मन्त्रः साक्षात् षडरर्णो भवति शुभकरः शत्रुविध्वंसकारी।
एतन्मन्त्रं सदा यो जपति निजगुरोः पादपद्मं स्मरन् सन्,
पूज्यो भूत्वा सदैव प्रभवति स नरः श्रीयमोऽन्यो रिपूणाम्॥१॥
भोः शम्भो सौष्मकान्ते वकरमसहिताकारयुक्ताम्बुतीक्ष्णैः,
पञ्चार्णो मन्त्रराजो भवति शुभकरो मुक्तिदः शैवरूपः।
तारान्ते ये जपन्तो-ह तवमनुवरं शुद्धभावैः प्रशान्ताः,
ते ते सिद्धिं लभन्ते शिवरसमुदिता मुक्तरूपा मुनीन्द्राः॥२॥
श्रीमत्मासादयुग्मं कृतपुटितमहापञ्चतारैमहेश,
त्वन्मन्त्रं शाम्भवाख्यं स्मरति यदि जनोवारमेकं जितात्मा।
भूत्वा पृथ्व्यां स लक्ष्मी-पतिरपि च महाकालकालः कवीन्द्रः,
पश्चान्निर्वाण मुक्तिं सुरनुतलभते पुण्यपापैर्विमुक्तः॥३॥
शम्भो त्वां श्रीमहापाशुपतमनुवरं संस्मरन् बाणलिङ्गे,
सद्योजातादिवक्रार्चनमपि ललितापूजनं भालदेशे।
कुर्वञ्च्छीयन्त्रपूजां ममममहिलाभिर्नरो ब्रह्मरन्धे,
साक्षाद्योगीन्द्ररूपः प्रभवति शिवतां याति सत्यं पृथिव्याम्॥४॥
यस्त्वां ब्राह्मे मुहूर्ते यजति सह सदा क्षीररुद्राभिषेकैः,
सद्यः सन्तोष्यदेवं ग्रहभयहरणं जायते तस्य शर्व।
तैलाख्यैः शत्रुनाशं स्मरहदुरितध्वंशनं गोपयोभिः,
निर्वाणो मोक्षरूपः प्रभवति कुलजः कौलरुद्राभिषेकैः॥५॥
शिवं त्वां पञ्चास्यं त्रिनयनयुतं शुद्धधवलं,
चतुर्हस्तोपेतं सुपरशुमृगाभीतिवरदम्।
सदानन्दं व्याघ्राम्बरपरिदधानं स्मरहर,
स्मरन्ति श्रीशैवास्त्रिवसुदलपीठोपरिगतम्॥६॥
प्रदोषे भक्तोयो यजति तव पादाम्बुजयुगं,
सुपत्रैर्विल्वैर्वा कुशुमसलिलैर्वा त्रिषवणम्।
प्रशान्तो दिव्यो वार्चयति शिवरात्रौ पशुपते,
स एव ब्रह्मात्मा स हि भुवनसौख्यञ्चलभते॥७॥
निशायां श्रीचक्रं यजति शिवलिङ्गोपरिसदा,
तथा विन्दौ शैवं त्रिपुरहर निर्वाणपरमम्।
कुलद्रव्यैश्वाहङ्कृतिमयवलिं यः प्रकुरुते,
परो दिव्यः कौलो ब्रजति शिवतां भोः पशुपते॥८॥
व्रती मूलाधारोपरि रसदलं दिग्दलमथो,
परं हृत्पत्राख्यं परशिव महाषोडशदलम्।
त्रिवेण्यां हक्षाभ द्विदलकमलं ब्रह्ममदनं,
हठाभ्यां संयोगदलसति सुषुम्णाख्यपथतः॥९॥
सहस्रारेदीपाकृतिपरमलिङ्गं परशिवं,
सदा ध्यायन् दिव्यं समरसयुतं हंसगपरम्।
परान्तस्थं शुद्धं जपतियदिमन्त्रं कुलजन-,
स्तदा जीवन्मुक्तः परमपदलीनः प्रभवति॥१०॥
इदं स्तोत्रं सूक्ष्मं मनुवरसमुद्धारणजप-,
स्वरूपाख्यम्पूजा-परमशुभयोगादिसहितम्॥
मया भक्त्या शम्भो तव परशिवाख्यं विरचितं,
प्रसादार्थीतेऽहङ्गिरिश धनशंशेरमनुजः॥११॥
॥ इति श्रीशिवकर्पूरस्तोत्रम् ॥
Mantrah sakshat shadarno bhavati shubhakara shatruvidhvansakari.
Etanmantram sada yo japati nijaguroh padapadmam smaran san,
Pujyo bhutva sadaiva prभवति sa narah shriyamonyo ripunam. ||1||
Bhoh shambho saushmakante vakaramasahitakarayuktambutikshnaih,
Pancharno mantrarajo bhavati shubhakaro muktidah shaivarupah.
Tarante ye japanto-ha tavamanuvaram shuddhabhavaih prashantah,
Te te siddhim labhante shivarasamudita muktarupa munindrah. ||2||
Shrimatmasadayugmam kritaputitamahapanchatarairmahesha,
Tvanmantram shambhavakhyam smarati yadi janovaramekam jitatma.
Bhutva prithivyam sa lakshmi-patirapi cha mahakalakalah kavindrah,
Pashchannirvana muktim suranutalabhate punyapapairvimuktah. ||3||
Shambho tvam shrimahapashupatamanuvaram sansmaran banalinge,
Sadyojatadivakrarchanamapi lalitapujanam bhaladeshe.
Kurvanchchhriyantrapujam mamamamahilabhirnaro brahmarandhre,
Sakshadyogindrarupah prabhavati shivatam yati satyam prithivyam. ||4||
Yastvam brahme muhurte yajati saha sada kshirarudrabhishekah,
Sadyah santoshyadevam grahabhayaharanam jayate tasya sharva.
Tailakhyaih shatrunasham smarahaduritadhvanshanam gopayobhih,
Nirvano moksharupah prabhavati kulajah kaularudrabhishekah. ||5||
Shivam tvam panchasya trinayanayutam shuddhadhavalam,
Chaturhastopetam suparashumrigabhitivaradam.
Sadanandam vyaghrambaraparidhadhanam smarahara,
Smaranti shrishaivastrivasudalapithoparigatam. ||6||
Pradoshe bhaktoyo yajati tava padambujayugam,
Supatrairvilvairva kushumasalilairva trishavanam.
Prashanto divyo varchayati shivaratrau pashupate,
Sa eva brahmatma sa hi bhuvanasaukhyanchalabhate. ||7||
Nishayam shrichakram yajati shivalingoparisada,
Tatha vindau shaivam tripurahara nirvanaparamam.
Kuladravyaishvahankritimayavalim yah prakurute,
Paro divyah kaulo vrajati shivatam bhoh pashupate. ||8||
Vrati muladharopari rasadalam digdalamatho,
Param hritpatrakhyam parashiva mahashodashadalam.
Trivenyam hakshabha dvidalakamalam brahmamadanam,
Hathabhyam samyogadalasati sushumnakhyapathatah. ||9||
Sahasraredipakritiparamalingam parashivam,
Sada dhyayan divyam samarasayutam hansagaparam.
Parantastham shuddham japatiyadimantram kulajana-,
Stada jivanmuktah paramapadalinah prabhavati. ||10||
Idam stotram sukshmam manuvarasamuddharanajapa-,
Svarupakhyampuja-paramashubhayogadishitam. ||
Maya bhaktya shambho tava parashivakhyam virachitam,
Prasadarthite'hangirisha dhanashamsheramanujah. ||11||
॥ Iti Shri Shiva Karpurastotram ॥
इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
"श्री शिवकर्पूरस्तोत्रम्" भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह सामान्य भक्ति स्तोत्रों से भिन्न है, क्योंकि यह मुख्य रूप से मंत्र शास्त्र, तंत्र और कुंडलिनी योग के सिद्धांतों पर आधारित है। यह स्तोत्र भगवान शिव की पूजा को एक गहन आंतरिक साधना के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें विभिन्न बीजाक्षर मंत्र, श्रीयंत्र पूजा, चक्र ध्यान (जैसे मूलाधार और सहस्रार), और रुद्राभिषेक की विधियों का वर्णन है। इसका पाठ करना केवल स्तुति नहीं है, बल्कि यह एक उन्नत साधक के लिए शिव-स्वरूप में लीन होने का एक मार्गदर्शक है। यह स्तोत्र भौतिक लाभ (जैसे शत्रु नाश) के साथ-साथ परम आध्यात्मिक लक्ष्य, जीवन्मुक्ति (liberation while living), को प्राप्त करने पर जोर देता है।
स्तोत्र के प्रमुख भाव और अर्थ
यह स्तोत्र शिव-साधना के कई गूढ़ रहस्यों को उजागर करता है:
- मंत्रों का रहस्य (The Secret of Mantras): स्तोत्र की शुरुआत ही छः अक्षरों और पांच अक्षरों वाले शक्तिशाली शिव मंत्रों के वर्णन से होती है, जिन्हें "शत्रुविध्वंसकारी" और "मुक्तिदः" (मुक्ति देने वाला) बताया गया है। यह मंत्रों की शक्ति और गुरु के मार्गदर्शन में उनके जप के महत्व पर जोर देता है।
- रुद्राभिषेक के फल (The Fruits of Rudrabhisheka): "यस्त्वां ब्राह्मे मुहूर्ते यजति सह सदा क्षीररुद्राभिषेकैः..." - यह पंक्ति बताती है कि ब्राह्ममुहूर्त में क्षीर रुद्राभिषेक (milk-based Rudrabhisheka) करने से ग्रह-भय दूर होते हैं, तेल से अभिषेक करने से शत्रुओं का नाश होता है, और घी से अभिषेक करने से सभी पाप नष्ट होते हैं।
- कुंडलिनी योग का मार्ग (The Path of Kundalini Yoga): "व्रती मूलाधारोपरि... सहस्रारेदीपाकृतिपरमलिङ्गं परशिवं" - स्तोत्र में मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक की योगिक यात्रा का स्पष्ट वर्णन है। यह बताता है कि कैसे साधक सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से कुंडलिनी को जाग्रत कर सहस्रार में स्थित 'परमशिव' का ध्यान करता है, जो जीवन्मुक्त होने का मार्ग है।
- तांत्रिक उपासना (Tantric Worship): "निशायां श्रीचक्रं यजति शिवलिङ्गोपरिसदा... परो दिव्यः कौलो ब्रजति शिवतां" - इसमें रात्रि में शिवलिंग पर श्री चक्र की पूजा और कौल मार्ग की साधना का भी उल्लेख है, जो दर्शाता है कि यह स्तोत्र शैव और शाक्त तंत्रों का समन्वय है और साधक को 'शिवत्व' (state of being Shiva) की प्राप्ति कराता है।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह एक उन्नत स्तोत्र है और इसका पाठ गुरु दीक्षा (initiation from a Guru) के बाद ही करने की सलाह दी जाती है, जैसा कि स्तोत्र स्वयं इंगित करता है: "निजगुरोः पादपद्मं स्मरन् सन्"।
- इसका पाठ करने का सबसे उत्तम समय ब्राह्ममुहूर्त (सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटे पहले), प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) और महाशिवरात्रि (Mahashivratri) की रात्रि है।
- इस स्तोत्र का पाठ बाणलिंग (एक विशेष प्रकार का पवित्र पत्थर) या पारद शिवलिंग के समक्ष बैठकर करना अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
- इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक और अर्थ समझकर पाठ करने से साधक को न केवल भौतिक सुरक्षा और समृद्धि (protection and prosperity) प्राप्त होती है, बल्कि यह उसे योग और मंत्र के गूढ़ रहस्यों को समझने और परम पद (the ultimate state) को प्राप्त करने में भी सहायता करता है।
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"श्री शिवकर्पूरस्तोत्रम्" भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह सामान्य भक्ति स्तोत्रों से भिन्न है, क्योंकि यह मुख्य रूप से मंत्र शास्त्र, तंत्र और कुंडलिनी योग के सिद्धांतों पर आधारित है। यह स्तोत्र भगवान शिव की पूजा को एक गहन आंतरिक साधना के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें विभिन्न बीजाक्षर मंत्र, श्रीयंत्र पूजा, चक्र ध्यान (जैसे मूलाधार और सहस्रार), और रुद्राभिषेक की विधियों का वर्णन है। इसका पाठ करना केवल स्तुति नहीं है, बल्कि यह एक उन्नत साधक के लिए शिव-स्वरूप में लीन होने का एक मार्गदर्शक है। यह स्तोत्र भौतिक लाभ (जैसे शत्रु नाश) के साथ-साथ परम आध्यात्मिक लक्ष्य, जीवन्मुक्ति (liberation while living), को प्राप्त करने पर जोर देता है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह स्तोत्र शिव-साधना के कई गूढ़ रहस्यों को उजागर करता है:
मंत्रों का रहस्य (The Secret of Mantras): स्तोत्र की शुरुआत ही छः अक्षरों और पांच अक्षरों वाले शक्तिशाली शिव मंत्रों के वर्णन से होती है, जिन्हें "शत्रुविध्वंसकारी" और "मुक्तिदः" (मुक्ति देने वाला) बताया गया है। यह मंत्रों की शक्ति और गुरु के मार्गदर्शन में उनके जप के महत्व पर जोर देता है।
रुद्राभिषेक के फल (The Fruits of Rudrabhisheka): "यस्त्वां ब्राह्मे मुहूर्ते यजति सह सदा क्षीररुद्राभिषेकैः..." - यह पंक्ति बताती है कि ब्राह्ममुहूर्त में क्षीर रुद्राभिषेक (milk-based Rudrabhisheka) करने से ग्रह-भय दूर होते हैं, तेल से अभिषेक करने से शत्रुओं का नाश होता है, और घी से अभिषेक करने से सभी पाप नष्ट होते हैं।
कुंडलिनी योग का मार्ग (The Path of Kundalini Yoga): "व्रती मूलाधारोपरि... सहस्रारेदीपाकृतिपरमलिङ्गं परशिवं" - स्तोत्र में मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक की योगिक यात्रा का स्पष्ट वर्णन है। यह बताता है कि कैसे साधक सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से कुंडलिनी को जाग्रत कर सहस्रार में स्थित 'परमशिव' का ध्यान करता है, जो जीवन्मुक्त होने का मार्ग है।
तांत्रिक उपासना (Tantric Worship): "निशायां श्रीचक्रं यजति शिवलिङ्गोपरिसदा... परो दिव्यः कौलो ब्रजति शिवतां" - इसमें रात्रि में शिवलिंग पर श्री चक्र की पूजा और कौल मार्ग की साधना का भी उल्लेख है, जो दर्शाता है कि यह स्तोत्र शैव और शाक्त तंत्रों का समन्वय है और साधक को 'शिवत्व' (state of being Shiva) की प्राप्ति कराता है।
