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श्रीकृष्णार्तिक्यम्

Shri Krishna Artikyam | Jai Bhagavan Chakragada

श्रीकृष्णार्तिक्यम्
जय भगवन् चक्रगदाशङ्खाम्बुजपाणे
कुरु मयि दृष्टिं सकृपामसति यथा बाणे॥

मुचुकुन्देन यवनमिव दह गुरुणा मोहं।
स्पर्शमणिर्न सुवर्णं कुरुते किमु लोहं॥
पतितोऽजामिल इव गजपतिरिव विकलोऽहं।
प्रभुरसि वेत्सि च दातुं वरसुखसन्दोहं॥१॥

अघमिव मामपि दुरितात्कुरुषे यदि मुक्तं।
भवतो नवतोयदमदहरकान्ते युक्तं॥
पालय न मे प्रणश्यति भक्त इति यदुक्तं।
स्मर तस्कलुषनगभिदुर विदुरगृहे भुक्तम्॥२॥

मायामूढेऽत्र जने दृष्ट्वालं दोषं।
मातुर्न मनस्तोके दृष्टं कृतरोषं॥
ब्रह्मण्योऽसि विधेहि त्वं ब्राह्मणपोषं।
वितर मयूरे भक्ते करुणाघन तोषम्॥३॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं श्रीकृष्णार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीकृष्णार्तिक्यम्" श्रीरामनन्दन मयूरेश्वर द्वारा रचित भगवान श्री कृष्ण की एक अत्यंत भावपूर्ण संस्कृत स्तुति है। इसमें भक्त भगवान से अपनी रक्षा और मोह-नाश की प्रार्थना करता है।

आरती के मुख्य भाव

  • मोह नाश (Destruction of Delusion): "मुचुकुन्देन यवनमिव दह गुरुणा मोहं" - जैसे मुचुकुन्द ने कालयवन को भस्म किया था, वैसे ही भक्त भगवान से अपने अज्ञान और मोह को नष्ट करने की प्रार्थना करता है।
  • शरणागति (Surrender): "पतितोऽजामिल इव" - भक्त स्वयं को अजामिल और गजराज की तरह पतित और व्याकुल मानकर भगवान की शरण में आता है।
  • स्पर्शमणि (Touchstone): "स्पर्शमणिर्न सुवर्णं कुरुते किमु लोहं" - क्या पारस पत्थर लोहे को सोना नहीं बना देता? अर्थात, भगवान के स्पर्श मात्र से पापी भी पवित्र हो जाते हैं।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह स्तोत्र जन्माष्टमी, एकादशी और प्रतिदिन की पूजा में भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्ति के लिए गाया जाता है।
  • विधि (Method): भगवान कृष्ण के विग्रह के समक्ष तुलसी दल अर्पित कर, अत्यंत दीन भाव से इस आर्तिक्यम् का पाठ करें।
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