जमदग्नीकुळभूषण मुक्ता फळदशना।
अतिसज्जन मनमोहनरजनीकरवदना॥
अगणित महिमा तुझा न कळे सुरगणा।
वदतो कंठी वाणी सरसीरुहनयना॥१॥
जय राम श्रीराम जय भार्गवरामा।
नीरांजन करूं तुजला परिपूर्णकामा॥
सह्याद्रिगिरिशिखरीं शर घेऊनी येसी।
सोडुनी शर पळवीसी पश्चिमजलधीसी॥
तुजसम रणधीर जगी न पडे दृष्टीसी।
प्रताप थोर तुझा न कळे कवणासी॥२॥
तव कोप बहु पापी बा संहारी।
दानव दहन करोनी वससी गिरिशिखरी॥
क्षत्रिय मारूनि अवनी केली निर्वैरी।
सात्विक राजस तामस त्रिगुणां उद्धरी॥३॥
दृढ भावे तव वंदन करिती जे चरणी।
त्यांचे भवभय नाही जंववरि शशितरणी॥
शर मारुनी उद्भवली गंगा जनतरणी।
चिंतामणि शरणागत निश्चल तव चरणी॥४॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
अतिसज्जन मनमोहनरजनीकरवदना॥
अगणित महिमा तुझा न कळे सुरगणा।
वदतो कंठी वाणी सरसीरुहनयना॥१॥
जय राम श्रीराम जय भार्गवरामा।
नीरांजन करूं तुजला परिपूर्णकामा॥
सह्याद्रिगिरिशिखरीं शर घेऊनी येसी।
सोडुनी शर पळवीसी पश्चिमजलधीसी॥
तुजसम रणधीर जगी न पडे दृष्टीसी।
प्रताप थोर तुझा न कळे कवणासी॥२॥
तव कोप बहु पापी बा संहारी।
दानव दहन करोनी वससी गिरिशिखरी॥
क्षत्रिय मारूनि अवनी केली निर्वैरी।
सात्विक राजस तामस त्रिगुणां उद्धरी॥३॥
दृढ भावे तव वंदन करिती जे चरणी।
त्यांचे भवभय नाही जंववरि शशितरणी॥
शर मारुनी उद्भवली गंगा जनतरणी।
चिंतामणि शरणागत निश्चल तव चरणी॥४॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Jamadagnikulabhushan mukta phaladashana,
Atisajjan manamohanarajanikaravadana. ||
Aganit mahima tujha na kale suragana,
Vadato kanthi vani sarasiruhanayana. ||1||
Jai Ram Shriram Jai Bhargavarama,
Niranjan karun tujala paripurnakama. ||
Sahyadrigirishikharin shar gheuni yesi,
Soduni shar palavisi pashchimajaladhisi. ||
Tujasam ranadhir jagi na pade drishtisi,
Pratap thor tujha na kale kavanasi. ||2||
Tav kop bahu paapi ba sanhari,
Danav dahan karoni vasasi girishikari. ||
Kshatriya maruni avani keli nirvairi,
Satvik rajas tamas trigunan uddhari. ||3||
Drudh bhave tav vandan kariti je charani,
Tyanche bhavabhay nahi janvavari shashitarani. ||
Shar maruni udbhavali ganga janatarani,
Chintamani sharanagat nishchal tav charani. ||4||
॥ Iti Sampurnam ॥
Atisajjan manamohanarajanikaravadana. ||
Aganit mahima tujha na kale suragana,
Vadato kanthi vani sarasiruhanayana. ||1||
Jai Ram Shriram Jai Bhargavarama,
Niranjan karun tujala paripurnakama. ||
Sahyadrigirishikharin shar gheuni yesi,
Soduni shar palavisi pashchimajaladhisi. ||
Tujasam ranadhir jagi na pade drishtisi,
Pratap thor tujha na kale kavanasi. ||2||
Tav kop bahu paapi ba sanhari,
Danav dahan karoni vasasi girishikari. ||
Kshatriya maruni avani keli nirvairi,
Satvik rajas tamas trigunan uddhari. ||3||
Drudh bhave tav vandan kariti je charani,
Tyanche bhavabhay nahi janvavari shashitarani. ||
Shar maruni udbhavali ganga janatarani,
Chintamani sharanagat nishchal tav charani. ||4||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"जमदग्नीकुळभूषण" यह आरती भगवान विष्णु के छठे अवतार (Avatar) भगवान परशुराम को समर्पित है। वे चिरंजीवी (Immortal) हैं और उन्हें कोंकण (Konkan) भूमि का निर्माता माना जाता है। महाराष्ट्र के चिपळूण (Chiplun) में उनका प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे 'परशुराम क्षेत्र' कहा जाता है। यह आरती उनके शौर्य, तप और धर्म रक्षा के संकल्प का गुणगान करती है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
- शत्रु नाश (Destruction of Enemies): भगवान परशुराम ने पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त किया था। उनकी आरती का गायन भक्तों को साहस और पराक्रम (Courage and Valor) प्रदान करता है और शत्रुओं पर विजय दिलाता है।
- धर्म की रक्षा (Protection of Dharma): यह आरती अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना का प्रतीक है। यह भक्तों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
- पाप मुक्ति (Liberation from Sins): "तव कोप बहु पापी बा संहारी" - उनके स्मरण मात्र से पापों का नाश होता है और भक्त को मोक्ष (Salvation) की प्राप्ति होती है।
पौराणिक संदर्भ (Mythological Context)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने समुद्र को अपने फरसे (परशु) से पीछे धकेल कर कोंकण भूमि (Land of Konkan) का निर्माण किया था। इसलिए कोंकण को 'परशुराम भूमि' भी कहा जाता है। वे आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या में लीन माने जाते हैं।
आरती/पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
- विशेष अवसर (Special Occasions): यह आरती विशेष रूप से अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya), जो परशुराम जयंती भी है, के दिन गाई जाती है।
- विधि (Method): प्रातः काल स्नान के बाद भगवान परशुराम की मूर्ति या चित्र के सामने धूप-दीप जलाकर पूर्ण भक्ति भाव से इस आरती का गायन करें।
