Logoपवित्र ग्रंथ

दुर्गा आरती (दुर्गे दुर्घटभारी)

Durga Aarti (Marathi)

दुर्गा आरती (दुर्गे दुर्घटभारी)
दुर्गे दुर्घटभारी तुजवीण संसारी।
अनाथनाथे अंबे करुणा विस्तारी॥
वारी वारीं जन्ममरणातें वारी।
हारी पडलों आतां संकट निवारी॥१॥

जय देवी जय देवी जय महिषासुरमथनी।
सुरवरईश्वरवरदे तारक संजीवनी॥

त्रिभुवनभुवनीं पाहतां तुजऐसें नाहीं।
चारी श्रमले परंतु न बोलवे कांहीं॥
साही विवाद करितां पडिलें प्रवाही।
ते तूं भक्तालागीं पावसि लवलाही॥२॥

प्रसन्नवदने प्रसन्न होसी निजदासां।
क्लेशांपासुनि सोडविसी तोडविसी भवपाशा॥
अंबे तुजवांचून कोण पुरविल आशा।
नरहरि तल्लिन झाला पदपंकजलेशा॥३॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"दुर्गे दुर्घटभारी" महाराष्ट्र के सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली आरतियों में से एक है, जो माँ दुर्गा (Maa Durga) को समर्पित है। इस आरती की रचना 17वीं सदी के महान संत और छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु, समर्थ रामदास स्वामी (Samarth Ramdas Swami) ने की थी। 'दुर्गे दुर्घटभारी' का अर्थ है 'हे दुर्गा, तुम संसार के सबसे भारी और कठिन संकटों को भी हरने वाली हो'। यह आरती एक भक्त की अपनी माँ से की गई करुण पुकार है, जिसमें वह संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की प्रार्थना करता है। यह आरती देवी के महिषासुरमर्दिनी रूप का भी जयगान करती है, जिन्होंने महिषासुर का वध कर देवताओं को संकट से उबारा था।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती माँ दुर्गा के प्रति भक्त के गहरे विश्वास और समर्पण को दर्शाती है:

  • संकटों से मुक्ति (Freedom from Calamities): "दुर्गे दुर्घटभारी तुजवीण संसारी। अनाथनाथे अंबे करुणा विस्तारी॥" - हे दुर्गा माँ, आपके बिना इस संसार में भारी संकट हैं। हे अनाथों की नाथ, अपनी करुणा का विस्तार करो।
  • जन्म-मरण से छुटकारा (Liberation from the Cycle of Birth and Death): "वारी वारीं जन्ममरणातें वारी। हारी पडलों आतां संकट निवारी॥" - माँ, मेरे बार-बार होने वाले जन्म-मरण के चक्र को दूर करो। मैं अब हार गया हूँ, मेरे संकट का निवारण करो।
  • सर्वोच्च शक्ति (The Supreme Power): "त्रिभुवनभुवनीं पाहतां तुजऐसें नाहीं।" - तीनों लोकों में खोजने पर भी आपके समान कोई दूसरा नहीं है। यह उनकी अद्वितीय शक्ति और महिमा को दर्शाता है।
  • शीघ्र प्रसन्न होने वाली (Quickly Pleased): "प्रसन्नवदने प्रसन्न होसी निजदासां। क्लेशांपासुनि सोडविसी तोडविसी भवपाशा॥" - आप अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होती हैं और उन्हें सभी क्लेशों और सांसारिक बंधनों (worldly bonds) से मुक्त करती हैं।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से नवरात्रि (Navratri) के नौ दिनों में, विशेषकर दुर्गाष्टमी के दिन, घर-घर में गाई जाती है।
  • मंगलवार (Tuesday) और शुक्रवार (Friday) को भी देवी की पूजा के अंत में इस आरती का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • माँ दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं, उन्हें लाल पुष्प और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।
  • इस आरती को पूरे भक्ति-भाव और ऊँचे स्वर में गाने से मन में साहस और शक्ति का संचार होता है तथा नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) का नाश होता है।
Back to aartis Collection