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श्रीस्थलदेवीआरतिक्यम् (यत्कर्म धर्म-निलयं)

Sthala Devi Artikyam

श्रीस्थलदेवीआरतिक्यम् (यत्कर्म धर्म-निलयं)
यत्कर्म-धर्म-निलयं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः, यज्ञादि पुण्यमखिलं सकलं त्वयैव।
त्वं चेतना यत इति प्रविचार्य चित्ते, नित्यं त्वदीय चरणौ शरणं प्रपद्ये॥१॥

पाथोऽधिनाथ तनया पतिरेष शेष, पर्यङ्क लालित वपुः पुरुषः पुराणः।
त्वन्मोह-पाश-विवशो जगदम्बसोऽपि, व्याघूर्णमाननयनः शयनं चकार॥२॥

तत कौतुकं जननि यस्य जनार्दनस्य, कर्णप्रसूतमलजौ मधु-कैटभाख्यौ।
तस्यापि यौ न भवतः सुलभौ निहन्तुं, त्वन्मायया कविलतौ विलयं गतौ तौ॥३॥

यन्माहिषं वपुरपूर्वबलोपपन्नं, यन्नाक नायक पराक्रम जित्वरं च।
यत्लोकशोकजननब्रतबद्ध-हार्द, तल्लीलयैव दलितं गिरिजे भवत्या॥४॥

यो धूम्रलोचन इति प्रथितः पृथिव्यां, भस्मी बभूव स रणे तव हुङ्कृतेन।
सर्वासुरक्षयकरे गिरिराजकन्ये मन्ये, स्वमन्यु दहने कृत एष होमः॥५॥

केषामपि त्रिदशनायक पूर्वकाणां, हन्तुं न जातु सुलभाविति चण्डमुण्डौ।
तौ दुर्मदौ सपदि चाम्बर तुल्यमूर्ते, मतिस्तवासिकुलिशात् पतितौ विशीर्णो॥६॥

दौत्येन ते शिव इति प्रथितप्रभावो, देवोऽपि दानवपतेः सदनं जगाम।
भूयोऽपि तस्य चरितं प्रथयाञ्चकार, सा त्वं प्रसीद शिवदूति विजृम्भितेन॥७॥

चित्रं तदेतदमरैरपि ये न जेयाः, शस्त्राभिघात-पतितागधिरादपर्णे।
भूमौ बभूवुरमिताः प्रतिरक्तबीजा, स्तेऽपित्वयैव गगने गलिताः समस्ताः॥८॥

आश्चर्यमेतदतुलं यद्भूत् सुरारी, त्रैलोक्यवैभवविलुण्ठनहष्टपाणी।
शस्त्रैर्निहत्य भुवि शुम्भ-निशुम्भसंज्ञौ, नीतौ त्वया जननि तावपि नाकलोकम्॥९॥

त्वत्तेजसि प्रलयकाल हुताशनेऽस्मिं-, स्तस्मिन् प्रयान्ति विलयं भुवनानि सद्यः।
तस्मिन्निपत्य शलभा इव दानवेन्द्रा, भस्मी भवन्ति हि भवानि किमत्र चित्रम्॥१०॥

तत्किं गृणामि भवतीं भव तीव्रताप, निर्वापण-प्रणयनीं प्रणमञ्जनेषु।
तत्किं गृणामि भवन्ती भव तीव्र ताप, संवर्द्धन-प्रणयनीं विपदि स्थितेषु॥११॥

वामे करे तदितरे च तथोपरिष्ठान्, पात्रं सुधारसयुतं वरमातुलुङ्गम्।
खेटं गदां च दधतीं भवतीं भवानि, ध्यायन्ति येऽरुणनिभां कृतिनस्त एव॥१२॥

यद्वारुणात् परमिदं यदि मानवास्ते, बीजं स्मरेदनुदिनं दहनाधिरूढम्।
मायाङ्कितं तिलकितं तरुणेन्दु बिन्दु-, र्नादैरमन्दमिह राज्यमसौ भुनक्ति॥१३॥

कर्मार्पणं तव विसर्जनमत्र देवि, मोहान्मया कृतमिदं सकलापराधं।
मातः क्षमस्व वरदे बहिरन्तरस्थे॥१४॥

अन्तः स्थिताप्यखिल जन्तुषु जन्तुरूपा, विद्योतसे बहिरिवाखिल विश्वरूपा।
का भूरिशब्दरचना वचनाधिका सा, दीनं जनं जननि मामव निष्प्रपञ्चम्॥१५॥

एतत्पठेदनुदिनं दनुजान्तकारि, चण्डीचरितमतुलं भुवि यस्त्रिकालम्।
श्रीमान् सुखी स विजयी सुभगः कृती स्यात्, त्यागी चिरन्तनवपुः कवि चक्रवर्ती॥१६॥

इस आर्तिक्यम् का विशिष्ट महत्व

श्रीस्थलदेवीआरतिक्यम् जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ (Kishtwar) क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध सारथल देवी (Sarthal Devi) मंदिर को समर्पित एक गहन और शक्तिशाली स्तोत्र है। 'स्थल देवी' उस स्थान की अधिष्ठात्री देवी को संदर्भित करता है, और यह स्तोत्र अष्टादशभुजा महालक्ष्मी (Ashtadashbhuja Mahalakshmi) के उग्र और करुणामय स्वरूप की वंदना है। यह केवल एक आरती नहीं, बल्कि सम्पूर्ण देवी माहात्म्य (Devi Mahatmyam) का सार है, जिसमें माँ दुर्गा द्वारा मधु-कैटभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, चंड-मुंड, रक्तबीज और शुम्भ-निशुम्भ जैसे असुरों के संहार का काव्यात्मक वर्णन है। यह स्तोत्र देवी की सर्वोच्च शक्ति और उनकी अपराजेय प्रकृति का उत्सव है।

स्तोत्र के विस्तृत लाभ (फलश्रुति)

इस आर्तिक्यम् के अंतिम (16वें) श्लोक में इसकी फलश्रुति का स्पष्ट उल्लेख है, जो इसके पाठ के अतुलनीय लाभों को बताता है:

  • विजय और सफलता (Victory and Success): "स विजयी... स्यात्" - जो व्यक्ति इस अतुलनीय 'चण्डीचरित' का प्रतिदिन तीनों समय (त्रिकाल) पाठ करता है, वह जीवन के हर क्षेत्र में विजयी (victorious) होता है। उसे शत्रुओं पर विजय और कार्यों में सफलता (success) प्राप्त होती है।
  • धन और सुख (Wealth and Happiness): "श्रीमान् सुखी..." - पाठक श्रीमान (prosperous) बनता है, अर्थात उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं रहती। साथ ही, वह एक सुखी (happy) और संतुष्ट जीवन व्यतीत करता है।
  • सौभाग्य और सम्मान (Good Fortune and Respect): "सुभगः कृती..." - वह व्यक्ति सुभग (fortunate) होता है, अर्थात भाग्य हमेशा उसका साथ देता है, और वह समाज में कृती (respected and accomplished) कहलाता है, अर्थात एक सम्मानित और कुशल व्यक्ति बनता है।
  • ज्ञान और प्रसिद्धि (Knowledge and Fame): "त्यागी चिरन्तनवपुः कवि चक्रवर्ती" - अंततः, वह एक महान कवि (poet) और चक्रवर्ती (emperor or master) के समान ज्ञानी और प्रसिद्ध होता है। उसका शरीर 'चिरन्तन' अर्थात दिव्य हो जाता है और वह सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर एक 'त्यागी' का जीवन जीता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ नवरात्रि (Navratri) के नौ दिनों में करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
  • फलश्रुति के अनुसार सर्वोत्तम परिणाम के लिए, इसका पाठ दिन में तीन बार - प्रातः, मध्याह्न और संध्याकाल में करना चाहिए।
  • पाठ करने से पहले, देवी की प्रतिमा या चित्र के सामने एक लाल बत्ती का दीपक (red wick lamp), हो सके तो घी का, जलाना चाहिए।
  • यह स्तोत्र शत्रुओं से सुरक्षा (protection from enemies), कानूनी मामलों में जीत और सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति के लिए एक अचूक उपाय माना जाता है।
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