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श्री परशुरामाष्टकम्

श्री परशुरामाष्टकम्
॥ अथ श्री परशुरामाष्टकम् ॥

शुभ्रदेहं सदा क्रोधरक्तेक्षणम्
भक्तपालं कृपालुं कृपावारिधिम्
विप्रवंशावतंसं धनुर्धारिणम्
भव्ययज्ञोपवीतं कलाकारिणम्
यस्य हस्ते कुठारं महातीक्ष्णकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥1॥
सौम्यरुपं मनोज्ञं सुरैर्वन्दितम्
जन्मतः ब्रह्मचारिव्रते सुस्थिरम्
पूर्णतेजस्विनं योगयोगीश्वरम्
पापसन्तापरोगादिसंहारिणम्
दिव्यभव्यात्मकं शत्रुसंहारकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥2॥
ऋद्धिसिद्धिप्रदाता विधाता भुवो
ज्ञानविज्ञानदाता प्रदाता सुखम्
विश्वधाता सुत्राताऽखिलं विष्टपम्
तत्त्वज्ञाता सदा पातु माम् निर्बलम्
पूज्यमानं निशानाथभासं विभुम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥3॥
दुःख दारिद्र्यदावाग्नये तोयदम्
बुद्धिजाड्यं विनाशाय चैतन्यदम्
वित्तमैश्वर्यदानाय वित्तेश्वरम्
सर्वशक्तिप्रदानाय लक्ष्मीपतिम्
मङ्गलं ज्ञानगम्यं जगत्पालकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥4॥
यश्च हन्ता सहस्रार्जुनं हैहयम्
त्रैगुणं सप्तकृत्वा महाक्रोधनैः
दुष्टशून्या धरा येन सत्यं कृता
दिव्यदेहं दयादानदेवं भजे
घोररूपं महातेजसं वीरकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥5॥
मारयित्वा महादुष्ट भूपालकान्
येन शोणेन कुण्डेकृतं तर्पणम्
येन शोणीकृता शोणनाम्नी नदी
स्वस्य देशस्य मूढा हताः द्रोहिणः
स्वस्य राष्ट्रस्य शुद्धिःकृता शोभना
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥6॥
दीनत्राता प्रभो पाहि माम् पालक!
रक्ष संसाररक्षाविधौ दक्षक!
देहि संमोहनी भाविनी पावनी
स्वीय पादारविन्दस्य सेवा परा
पूर्णमारुण्यरूपं परं मञ्जुलम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥7॥
ये जयोद्घोषकाः पादसम्पूजकाः
सत्वरं वाञ्छितं ते लभन्ते नराः
देहगेहादिसौख्यं परं प्राप्य वै
दिव्यलोकं तथान्ते प्रियं यान्ति ते
भक्तसंरक्षकं विश्वसम्पालकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥8॥

॥ इति श्रीपरशुरामाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्री परशुरामाष्टकम् (Shri Parashuramashtakam) भगवान विष्णु के छठे आवेश अवतार, भगवान परशुराम (Lord Parashurama) को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। 'परशुराम' का अर्थ है 'परशु' (कुल्हाड़ी) धारण करने वाले राम। वे ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र हैं, इसलिए उन्हें 'जामदग्न्य' और 'रेणुकानंदन' भी कहा जाता है। यह अष्टकम् उनके दोहरे स्वरूप का अद्भुत वर्णन करता है - एक ओर वे ब्राह्मण कुल में जन्मे परम ज्ञानी, योगी और भक्तवत्सल हैं, तो दूसरी ओर वे क्षत्रियों के अहंकार का मर्दन करने वाले महाक्रोधी, वीर और शत्रुसंहारक हैं। प्रत्येक श्लोक का अंत "रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे" (मैं रेणुका के पुत्र, जमदग्नि के वंशज का भजन करता हूँ) से होता है, जो उनके कुल और माता-पिता के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

इस स्तोत्र की फलश्रुति और श्लोकों में वर्णित गुणों के आधार पर, इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of All Desires): आठवें श्लोक में कहा गया है कि जो भक्त उनके चरणों की पूजा और जय-उद्घोष करते हैं, वे शीघ्र ही अपनी सभी इच्छित वस्तुएं (desired things) प्राप्त करते हैं ("सत्वरं वाञ्छितं ते लभन्ते नराः")।

  • ऋद्धि-सिद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति (Attainment of Wealth, Success, and Powers): भगवान परशुराम को "ऋद्धिसिद्धिप्रदाता", "वित्तमैश्वर्यदानाय वित्तेश्वरम्" (धन और ऐश्वर्य देने के लिए कुबेर-स्वरूप) कहा गया है। उनकी उपासना से जीवन में समृद्धि (prosperity) और सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

  • शत्रुओं पर विजय और सुरक्षा (Victory over Enemies and Protection): उन्हें "शत्रुसंहारकम्" कहा गया है, जिन्होंने सहस्त्रार्जुन जैसे अहंकारी राजा का वध किया और इक्कीस बार पृथ्वी को दुष्ट क्षत्रियों से विहीन किया। उनका स्मरण करने से साधक को शत्रुओं पर विजय और सुरक्षा (protection) प्राप्त होती है।

  • ज्ञान, विज्ञान और बुद्धि का विकास (Development of Knowledge, Wisdom, and Intellect): वे "ज्ञानविज्ञानदाता" और "बुद्धिजाड्यं विनाशाय चैतन्यदम्" (बुद्धि की जड़ता का नाश कर चेतना देने वाले) हैं। विद्यार्थियों और ज्ञान के उपासकों के लिए उनकी पूजा बौद्धिक विकास (intellectual development) में सहायक है।

  • दुःख और दरिद्रता का नाश (Destruction of Sorrow and Poverty): स्तोत्र में उन्हें "दुःख दारिद्र्यदावाग्नये तोयदम्" (दुःख और दरिद्रता की अग्नि के लिए बादल के समान) कहा गया है। उनकी कृपा से जीवन के सभी कष्ट और आर्थिक संकट (hardships and financial troubles) दूर होते हैं।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए शुक्रवार का दिन (देवी रेणुका का दिन) और तृतीया तिथि विशेष रूप से शुभ हैं।

  • अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya), जो भगवान परशुराम का प्राकट्य दिवस है, पर इस अष्टकम् का पाठ करना अत्यंत पुण्यदायी और शीघ्र फलदायी होता है।

  • किसी भी प्रकार के शत्रु भय, कानूनी विवाद या अन्याय का सामना करते समय इस स्तोत्र का पाठ करने से साहस और विजय की प्राप्ति होती है।

  • प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद, भगवान परशुराम के चित्र (जिसमें वे शांत या क्रोधित, किसी भी भाव में हों) के समक्ष बैठकर इसका पाठ करना चाहिए।