Balina. ||1||
Bhavatadhishthitamanasham Bhimarathitiram,
Vaikunthikritamiha No Ramayati Kam Dhiram. |
Jadamapi Kurushe Supatum Vachi Yatha Kiram,
Shirasi Bibharshi Ghritam Te Yena Charananiram. ||2||
Tvam Meghamiva Mayura Drishtva Tava Bhrityah,
Premashruplutanayana Bhrishavismritakrityah. |
Vyaktam Mankha Bhavanti Pramudadritakritya,
Muktirvrinute Tanurugaya! Manovrittya. ||3||
॥ Iti Shriramanandanamayureshvarakritam Shri Vitthalartikyam Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"जय जय विठ्ठल भगवन्" (Jai Jai Vitthala Bhagavan) यह सुंदर संस्कृत आरती श्री रामनन्दन मयूरेश्वर (Shri Ramanandana Mayureshwara) द्वारा रचित है. इसमें पंढरपुर के आराध्य देव, भगवान विठ्ठल (Lord Vitthala) की करुणा और उनके धाम की महिमा का वर्णन किया गया है. जहाँ एक ओर मराठी आरतियां लोकभाषा में विठ्ठल की स्तुति करती हैं, वहीं यह स्तोत्र संस्कृत की क्लिष्ट और मधुर शब्दावली में भगवान के "करुणामयमूर्ति" स्वरूप को नमन करता है. यह उन भक्तों के लिए विशेष है जो संस्कृत के माध्यम से अपनी भक्ति अर्पित करना चाहते हैं.
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती भगवान विठ्ठल के पतित-पावन स्वरूप और पंढरपुर क्षेत्र की दिव्यता को उजागर करती है:
- करुणा और इच्छा पूर्ति (Compassion and Fulfillment): "करुणामयमूर्ते... सर्वेप्सितपूर्तेः" - भगवान विठ्ठल साक्षात करुणा की मूर्ति हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हैं.
- पतितों का उद्धार (Salvation of the Fallen): "अतिमलिना... दूरा नमिता" - जो जीव कलयुग के प्रभाव से मलिन हो गए हैं और वेदों/शास्त्रों के अधिकार से वंचित हैं, वे भी केवल भगवान के चरणों का स्मरण कर पवित्र हो जाते हैं.
- भीमा नदी का तट (Banks of Bhima River): "भवताधिष्ठितमानशं भीमरथीतीरं" - आरती में भीमा नदी (चंद्रभागा) के तट का सुंदर वर्णन है, जिसे भगवान ने अपने निवास से बैकुंठ बना दिया है.
- जड़ को चेतन करना (Enlivening the Dull): "जडमपि कुरुषे सुपटुं वाचि यथा कीरं" - भगवान की कृपा से मूक (गूंगा) या जड़ बुद्धि वाला व्यक्ति भी तोते (कीर) की तरह मधुर वाणी बोलने में सक्षम हो जाता है.
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- एकादशी (Ekadashi): आषाढी और कार्तिकी एकादशी पर इस संस्कृत स्तोत्र का पाठ अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है.
- वारी और कीर्तन (Wari and Kirtan): यद्यपि वारकरी संप्रदाय में मराठी अभंग अधिक प्रचलित हैं, फिर भी विद्वान और संस्कृत प्रेमी कीर्तन के दौरान इस स्तोत्र का गायन करते हैं.
- चरणोदक (Charanamrita): आरती में भगवान के चरणोदक (चरणामृत) का महत्व बताया गया है ("शिरसि बिभर्षि घृतं ते येन चरणनीरम्"), जिसे मस्तक पर धारण करने से पापों का नाश होता है.
