आरति श्रीभगवद्गीताकी।
वासुदेव-श्रीमुखकी बानी,
आध्यात्मिक कृतियनकी रानी,
विजय-विभूति-मुक्तिकी दानी,
मुद-मंगलमय सुपुनीताकी॥
महाभारतमें पार्थ प्रबोधित,
समराङ्गणमें सुर-नर-मुनि सभीसों वंदित,
पाप-पुण्य-कुञ्जर-चीताकी॥
मर्म त्यागको सत्य सुझावनि,
दुरित द्वैत दुख दूरि नसावनि,
अद्वैतामृत-धार बहावनि,
भव-दस्कन्ध सती सीताकी॥
उपनिषदनको सार सुहावन,
अनासक्त शुभ काज करावन,
मन-वच-कर्म संत-मन-भावन,
भक्ति-ज्ञान-जुग-जग-जीताकी॥
रवि-कर भ्रम-तम-तोम-निवारिणि,
विमल-विवेक विश्व-विस्तारिणि,
सुमति-सुधर्म-सुराज्य प्रचारिणि,
'दामोदर' अनुपम गीताकी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
वासुदेव-श्रीमुखकी बानी,
आध्यात्मिक कृतियनकी रानी,
विजय-विभूति-मुक्तिकी दानी,
मुद-मंगलमय सुपुनीताकी॥
महाभारतमें पार्थ प्रबोधित,
समराङ्गणमें सुर-नर-मुनि सभीसों वंदित,
पाप-पुण्य-कुञ्जर-चीताकी॥
मर्म त्यागको सत्य सुझावनि,
दुरित द्वैत दुख दूरि नसावनि,
अद्वैतामृत-धार बहावनि,
भव-दस्कन्ध सती सीताकी॥
उपनिषदनको सार सुहावन,
अनासक्त शुभ काज करावन,
मन-वच-कर्म संत-मन-भावन,
भक्ति-ज्ञान-जुग-जग-जीताकी॥
रवि-कर भ्रम-तम-तोम-निवारिणि,
विमल-विवेक विश्व-विस्तारिणि,
सुमति-सुधर्म-सुराज्य प्रचारिणि,
'दामोदर' अनुपम गीताकी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Aarti Shree Bhagavad Gita Ki.
Vasudev-Shrimukh Ki Bani,
Adhyatmik Kritiyan Ki Rani,
Vijay-Vibhuti-Mukti Ki Dani,
Mud-Mangalmay Supunita Ki. ||
Mahabharat Mein Partha Prabodhit,
Samarangana Mein Sur-Nar-Muni Sabhison Vandit,
Paap-Punya-Kunjar-Chita Ki. ||
Marma Tyag Ko Satya Sujhavani,
Durit Dvaita Dukh Duri Nasavani,
Advaitamrit-Dhara Bahavani,
Bhav-Daskandh Sati Sita Ki. ||
Upnishdan Ko Sar Suhavan,
Anasakt Shubh Kaj Karavan,
Man-Vach-Karm Sant-Man-Bhavan,
Bhakti-Gyan-Jug-Jag-Jita Ki. ||
Ravi-Kar Bhram-Tam-Tom-Nivarini,
Vimal-Vivek Vishva-Vistarini,
Sumati-Sudharma-Surajya Pracharini,
'Damodar' Anupam Gita Ki. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
Vasudev-Shrimukh Ki Bani,
Adhyatmik Kritiyan Ki Rani,
Vijay-Vibhuti-Mukti Ki Dani,
Mud-Mangalmay Supunita Ki. ||
Mahabharat Mein Partha Prabodhit,
Samarangana Mein Sur-Nar-Muni Sabhison Vandit,
Paap-Punya-Kunjar-Chita Ki. ||
Marma Tyag Ko Satya Sujhavani,
Durit Dvaita Dukh Duri Nasavani,
Advaitamrit-Dhara Bahavani,
Bhav-Daskandh Sati Sita Ki. ||
Upnishdan Ko Sar Suhavan,
Anasakt Shubh Kaj Karavan,
Man-Vach-Karm Sant-Man-Bhavan,
Bhakti-Gyan-Jug-Jag-Jita Ki. ||
Ravi-Kar Bhram-Tam-Tom-Nivarini,
Vimal-Vivek Vishva-Vistarini,
Sumati-Sudharma-Surajya Pracharini,
'Damodar' Anupam Gita Ki. ||
॥ Iti Sampurnam ॥
आरती का महत्त्व
"आरति श्रीभगवद्गीताकी" श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा का गुणगान करने वाली एक दिव्य आरती है। गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली साक्षात वाणी है। यह आरती गीता के ज्ञान, कर्म और भक्ति के संदेश को नमन करती है और जीवन में धर्म और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
आरती के मुख्य भाव
- वासुदेव-श्रीमुख की वाणी (Word of God): "वासुदेव-श्रीमुखकी बानी" - गीता भगवान वासुदेव (कृष्ण) के श्रीमुख से उच्चारित अमृत वाणी है।
- उपनिषदों का सार (Essence of Upanishads): "उपनिषदनको सार सुहावन" - गीता सभी उपनिषदों का सुंदर और सुलभ सार है।
- मुक्ति की दात्री (Giver of Liberation): "विजय-विभूति-मुक्तिकी दानी" - गीता का पाठ विजय, ऐश्वर्य और मोक्ष प्रदान करने वाला है।
गायन विधि और अवसर
- अवसर (Occasion): यह आरती गीता जयंती, एकादशी, और गीता पाठ के समापन पर गाई जाती है।
- विधि (Method): गीता ग्रंथ को व्यासपीठ पर स्थापित कर, पुष्प और धूप अर्पित करते हुए, श्रद्धापूर्वक यह आरती गाएं।
